IGNOU BHDAE 182 Free Assignment In Hindi 2022- Ignouassignmentfree

BHDAE 182

BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

BHDAE 182 Free Assignment In Hindi jan 2022

खंड – क

प्रश्न 1 सर्वनाम और उसके प्रकारों पर प्रकाश डालिए।

उतरः सर्वनाम: सर्वनाम शब्द सर्व + नाम से बना है। यहाँ पर ‘सर्व’ का अर्थ सभी अर्थात् ऐसे शब्द जो सभी नामों के लिए प्रयुक्त हो सकते है, सर्वनाम कहलाते है। जो शब्द किसी व्यक्ति या वस्तु के नाम ( संज्ञा) के बदले आता है , उसे ‘ सर्वनाम ‘ कहते हैं।

राम ने कहा – मैं वन जा रहा हूँ। सीता ने कहा – मैं भी आपके साथ चलूँगी। पहले वाक्य में मैं ‘ राम के लिए और दूसरे वाक्य में ‘ मैं सीता के लिए आया है।

कुछ शब्द किसी ‘ नाम की जगह आते हैं , नाम का प्रतिनिधित्व करते हैं । ऐसे शब्दों की विशेषता है कि वे सभी नामों के बदले समान रूप से आ सकते हैं – स्त्री वर्ग और पुरुष वर्ग में कोई अन्तर नहीं , कोई रूप – भेद नहीं।

सर्वनाम के प्रकार: सर्वनाम छः प्रकार के होते हैं –

(1. पुरुषवाचक सर्वनाम: जो सर्वनाम बोलने वाले, सुनने वाले तथा किसी अन्य के लिए प्रयुक्त होता है, उसे पुरूषवाचक सर्वनाम कहते हैं। दूसरे शब्दों जिन सर्वनाम का प्रयोग वक्ता श्रोता या अन्य के लिए किया जाता है वह पुरुषवाचक कहलाता है। जैसे – मैं, तू, वह आदि।

i. उत्तम पुरुषवाचक सर्वनाम: संवाद के समय वक्ता जिन शब्दों का प्रयोग अपने स्वयं के लिए करता है, उन्हें उत्तम पुरुष कहते हैं।

जैसे

एकवचन – मैं, मेरा, मेरी, मेरे, मुझे, मुझसे, मैंने।
बहुवचन- हम, हमारा, हमारी, हमारे, हमें, हमसे, हमने।

ii. मध्यम पुरुषवाचक सर्वनाम: संवाद के समय जिन शब्दों का प्रयोग श्रोता/सुनने वाले के लिए किया जाता है, उन्हें मध्यम पुरूषवाचक सर्वनाम कहते हैं।

जैसे BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

एकवचन-तू, तेरा, तेरी, तेरे, तुझे, तूने, तुमने, तुमको
बहुवचन – तुम, तुम्हारा, तुम्हारी, तुम्हारे, तुम्हें।
आदरसूचक -आप, आपका, आपकी, आपके, आपने, आपसे।

iii. अन्यपुरुषवाचक सर्वनाम: संवाद के समय जिसके बारे में बातचीत की जा रही है। दूसरे शब्दों में जिस सर्वनाम शब्दों के प्रयोग से वक्ता और श्रोता का संबंध ना होकर किसी अन्य का संबोधन प्रतीत हो। वहाँ अन्यपुरूषवाचक सर्वनाम है।

जैसे
एकवचन (निकट)- यह, इसका, इसकी, इसके, इसे, इससे।
एकवचन (दूर) – वह, उसका, उसकी, उसके, उसे उससे, उसने।

बहुवचन (निकट)- ये, इनका, इनकी, इनके, इन्हें, इनसे, इन्होंने।
बहुवचन (दूर) – वे, उनका, उनकी, उनके, उन्हें, उनसे, उन्होंने।

  1. निश्चयवाचक सर्वनाम: जो सर्वनाम निकट या दूर की किसी वस्तु की ओर संकेत करे, उसे निश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं।

जैसे – यह, वह, ये, वे आदि।
यह पतंग है।
वह रो रहा है।

  1. अनिश्चयवाचक सर्वनाम: जिस सर्वनाम से किसी निश्चित व्यक्ति या पदार्थ का बोध नहीं होता, उसे अनिश्चयवाचक सर्वनाम कहते हैं। जैसे

कोई, किसी, कुछ आदि।
कोई आ रहा है।

वहाँ पर कोई खडा है।
मुझे कुछ नहीं मिला।

संबंध वाचक सर्वनाम: वह सर्वनाम शब्द जो किसी वाक्य में प्रयुक्त संज्ञा अथवा सर्वनाम के संबंध का बोध कराएं उसे संबंधवाचक सर्वनाम कहते हैं जैसे-जो, सो, उसी, जब,
जैसा, जैसी, जितना, जितनी, उतना, उतनी, जिसका, जिसकी आदि।
जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे।

प्रश्नवाचक सर्वनाम: वाक्य में प्रयुक्त वह शब्द जिससे किसी व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान के विषय में प्रश्न किया जाए वहां प्रश्नवाचक सर्वनाम होता है। BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

दूसरे शब्दों में जिस सर्वनाम से प्रश्न पूछे जाने का बोध, हो वहां पर प्रश्नवाचक सर्वनाम होता है। जैसे – कब, कैसे, क्या, कौन, कहां, आदि। तुम कहाँ जा रहे हो। यह काम कैसे करना है।

