IGNOU BHDE 144 Free Assignment In Hindi 2021-22

BHDE 144

BHDE 144 Free Assignment In Hindi

Table of Contents

BHDE 144 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

खंड – क

प्रश्न 1 हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह, एक पुरुष, एक सघन,एक……………….. तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन

उत्तर- संदर्भ- प्रस्तत पंक्ति जयशंकर प्रसाद की कामायनी से लिया गया है। व्याख्याकामायनी महाकाव्य का यह प्रथम सर्ग है। इसमें प्रसाद जी लिख रहे हैं कि हिमालय पर्वत की ऊंची चोटी पर, शिला की शीतल छाया में एक पुरुष बेठा था।

ओर वह अश्रुपूर्ण नेत्रों से जल प्रलय के फलस्वरुप उत्पन्न हुए उस अपार जल राशि को देख रहा था। प्रसाद जी कह रहे हैं कि उस पुरुष के नीचे जल और ऊपर हिम था। वह अपने चारों तरफ जल तत्व की ही प्रधानता देखता है।

एक तरल रूप में था तो दूसरा ठोस रूप में था। जल तत्व एक होते हुए भी दो रूपों में विद्यमान था। एक सघन और एक तरल रूप में था। उसी प्रकार ईश्वर की सत्ता एक होने पर भी सृष्टि में विविध रूपों में परिभाषित होती है।

अर्थात् ईश्वर जड़ या चेतन आत्मा दोनों में ही व्याप्त होते है। सृष्टि में उनकी सत्ता दृष्टिगोचर होती है। प्रस्तुत पंक्तियां शंकराचार्य के अद्वैतवाद से प्रभावित है।

प्रसाद जी ने यहां एक ही ब्रह्म की व्यापकता को सिद्ध करने के लिए, चेतन जल और जड़ हिम का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

वहीं पास में ही उस तरुण तपस्वी की दीर्घ आकृति के समान, लंबे-लंबे कुछ देवदारू के वृक्ष थे।

ये बर्फ से ढक जाने के कारण बिल्कुल सफेद दिखाई दे रहे थे। ऐसा लगता था कि मानो शीत से ठिठुर जाने के कारण, वे पत्थर के समान अकड़ कर रहे गये हो। अब उनमें किसी प्रकार की गति या कंपन शेष नहीं रह गया।

यहां कवि देवदारू के वृक्षों से उस व्यक्ति के आकार की तुलना कर रहे है। और इससे मनु की शारीरिक स्थिति की व्याख्या की है। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

साथ ही मनु के आसपास के वृक्षों को शीत के प्रकोप से ठिठुरा हुआ दिखाया है। उन्होंने इसके माध्यम से, मनुष्य के दु:ख से प्रकृति का भी विषादमग्न होना चित्रित किया है।

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प्रश्न 2 पशु नहीं, वीर तुम समर-शूर क्रूर नहीं, काल………………………-बन्ध छन्द ज्यों, डूबे आनन्द में सच्चिदानन्द रूप।

उत्तर- संदर्भ-प्रस्तुत पंक्ति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘जागों फिर एक बार’ से लिया गया है।

व्याख्या-भारतवासियों को उनकी शक्ति का स्मरण कराते हुए कहते है कि तुम पशु नहीं हो तुम युद्ध में पराक्रम दिखाने वाले वीर योद्धा हो,

तुम क्रूर आचरण करने वाले नहीं हो तुम तो न्याय के लिए वीरता का प्रदर्शन करने वाले हो तुम कालरुपी चक्र में दवे हुए राजकुमार हो तथा युद्धक्षेत्र के श्रेष्ठ योद्धा हो परन्तु तुम इस तरह क्यों हो? लोकाचार तो माया के बंधन है और तुम हमेशा ही इस सवसे मुक्त रहे हो।

जिस प्रकार बाधाओं से अथार्त यति, विराम, लघु और गुरु आदि नियमों के बंधन से मुक्त रहने वाले अथार्त मुक्त छन्द कविता भावपूर्ण लगती है वैसे ही तुम सदा संसारिकता से मुक्त रहकर सच्चितान्न्द अथार्त परंव्रहम के निमग्न रहते हो।

इस देश के कण-कण में अणु-परमाणुओं में ऋषियों के महामंत्र व्याप्त हैं जो मानव के सुखद एवं मुक्ति प्रदान करने वाले हैंBHDE 144 Free Assignment In Hindi

इसलिए हे! भारतवासियों तुम सदा से ही महान रहे हो तुम्हारे मन में जो दीनता, कायरता की भावना तथा काम वासनाओं की आसक्ति के भाव उत्पन्न होते रहें है वे सभी नष्ट होने वाले है।

अतः तुम ब्रह्मस्वरूप हो यह समस्त विश्व तुम्हारे चरणों की धूल से भी तुच्छ है।

आशय यह है कि तुम परमात्मा की सृष्टि के सर्वाधिक सवसे शक्तिशाली प्राणी हो अतएव तुम अपनी शक्ति को पहचानों और फिर से जाग जाओ।