(6. निजवाचक सर्वनाम: जिन शब्दों का प्रयोग वक्ता स्वयं के लिए करता है, वे निजवाचक सर्वनाम कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में जो सर्वनाम तीनों पुरूषों (उत्तम, मध्यम और अन्य) में निजत्व का बोध कराता है, उसे निजवाचक सर्वनाम कहते हैं।

जैसे-आप, स्वयं, स्वतः, अपना, अपनी, अपने इत्यादि। मैं अपना कार्य खुद से ही कर लूँगा। मेरी पत्नी अपना कार्य स्वतः करने में सक्षम है। मैं कल अपने माता-पिता के साथ आऊंगा।

सर्वनाम के उदाहरण :–

मुझे घर जाना है। – उत्तम पुरुष वाचक
सर्वनाम कौन रो रहा है ? – प्रश्नवाचक सर्वनाम
कोई रो रहा है। -अनिश्चयवाचक सर्वनाम

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प्रश्न 2 क्रिया और उसके प्रकारों का विवेचन कीजिए।

उतरः क्रिया: ऐसे शब्द जो हमें किसी काम के करने या होने का बोध कराते हैं, वे शब्द क्रिया कहलाते हैं। किसी वाक्य में प्रयुक्त वह शब्द जिसके द्वारा किसी काम का करना या होना पाया जाता है, उसे क्रिया कहते हैं।

क्रिया एक विकारी शब्द है, जिसका अर्थ ‘काम’ होता है। अधिकतर क्रिया शब्दों की उत्पत्ति धातु शब्दों से होती है। मूल धातु शब्द में ‘ना’ प्रत्यय लगाने से क्रिया शब्द बनते हैं।

किसी वाक्य में लिंग, वचन, काल आदि के आधार पर क्रिया का रूप परिवर्तित होने के साथ साथ संज्ञा एवं सर्वनाम के आधार पर भी क्रिया का रूप परिवर्तित होता है। जैसे: पढ़ना, लिखना, खाना, पीना, खेलना, सोना आदि।

क्रिया के उदाहरण: BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

i. राकेश गाना गाता है। ii. मोहन पुस्तक पढता है।

iii. मनोरमा नाचती है। iv. मानव धीरे-धीरे चलता है। v. घोडा बहुत तेज़ दौड़ता है।

ऊपर दिए गए वाक्यों में गाता है, पठता है, नाचती है, दौड़ता है, चलता है आदि शब्द किसी काम के होने का बोध करा रहे हैं। अतः यह क्रिया कहलायेंगे। क्रिया हमें समय सीमा के बारे में संकेत देती है।

क्रिया के रूप की वजह से हमें यह पता चलता है की कार्य वर्तमान में हुआ है, भूतकाल में हो चूका है या भविष्यकाल में होगा। क्रिया का निर्माण धातू से होता है।

जब धातू में ना लगा दिया जाता है तब क्रिया बन जाती। क्रिया को संज्ञा और विशेषण से भी बनाया जाता है। क्रिया को सार्थक शब्दों के आठ भेदों में से एक माना जाता है।

क्रिया के प्रकार : कर्म जाती तथा रचना के आधार पर क्रिया के प्रकार: कर्म जाती तथा रचना के आधार पर क्रिया के मुख्यतः दो प्रकार होते है।

(1. अकर्मक क्रिया: जिस क्रिया का फल कर्ता पर ही पड़ता है वह क्रिया अकर्मक क्रिया कहलाती हैं। इस क्रिया में कर्म का अभाव होता है। जैसे : श्याम पढता है। इस वाक्य में पढने का फल श्याम पर ही पड़ रहा है।

इसलिए पढता है अकर्मक क्रिया है। जिन क्रियाओं को कर्म की जरूरत नहीं पडती या जो क्रिया प्रश्न पूछने पर कोई उत्तर नहीं देती उन्हें अकर्मक क्रिया कहते हैं। अथार्त जिन क्रियाओं का फल और व्यापर कर्ता को मिलता है उसे अकर्मक क्रिया कहते हैं।

कर्मक क्रिया के उदाहरण :BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

i. राजेश दौड़ता है। _ii. सांप रेंगता है। _iii. पूजा हंसती है। _iv. मेघनाथ चिल्लाता है। ___v. रावण लजाता है।

जैसा कि आप ऊपर दिए गए उदाहरणों में देख सकते हैं कि दौड़ता हैं, रेंगता है, हंसती है, चिल्लाता है, आदि वाक्यों में कर्म का अभाव है एवं क्रिया का फल करता पर ही पड़ रहा है। अतः यह उदाहरण अकर्मक क्रिया के अंतर्गत आयेंगे।

(2. सकर्मक क्रिया: जिस क्रिया में कर्म का होना ज़रूरी होता है वह क्रिया सकर्मक क्रिया कहलाती है। इन क्रियाओं का असर कर्ता पर न पड़कर कर्म पर पड़ता है।

सकर्मक अर्थात कर्म के साथ। जैसे : विकास पानी पीता है। इसमें पीता है (क्रिया) का फल कर्ता पर ना पडके कर्म पानी पर पड़ रहा है। अतः यह सकर्मक क्रिया है।

कर्मक क्रिया के उदाहरण :

i. रमेश फल खाता है। _
ii. सुदर्शन गाडी चलाता है। _

iii. मैं बाइक चलाता हूँ। _
iv. रमा सब्जी बनाती है।

v. सुरेश सामान लाता है। जैसा कि आप ऊपर दिए गये उदाहरणों में देख सकते हैं कि क्रिया का फल कर्ता पर ना पडके कर्म पर पड़ रहा है। अतः यह उदाहरण सकर्मक क्रिया के अंतर्गत आयेंगे।

सकर्मक क्रिया के भेदः
i. एककर्मक क्रिया : जिस क्रिया में एक ही कर्म हो तो वह एककर्मक क्रिया कहलाती है। जैसे: तुषार गाडी चलाता है।इसमें चलाता(क्रिया) का गाडी(कर्म) एक ही है। अतः यह एककर्मक क्रिया के अंतर्गत आएगा।

ii. द्विकर्मक क्रिया : जिस क्रिया में दो कर्म होते हैं वह द्विकर्मक क्रिया कहलाती है। पहला कर्म सजीव होता है एवं दूसरा कर्म निर्जीव होता है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

जैसे: श्याम ने राधा को रूपये दिए। ऊपर दिए गए उदाहरण में देना क्रिया के दो कर्म है राधा एवं रूपये। अतः यह द्विकर्मक क्रिया के अंतर्गत आएगा।

संरचना के आधार पर क्रिया के भेदः संरचना के आधार पर क्रिया के चार भेद होता है :

(1. प्रेरणार्थक क्रिया : जिस क्रिया से यह ज्ञात हो कि कर्ता स्वयं काम ना करके किसी और से काम करा रहा है। जैसे:पटवाना, लिखवाना आदि।

(2. नामधातु क्रिया : ऐसी धातु जो क्रिया को छोड़कर किन्ही अन्य शब्दों जैसे संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण आदि से बनती है। वह नामधातु क्रिया कहते हैं। जैसे: अपनाना, गर्माना आदि।

(3. सयुंक्त क्रिया : ऐसी क्रिया जो किन्ही दो क्रियाओं के मिलने से बनती है वह सयुंक्त क्रिया कहलाती है। जैसे: खा लिया, चल दिया, पी लिया आदि।

(4. कृदंत क्रिया : जब किसी क्रिया में प्रत्यय जोड़कर उसका नया क्रिया रूप बनाया जाए तब वह क्रिया कृदंत किया _कहलाती है। जैसे दौड़ना, भागता आदि।

प्रेरणार्थक क्रिया के उदाहरण :

i. माता पिता अपने बच्चों से कार्य कराते है।
ii. सुनील अपने बेटे से काम करवाता है।
iii. अध्यापक बच्चों से पाठ पढवाता है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

सयुंक्त क्रिया के उदाहरण :

i. मीरा बाई स्कूल चली गई।
ii. वह खा चुका।

iii. मीरा महाभारत पढने लगी।
iv. प्रियंका ने दूध पी लिया।

खंड -ख

प्रश्न 3 कारक और विभक्ति का सोदाहरण परिचय दीजिए।

उतरः कारक और विभक्तिः कारक – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप या वाक्य के अन्य शब्दों के साथ उसका सम्बन्ध सूचित करता हो उसे कारक कहते है। जैसे – रामचंद्र ने खरे जल के समुद्र पर बंदरो सेपल बँधवा दिया |

कारक का रथ व्याकरण में केवल ‘ करनेवाला नहीं होता है | वाक्य में वह संज्ञा और सर्वनामों में परसर्गों के सहारे अनेक अर्थ प्रकट करता है | इस अर्थ में उनके आठ भेद होते है | परसर्ग को विभक्ति चिन्ह भी कहते है।

  1. कर्ता-ने, को
  2. कर्म – को, शुन्य
  3. करण-से
  4. सम्प्रदान – को, के लिए
  5. अपादान – से
  6. सम्बन्ध – का, के, की
  7. अधिकरण – में, पर
  8. सम्बोधन -हे, अजी, अहो , अरे ।

(1. कर्ता कारक – वाक्य में जो पद काम करने वाले के अर्थ में होता है उसे कर्ता कहते है | जैसे- मोहन पढता है | यहाँ कर्ता मोहन है , इसकी विभक्ति ने लुप्त है

(2. कर्म-जिस पर क्रिया का फल पड़े उसे कर्म कहते है । इसकी विभक्ति को है । जैसे – राम ने रावण को मारा यहाँ रावण को कर्म है | कभी कभी यह अपने परस्पर के बिना भी आता है | जैसे- सीता फल कहती है , राम रोटी खता है |BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

(3. करण – जिससे काम हो उसे करण कहते है | इसकी विभक्ति से है जैसे – वह कलम लिखता है |

(4. सम्प्रदान – जिसके लिए काम किया जाए उसे सम्प्रदान कहते है | इसकी विभक्ति को ‘और के लिए है जैसे -शिष्य ने अपने गुरु के लिए सब कुछ किया , गरीब को धन दीजिये आदि |

(5. अपादान – जिससे किसी वास्तु को अलग किया जाए उसे अपादान कहते है | इसकी विभक्ति से है | जैसे – वह अपने वर्ग से बाहर गया , पेड़ से पत्ते गिरे आदि ।

(6. संबंध – जिससे किसी वास्तु का संबंध हो उसे संबंध कारक कहते है | इसकी विभक्ति का ‘की’ और ‘को’ है | जैसे – राम का घर , दिनेश की पुस्तक , गणेश के बेटे आदि |