कविता में कवि भारत के अतीत की गौरव-गाथा को स्मरण करते हुए देशवासियों को नई उत्साह और ओजस्विता को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

वे ऐतिहासिक परिवेश की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि भारत का अतीत बहुत ही गौरवशाली था। हमारे यहाँ के वीर युद्ध-क्षेत्र में प्राणों की बाजी लगाकर अमरत्व को प्राप्त हो जाते थे।

ऐसे ही वीर योद्धाओं की गौरव गाथा का गुणगान करते हैं। यहाँ के समुंद्र के विशाल नदियों और उनके तटों पर रहने वाले लोगों अथार्त सिन्धु सभ्यता के लोगों ने भी अनेक बार गाया था।

इसलिए जव-जव विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत पर आक्रमण किया है। तव-तब यहाँ के वीरों ने चतुरंगी सेना के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। इसी तरह जब विदेशियों ने आक्रमण किया तब गुरु गोविंद सिंह जी ने यह घोषणा किया था कि- “सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा।”

अथार्त “जब तक सवा-सवा लाख शत्रुओं पर अपने एक वीर को समर्पित नहीं करूंगा तब-तक मैं अपने नाम को सार्थक नहीं मानूंगा।” कवि कहते है कि वीर लोग इस राग को सुनकर और भी उत्साह से झूमने लगते है।

प्रश्न 3 तीस कोटि संतान नग्न तन,अर्ध क्षुधित, शोपित निरस्त्र जन, मूढ़,…………………………..शरदेन्दु हासिनी।

उत्तर- संदर्भ-प्रस्तुत अवतरण सुमित्रानन्दन पंत द्वारा रचित ‘भारतमाता’ कविता से उद्धृत है। इसमें पराधीनता काल में भारत की जो दुर्दशा थी, उसका भावपूर्ण तथा यथार्थ चित्रण किया गया है।

व्याख्या – कवि वर्णन करते हुए कहता है कि भारतमाता की तीस करोङ सन्तान गरीबी के कारण नंगे बदन है, ये आधा पेट भोजन मिलने से व्यथित, शोषण से ग्रस्त तथा प्रतिरोध करने में असमर्थ हैं।

ये अन्धविश्वासों से ग्रस्त होने से अज्ञानी हैं, असभ्य, अशिक्षित एवं गरीब हैं। ये अत्याचारी के सामने सदा झुके हुए – दबे हुए रहते हैं।

भारत माता पेठों के नीचे रहती हैं, अर्थात् भारतवासी गरीबी के कारण पेडों के नीचे निवास करते हैं. इनके पास उचित आवास-व्यवस्था नहीं है तथा ये खुले आसमान के नीचे सोने की विवश हैं।

कवि कहता है कि भारत भूमि पर सोने के समान मूल्यवान् धान उगता है, फिर भी आम भारतीय नागरिक या खेतिहर कृषक अत्याचारी शासकों एवं शोषकों के चरणों में लोटता है,

उनका गुलाम बना रहता है। भारत के किसान का मन धरती के समान सहिष्णु और कुंठाग्रस्त है, वह करुण विलाप से काँपता हआ भी अधरों से मन्द हास्य के साथ मौन रहता है।

शरत्कालीन चन्द्रमा जैसे राहु से ग्रस्त होने से धूमिल लगता है, उसी प्रकार विदेशी शासकों की नृशंस बर्बरता एवं अन्याय से भारतीयों का भाग्य रूपी चन्द्रमा सदा ग्रसित रहता है।

आशय यह है कि प्राकृतिक सौन्दर्य से सम्पन्न होने पर भी भारतीयों का जीवन कष्टों से घिरा रहता है।

विशेष BHDE 144 Free Assignment In Hindi

(1. यह कविता आजादी से दस वर्ष पूर्व की रचना होने से भारत की जनसंख्या तीस करोङ बतायी गई है। उस समय भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अज्ञान, अशिक्षा एवं गरीबी की जो स्थिति थी, कवि ने उसका यथार्थ चित्रण किया है।

(2. पराधीनता काल में अंग्रेज शासक एवं जमींदार आदि जगत् का खूब शोषण करते थे, खेतिहर कृषक सदा गरीबी में रहते थे। कवि ने उनकी मजबूरी की सुन्दर व्यंजना की है।

(3. शब्दावली तत्सम एव मुक्त छन्द की तुकान्त गेयता द्रष्टव्य है।

(4. अनुप्रास, परिकर एवं मानवीकरण अलंकार प्रयुक्त है।

प्रश्न 4 जलते नभ में देख असंख्यक,स्नेहहीन नित कितने दीपक,जलमय सागर का उर जलता, विद्युत ले घिरता है बादल! विहँस-विहँस मेरे दीपक जल!