पुरुषवाचक सर्वनाम में ‘ना’ ,नी’,’ने’ तथा ‘री’,’रे’ का प्रयोग विभक्ति के रूप में होता है । जैसे-अपना बेटा , अपनी बेटी , अपने बेटे , मेरा बेटा, मेरी बेटी, मेरे बेटे आदि ।

(7. अधिकरण – जिससे क्रिया का आधार जाना जाए उसे ‘अधिकरण ‘ कहते है | इसकी विभक्ति में’ और ‘पर’ है । जैसे- लड़की घोड़े पर बैठी | वह अपने घर में बैठा आदि ।

(8. सम्बोधन – जिससे किसी को पुकारा या सम्बोधित किया जाए उसे सम्बोधन कहते है । इसकी विभक्ति ‘अरे ‘ , ‘हे आदि है | जैसे-अरे भाई ! , जल्दी जाओ! , हे राम!, दया करो! , कुछ लोग इसे कारक नहीं मानते |

प्रश्न 4 प्राणत्व के आधार पर व्यंजन के भेद स्पष्ट कीजिए।

उतर: प्राणत्व के आधार पर व्यंजन के भेदः प्राण से यहाँ अभिप्राय है – ‘वायु’, ‘हवा’,’श्वास’ या ‘प्राण वायु की शक्ति वर्गों के उच्चारण की क्रिया के मध्य मुख से निकलने वाली वायु की शक्ति या मात्रा के आधार पर भी व्यंजनों का भेद किया जाता है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

इन्हें ही प्राणत्व के आधार पर किया गया वर्गीकरण कहा जाता है। इस आधार पर कुछ व्यंजन अल्पप्राण तथा कुछ व्यंजन महाप्राण कहे जाते हैं।

इन दोनों को निम्नलिखित रूप से समझा जा सकता है – अल्पप्राण – जिन व्यंजनों के उच्चारण में मुख से कम मात्रा में वायु निकलती है यानी

जिनके उच्चारण में श्वास बल कम रहता है उन व्यंजनों को अल्पप्राण कहा जाता है। हिन्दी वर्णमाला में सभी वर्गों के व्यंजनों में पहला, तीसरा एवं पाँचवाँ व्यंजन अल्पप्राण माना जाता है।

इस तरह अल्पप्राण व्यंजनों की सूची निम्न होगी – क, ग, ङ च, ज, ञ ट, ड, ण त, द, न,प, ब, म इनके अतिरिक्त य, र, ल, और ड़ भी इसी वर्ग में आते हैं।

महाप्राण – यह अल्पप्राण व्यंजनों के विपरीत हैं। महाप्राण व्यंजनों के उच्चारण में मुख से वायु ज्यादा मात्रा में निकलती है।

यानी इनके उच्चारण में श्वास बल अधिक होता है। या यों कहें की हवा का आधिक्य होता है। महाप्राण व्यंजनों में प्रत्येक वर्ग का दूसरा और चौथा व्यंजन शामिल है।

इस तरह महाप्राण व्यंजनों की सूची निम्न ह -ख, घ छ, झ ठ, ढ थ, ध,फ, भ इन सभी उपरोक्त व्यंजनों के साथ इस वर्ग में ढ़ व्यंजन भी शामिल है।

प्राणत्व के आधार की ही तरह व्यंजनों के वर्गीकरण का एक अन्य प्रमुख आधार स्वरतंत्रियों के अनुसार भी निर्धारित होता है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

वर्गों के उच्चारण में स्वरतंत्रियाँ एक महत्त्वपूर्ण अवयव हैं। उच्चारण के समय जब फेफड़ों से बाहर आती हुई हवा इन स्वरतंत्रियों से टकराती है तो इनमें कम्पन होता है, यानी एक प्रकार की झंकार उत्पन्न होती है।

यह कम्पन उच्चारण के मध्य स्वरतंत्रियों के निकट आ जाने से उनके बीच से निकलती हवा के कारण होता है। इस कम्पन के होने या न होने के आधार पर भी व्यंजनों का भेद निर्धारित होता है। इस दृष्टि से व्यंजनों को दो भागों में बाँटा जाता है – घोष तथा अघोष ।

घोष – घोष व्यंजन वे हैं जिनके उच्चारण में स्वर तंत्रियों के निकट आ जाने के कारण उनके बीच से निकलती हवा में कम्पन होता है।

हिन्दी वर्णमाला में क वर्ग आदि पाँचों वर्गों के अंतिम तीन व्यंजन घोष माने गए हैं। इस तरह घोष व्यंजनों की सूची निम्न है -ग, घ, ङ ज, झ, ञ ड, ढ, ण द, ध, न,ब, भ, म

अघोष – घोष व्यंजनों से बिल्कुल विपरीत जिन व्यंजनों के उच्चारण के समय स्वर तंत्रियाँ परस्पर दूर रहती हैं और जिनके उच्चारण में मुख तक आने वाली वायु में कोई कंपन नहीं होता उन्हें अघोष कहा जाता है। हिन्दी वर्णमाला के सभी वर्गों के पहले दो व्यंजन अघोष माने जाते हैं।

इस तरह -क, ख च, छ ट, ठ त, थ,प, फ व्यंजन अघोष की सूची में शामिल हैं। स्वरतंत्रियों के आधार पर व्यंजनों के भेद के इस विस्तृत अध्ययन के साथ व्यंजनों के उच्चारण के सभी प्रमुख भेदों से हम परिचित हो चुके हैं।

यह विस्तृत अध्ययन हिन्दी भाषा की वर्ण व्यवस्था और उसके मध्य व्यंजन के उच्चारण संबंधी सभी पहलुओं से हमारा परिचय करवाता है।

मुख्य रूप से प्रयत्न के आधार पर, उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर तथा स्वरतंत्रियों में कंपन के आधार पर किए जाने वाले ये भेद व्यंजन की विस्तृत समझ के लिए अनिवार्य हैं।

प्रश्न 5 वाचन-कौशल’ पर प्रकाश डालिए।

उतर: वाचन कौशल: अपने भावों और विचारों को मौखिक भाषा के दवारा बोलकर अभिव्यक्त करना ही वाचन कौशल कहलाता है। वाचन कौशल के उद्देश्य:BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

i. अपने भावों, विचारों, अनुभवों को सरलतापूर्वक, स्पष्ट ढंग से व्यक्त करने के योग्य बनना।
ii. शुद्ध उच्चारण, उचित स्वर, उचित गति एवं हाव-भाव के साथ बोलना सीखना।

iii. निसंकोच होकर अपने विचारों को व्यक्त करने के योग्य बनना।
iv. परस्पर वार्तालाप करने के योग्य बनना।

v. धारा प्रवाह बोलने के योग्य बनना।
vi. स्वाभाविक रूप से बोलने के भाव जागृत करना।
vii. अपने विचारों को प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत करना।

वाचन कौशल की शिक्षण विधियाँ :

i. सस्वर वाचन: सस्वर वाचन के माध्यम से शिक्षक छात्रों की मौखिक अभिव्यक्ति का विकास कर सकता है। शिक्षक पहले स्वयं अनुच्छेद का वाचन करता है, फिर कक्षा के छात्रों से सस्वर वाचन कराता है। _

ii. कविता पाठः छोटे बच्चों की बालगीतों व कविताओं में अधिक रूचि होती है। शिक्षक को चाहिए कि वह छात्रों को कविता याद करने के लिए उत्साहित करे तथा किसी समारोह आदि में उचित हाव-भाव, आरोह-अवरोह तथा अंग संचालन के साथ सुनाने का अवसर प्रदान करें।

iii. कहानी सुनना: कहानी कहना वाचन कौशल का एक सशक्त साधन है। छोटे बच्चे कहानियाँ अधिक पसंद करते हैं।शिक्षक पहले छात्रों को कहानी सुनाए, फिर उसी कहानी को सुनाने के लिए छात्रों से कहें।

iv. चित्र वर्णन: छोटे बच्चे चित्र देखने में रूचि लेते हैं। अत: चित्रों के माध्यम से भी उनके वाचन कौशल का विकास किया जा सकता है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

v. प्रश्नोतर: छात्रों के वाचन कौशल का विकास करने के लिए प्रश्नोत्तर एक अच्छी विधि है। इसमें अध्यापक छात्रों से प्रश्न पूछकर उनसे प्राप्त उत्तरों द्वारा उनकी श्रवण अभिव्यक्ति को विकसित करता है।

vi. वार्तालाप: शिक्षक छात्रों से औपचारिक व अनौपचारिक दोनों तरह का वार्तालाप करके उनके वाचन कौशल का विकास कर सकता है।

शिक्षक छात्रों को अलग-अलग भूमिकाएं देकर उनका परस्पर 15 वार्तालाप करा सकता है। वार्तालाप कक्षा में, कक्षा से बाहर, खेल के मैदान में या घूमते हुए कहीं भी किया जा सकता है।

vii. वाद-विवादः वाद-विवाद में छात्र पूर्व-निर्धारित विषय पर विचारों को व्यक्त करते हैं। कुछ छात्र पक्ष व कुछ विपक्ष में विचार प्रस्तुत करते हैं। वाद-विवाद से विचाराभिव्यक्ति को तर्कपूर्ण ढंग से प्रतिपादित करने की कुशलता आती है।

vi. भाषण: भाषण मौखिक अभिव्यक्ति विकसित करने का एक सशक्त साधन है। अत:छात्रों को भाषण देने के प्रचुर अवसर दिए जाने चाहिएँ इसमें शिक्षक पूर्व-निर्धारित किसी विषय पर छात्रों को भाषण देने का अवसर प्रदान कर सकता है।

ix. नाटक मंचन: मौखिक अभिव्यक्ति के सभी गुणों को विकसित करने के लिए नाटक एक उपयोगी साधन है। इससे उचित हाव-भाव, उतार-चढ़ाव, प्रवाह, अवसर के अनुकूल भाषा आदि का अभ्यास कराया जा सकता है।

x. टेप रिकॉर्डर: टेप रिकॉर्डर के माध्यम से छात्रों को रिकॉर्ड की गई अच्छी वार्ताएँ, भाषण, समसामयिक चर्चाएँ सुनाई जा सकती है। उन्हें सुनाकर छात्रों को प्रवाहमयी भाषा बोलने के लिए उत्साहित किया जाता है।

इसमें पहले छात्रों को ध्यान से सुनने के लिए कहा जाता है। टेप रिकॉर्डर का बालकों के उच्चारण सुधारने में आवश्यकता अनुसार प्रयोग किया जा सकता है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 6.शब्दों में अ-लोप की स्थिति पर विचार कीजिए।

उतरःशब्दों में अ-लोप की स्थितिः आपने देखा कि अ स्वर की मात्रा नहीं होती इसी प्रकार हिंदी में कुछ स्थानों पर अ स्वर का उच्चारण नहीं होता। उदाहरण के लिए “लड़की’ शब्द पर ध्यान दीजिए।

कोई अन्य भाषा-भाषी इसका उच्चारण “ल + अ ड् + अ क् + ई’ इन समस्त ध्वनियों के साथ करेगा। किंतु हिंदी मातृभाषा भाषी इस शब्द का उच्चारण “लड़की’ न कर “लड़की” के रूप में करेगा।

अर्थात् “ड़” व्यंजन के बाद आने वाले “अ” स्वर का उच्चारण नहीं होगा। हिंदी में ऐसे अनेक शब्द मिलते हैं जिनके मध्य में आने वाले अ-स्वर का उच्चारण करते समय लोप कर देते हैं। इसी प्रकार राम, चुप, कुल आदि शब्दों का उच्चारण कीजिए।

क्या हम इन शब्दों का उच्चारण ठीक वैसा ही करते हैं जिस रूप में ये लिखे हुए हैं? नहीं, हिंदी भाषा-भाषी इन शब्दों का उच्चारण “राम्, “चुप”, “कुल” आदि के रूप में करता है। अर्थात् हिंदी में शब्द के अंत में आने वाले अ-स्वर का उच्चारण नहीं भी किया जाता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हिंदी में अ-स्वर का लोप कर देने के संबंध में कोई नियम है या हम अपनी मर्जी से उच्चारण करते समय अ का लोप कर देते हैं?

हिंदी में अ-स्वर का लोप एक तो शब्द के अंत में तथा दूसरे शब्द के मध्य में दो स्थानों पर किया जाता है। आगे दोनों स्थितियों की चर्चा की गई है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

(1. शब्दांत में “अ” लोप जैसा कि बताया गया कि हिंदी में शब्द के अंत में सदैव अ-स्वर का लोप कर दिया जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि हिंदी भाषी शब्द के अंत में अ-रहित व्यंजन का उच्चारण करते हैं

तथापि लिखते समय उन शब्दों में हलंत का चिह्न नहीं लगाते क्योंकि हमारी लेखन व्यवस्था तो परंपरागत रूप का ही अनुसरण करती है। अब नीचे दिए गए शब्दों के लिखित तथा उच्चरित रूपों पर ध्यान दीजिए। उच्चारित रूपों में शब्द के अंत में अ-लोप दिखाया गया है –

लिखित रूप उच्चरित रूप
आम आम्
कलकल
चारचार्
पाँचपाँच
पेड़पेड़

(2. शब्द के मध्य में अ लोप हिंदी में शब्दों के मध्य में भी उच्चारण के स्तर पर अ-स्वर का लोप किया जाता है। शब्द के मध्य में होने वाले अ-लोप के दो अलग नियम मिलते हैं –

नियम 1 आप देख चुके हैं कि “लड़की” शब्द में उच्चारण करते समय “ड़” के बाद आने वाले स्वर का लोप किया जाता है। इसी तरह अन्य शब्दों में अ-लोप देखा जा सकता है –

लिखित रूप उच्चरित रूप
लड़का लड़का
जनताजन्ता
मछलीमछली
गिनतीगिन्ती
सरसों सरसों

यदि आप इन शब्दों की संरचना पर ध्यान दें तो पाएँगे कि जिस “अ” स्वर का लोप हो रहा है उसके पूर्व तथा उसके बाद में आने वाले वर्षों की प्रकृति समान है BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

अर्थात् सभी शब्दों में लुप्त होने वाले अ के पूर्व एक व्यंजन तथा एक स्वर अवश्य आ रहा है और उसके बाद में एक व्यंजन तथा दीर्घ स्वर आ रहा है। जब भी इस प्रकार की स्थिति होगी उच्चारण में अ-स्वर का लोप कर दिया जाता है।

नियम 2 अब नीचे दिए गए शब्दों के लिखित तथा उच्चरित रूपों पर ध्यान दीजिए –

लिखित रूप उच्चरित रूप
अनबन अन्बन्
अनशनअन्शन्
तड़पनतड़पन्
सिमटनसिम्टन्

उपरोक्त उदाहरणों में अंतिम अ-लोप के साथ एक अ-स्वर का और लोप हो रहा है। इन सभी शब्दों में सभी ह्रस्व स्वर क्रम से आ रहे हैं। अतः यदि किसी शब्द में तीन या तीन से अधिक हस्व स्वर एक क्रम में आएं तो बाईं ओर से दूसरे अ-स्वर का लोप कर दिया जाता है।

जैसे सिमटन शब्द में या अनबन शब्द में बाईं ओर से गिनने पर दूसरा अ-स्वर बीच में आया है अतः इसका उच्चारण नहीं किया जाता।

खंड -ग

प्रश्न 7 नासिक्य ध्वनियाँ क्या है? स्पष्ट कीजिए।

उतर: नासिक्य ध्वनियाँ: जिन ध्वनियों के उच्चारण में वायु मुखविवर में अवरूळ होकर नासिका विवर एवं मुखविवर दोनों मार्ग से एक साथ निकलती है।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

ऐसी उच्चरित ध्वनियाँ “नासिक्य ध्वनियाँ” कहलाती हैं। ङ, ञ, ण, न, म नासिक्य ध्वनियाँ हैं। इन व्यंजनों के उच्चारण में कोमलतालु नीचे झुक जाती है।

इस कारण श्वासवायु मुख के साथ-साथ नासारन्ध्र से बाहर निकलती है। इसीलिए व्यंजनों में अनुनासिकता आ जाती है। हिंदी में नासिक्य व्यंजन इस प्रकार है – म, म्ह, न, न्ह, ण, ङा म्ह, न्ह, इह को महाप्राण नासिक्य कहा गया है।

हिंदी में इन महाप्राण नासिक्य ध्वनियों का शब्द के आरंभ में प्रयोग नहीं होता। शब्द के मध्य और अंत में संहार, कुम्हार, कान्हा आदि शब्दों में इनका प्रयोग होता है।

स्वनविज्ञान में नासिक्य व्यंजन ऐसा व्यंजन होता है जिसे नरम तालू को नीचे लाकर उत्पन्न किया जाए और जिसमें मुँह से वायु निकलने पर अवरोध हो लेकिन नासिकाओं से निकलने की छूट हो।

न, म और ण ऐसे तीन व्यंजन हैं। इसी तरह स्वरों के भी मुख्य दो भेद हैं- मौखिक और अनुनासिक।

नासिक्य व्यंजन:

स्वनविज्ञान में नासिक्य व्यंजन ऐसा व्यंजन होता है जिसे नरम तालू को नीचे लाकर उत्पन्न किया जाए और जिसमें मुँह से वायु निकलने पर अवरोध हो लेकिन नासिकाओं से निकलने की छूट हो। न, म और ण ऐसे तीन व्यंजन हैं। नासिक्य व्यंजन लगभग हर मानव भाषा में पाए जाते हैं।

अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी में भी स्वर और व्यंजन दो प्रकार की ध्वनियाँ हैं। व्यंजनों के भी मुख्य दो भेद हैं- मौखिक और नासिक्य। इसी तरह स्वरों के भी मुख्य दो भेद हैं- मौखिक और अनुनासिक।

‘मौखिक’ उन स्वरों को कहते हैं, जिनके उच्चारण के समय अन्दर से आने वाली हवा मुख के रास्ते बाहर निकलती है और ‘अनुनासिक’ के उच्चारण के समय हवा मुख और नाक दोनों रास्तों से बाहर निकलती है। अनुनासिक हिन्दी के अपने स्वर हैं।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

हिंदी की पूर्ववर्ती भाषाओं- संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश में अनुनासिक स्वर नहीं हैं। इसलिए इन भाषाओं की वर्णमाला में अनुनासिक स्वरों को लिखने की कोई व्यवस्था नहीं है।

संबंधों: तालव्य नासिक्य, दन्त्य, वर्त्य और पश्वयं नासिक्य, दन्त्यौष्ठ्य नासिक्य, मूर्धन्य नासिक्य, कण्ठ्य नासिक्य, अन्तर्राष्ट्रीय ध्वन्यात्मक वर्णमाला, अलिजिह्वीय नासिक्य, अघोष वयं नासिक्य।

प्रश्न 8.पदक्रम का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उतर:पदक्रमः पदक्रम में निम्नलिखित बिन्दुओं का पालन किया जाता है –

(i) वाक्यों में आने वाले प्रत्येक पद का क्रम निश्चित होता है! इसमें कर्ता वाक्य के आरंभ में, कर्म मध्य में और क्रिया का । प्रयोग अंत में किया जाता है; जैसे- मैंने नाटक में भाग लिया!

(ii) जिसके विषय में प्रश्न किया जाता है, प्रश्नवाचक पद उससे पहले आता है; जैसे- मनोहर किस डॉक्टर के पास गया?

(iii) विस्मयादिसूचक और संबोधन पद वाक्य के आरंभ में आते हैं; जैसे – शाबाश! हमें तुम पर गर्व हैं!

(iv) पूर्वकालिक क्रिया सदा मुख्य क्रिया से पहले आती है; जैसे – प्रतिभा ने बर्फ डालकर शरबत पिलाया!

(v) विशेषणों का प्रयोग संज्ञा से पहले किया जाता है; जैसे – मेरी सफेद कमीज कहाँ है?

(vi) क्रिया-विशेषणों का प्रयोग क्रिया से पहले किया जाता है; जैसे-विद्यार्थी धीरे धीरे गाते हैं!

(vii) मत, नहीं, न – इन निषेधात्मक पदों का प्रयोग क्रिया से पहले किया जाता है; जैसे – बाजार में बिकने वाले कटे फल मत खाओ! BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

(viii) प्रत्येक पद का उचित प्रयोग किया जाता है; जैसे – बाजार चलाकर साईकिल जाओ (अशुद्ध है)! – साईकिल चलाकर बाजार जाओ (शुद्ध है)!

(ix)यदि ‘न’ का प्रयोग अनुरोध करने के लिए किया जाता है तो इसे वाक्य के अंत में लिखते और बोलते हैं; जैसे – हमारे साथ चलिए न!, मान जाइए न!

(x) ही, तक, भी, मात्र, केवल, भर, तो आदि निपात या अवधारक पदों का प्रयोग उस पद के पश्चात् किया जाता है, जिन पदों पर बल दिया जाता है; जैसे- रेशमा बंगलौर ही जाएगी! मुकेश लस्सी भी पीना चाहता है!

(xi) करण, संप्रदान, अपादान, संबंध – इन कारकों का प्रयोग कर्ता और कर्म के मध्य किया जाता है; जैसे – मनीषा का भाई पूना चला गया!

प्रश्न 9 वाक्य रूपांतर को सोदाहरण विवेचित कीजिए।

उतर: वाक्य रूपांतरण: तुलना कीजिए–

सरल वाक्य :–

(1. वह छोटा लड़का है
(2. इसी बच्चे को बैल ने मारा था।

मिश्र वाक्य :–

(1. वह ऐसा लड़का है जो छोटा है।
(2. यह वही बच्चा है जिसे बैल ने मारा था।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि किसी बात को अनेक ढंग से कहा जा सकता है और एक प्रकार के वाक्य को दूसरे प्रकार के वाक्य के रूप में बदला जा सकता है। इस प्रक्रिया में यह ध्यान रखना होगा कि वाक्य का अर्थ न बदलने पाए; BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

जैसे – सरल से संयुक्त वाक्य :–

वह खाना खाकर सो गया। (सरल वाक्य)
उसने खाना खाया और (वह) सो गया। (संयुक्त वाक्य)

सरल से मिश्र वाक्य में अंतरण :–

वह मुझसे आने को कहता है। (सरल वाक्य)
वह मुझसे कहता है कि जाओ। (मिश्र वाक्य)

संयुक्त से मिश्र वाक्य में अंतरण :–

मोहन एक पुस्तक चाहता था और वह उसे मिल गई। (संयुक्त वाक्य)
मोहन जो पुस्तक चाहता था (वह) उसे मिल गई। (मिश्र वाक्य)

मैं वहाँ पहुँचा और तुरंत घंटा बजा। (संयुक्त वाक्य)
ज्योंही मैं वहाँ पहुँचा त्योंही घंटा बजा। (मिश्र वाक्य)

वे नहीं आ सकते। (कर्तृवाच्य)
तुमसे लिखा नहीं जा सकता। (कर्मवाच्य)

विशेषण की तुलनावस्था का अंतरण :–

निर्मला सब लड़कियों से सुंदर हैं।
निर्मला से सुंदर कोई लड़की नहीं है।

विधानवाचक और निषेधवाचक का अंतरण :–

वह निर्धन है।
उसके पास धन नहीं है।
उसने कोई उपाय नहीं छोड़ा। BHDAE 182 Free Assignment In Hindi
उसने सभी उपाय किए हैं।

विधान वाचक या निषेधवाचक तथा प्रश्नवाचक वाक्यों का अंतरण :–

गांधी जी का नाम किसने नहीं सुना? (प्रश्न)
गांधी जी का नाम सबने सुना है। (विधानवाचक)

प्रश्न 10 आंगिक संप्रेषण की मुख्य श्रेणियों का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उतरः आंगिक सम्प्रेषण की मुख्य श्रेणीयाँ: आंगिक संप्रेषण या अशाब्दिक को मुख्यतः चार श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं –

i) अंतरंग ii) सामाजिक

iii) व्यक्तिगत iv) सार्वजनिक जगह

हर्जी एंड डिकसन (2004) ऐसे चार क्षेत्र चिह्नित करते हैं, जहाँ मनुष्य का संप्रेषणात्मक व्यवहार आंगिक या अशाब्दिक होता है –

(1. एक घर जहाँ उसके स्वामी की अनुमति के बिना कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

(2. कोई व्यक्ति रेलगाड़ी की एक ही सीट पर बैठता है, यदि कोई और बैठ जाए तो व्यथित होता है।

(3. जब कोई व्यक्ति पार्किंग के लिए जगह की प्रतीक्षा में हो तो व्यक्ति पार्किंग की जगह छोड़ने में अधिक वक्त लेते हैं।

(4. जब कोई समूह फुटपाथ पर बातचीत में मशगूल हो तो अन्य व्यक्ति उन्हें टोकने के बजाय बगल से निकल जाएँगे। BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

आंगिक संप्रेषण में समय के प्रयोग का भी अध्ययन किया गया है, इसे क्रॉनेमिक्स कहते हैं। समय को लेकर अनुभव एवं प्रतिक्रिया एक सशक्त संप्रेषण है।

समय की अनुभूति में, समयबद्धता, इंतजार, बोलने वाले की वाणी की गति और श्रोता कब तक सुनना चाहता है, आदि बातें अशाब्दिक या आंगिक संप्रेषण की विवेचना में योगदान करते हैं। समय की इस अनुभूति की जड़ें एवं समझ औद्योगिक क्रांति में निहित है।

अमेरिकी लोगों के लिए समय एक बहुमूल्य स्रोत है जिसे वे व्यर्थ नहीं गंवाते और न ही हलके में लेते हैं। समयबद्ध संस्कृतियों वाले देश ‘मोनोक्रोनिक’ कहलाते हैं,

जैसे – अमेरिका, जर्मनी, स्विटजरलैंड। इसके विपरीत ‘पॉलीक्रानिक’ समय प्रणाली में समय को लेकर अधिक तरलता होती है। लैटिन अमेरिका, एवं अरब संस्कृतियाँ समय की पॉलीक्रानिक प्रणाली का प्रयोग करती हैं।

इसमें कार्य की अपेक्षा संबंधों और परंपराओं को अधिक महत्व दिया जाता है। यदि ये अपने परिवार या मित्रों के साथ हैं तो समय की विशेष सीमा या समस्या नहीं होती।BHDAE 182 Free Assignment In Hindi

पॉलीक्रानिक संस्कृतियों में सउदी अरब, मिस्र, मैक्सिको, फिलीपींस, भारत एवं कई अफ्रीकी देश आते हैं।

BESC 134

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