उत्तर- संदर्भ- प्रस्तुत कविता महादेवी वर्मा की ‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’ से लिया है। आकाश में असंख्य तारे हैं लेकिन उनके पास स्नेह नहीं है। उनके पास अपनी रोशनी तो है पर वे दुनिया को रौशन नहीं कर पाते।

वहीं दूसरी ओर, जल से भरे सागर का हृदय भी जलकर बादल की रचना करता है जिससे पूरी दुनिया में बारिश होती है। दीपक को ऐसे ही अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए जलना चाहिए।

भावार्थ – प्रस्तुत पंक्तियाँ कवयित्री महादेवी वर्मा जी के द्वारा रचित कविता मधुर मधुर मेरे दीपक जल से उद्धृत हैं। इन पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री कहती हैं कि नभ में अनगनित तारे हैं।

परन्तु वे सभी स्नेह-हीन लग रहे हैं। इन सभी में ईश्वर की शक्ति और आस्था का कोई अस्तित्व नहीं है, जिराके कारण ये राशीभक्ति रूपी प्रकाश देने में राक्षगनहीं है।

जिस तरह सागर का जल जब गर्म होता है, तब भाप बनकर आकाश में बिजली से घिरा हुआ बादल में बदल जाता है। ठीक उसी तरह इस संसार में भी चारों ओर लोग ईर्ष्या-द्वेष, छल-कपट से घिरे रहते हैं।

आगे कवयित्री कहती हैं कि जिन लोगों में आस्था रूपी दीपक आलोकित होता है. वे बादलों की तरह शांत होकर शीतल जल बरसाते हैं। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

लेकिन ईर्ष्या-द्वेष अथवा विभिन्न बुराईयों वाले तोग पत भर में बिजली की तरह नष्ट हो जाते हैं । इसलए उक्त् पंक्तियों के माध्यम से कवियित्री दीपक को हँस-हँसकर निरन्तर जलने को कह रही हैं, ताकि ईश्वर भक्ति का पथ प्रकाशमान होता रहे तथा लोग उस सत्य पथ पर चलते रहें।

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खंड-ख

प्रश्न 5 छायावादी काव्य में राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति का स्वरूप क्या है?

उत्तर- ऐतिहासिक दृष्टि से जिसे गाँधीयुग कहा जाता है। साहित्यिक दृष्टि से उसे ही छायावादी युग की संज्ञा दी जाती है। तात्पर्य यह कि छायावादी काव्य गाँधी युग की मिट्टी में ही अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित हुआ।

गाँधीयुग राष्ट्रीय चेतना का उत्कर्ष काल था। उस समय भारतीय जनमानस में राष्ट्र-प्रेम का समुद्र हिलोरें मार रहा था।

अतः छायावादी काव्य से यह आशा करना स्वाभाविक ही था कि वह अपने युग का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्ट्रीय चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति करे किन्तु छायावादी काव्य के संबंध में यह आम धारणा है कि उसने अपने युग को प्रतिबिंबित करने या उसका प्रतिनिधित्व करने की बजाय उसकी उपेक्षा ही की है।

इस धारणा की पुष्टि करते हुए कहा जाता है कि जिस समय देश की जनता स्वतंत्रता संग्राम में जूझते हुए अंग्रेजों के अत्याचारों की पीडा झेल रही थी, BHDE 144 Free Assignment In Hindi

छायावादी कवि स्वप लोक में ल्पना की कूची से रंगीन चित्र गढने में लीन थे। इसीलिए छायावादी काव्य को पलायनवादी भी कहा जाता है,

जो धरती की वास्तविकताओं से मुँह मोडकर स्वप* लोक की सैर में रुचि लेता है। किन्तु छायावादी काव्य को पलायनवादी काव्य की संज्ञा देना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

यह तो आंशिक सत्य को ही पूर्ण सत्य मान लेने जैसी भूल होगी। जो लोग छायावाद को रहस्यवाद अथवा प्रतीकवाद का पर्याय मात्र समझते हैं अथवा जो इसे केवल अंग्रेजी रोमेंटिक कवियों की अनुकरण पर रचा गया स्वच्छंदतावादी काव्य मानते हैं,

वे ही छायावाद को पलायनवादी घोषित करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि छायावाद में रहस्यवाद की आध्यात्मिक अनुभूति, प्रतीकवाद की ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता ओर प्रतीकात्मकता तथा स्वच्छंदतावाद की आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति, कल्पना की अतिशयता, सौन्दर्य के प्रति ललक, उन्मुक्त प्रेम की प्रवृत्ति, विस्मय की भावना तथा रूढियों और बंधनों से विद्रोह को धारण का समावेश है

किन्तु उसमें भारत के सांस्कृतिक तथा राष्ट्रीय नव-नागरण के विविध पक्षों – विवेकानन्द और रामतीर्थ की अद्वैतमूलक भक्ति भावना, रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विश्व बंधुत्ववाद, महात्मा गाँधी के मानवतावाद, राष्ट्रीयता की भावना और विदेशी शासन के प्रति विद्रोह का भी समावेश है।

वस्तुतः छायावाद की मुख्य भावभूमि मानवीय, राष्ट्रीय और सांस्कृतिक है।

आचार्य नंददुलारे बाजपेयी के शब्दों में – “छायावादी काव्यधारा का भी एक आध्यात्मिक पक्ष है किन्तु उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है।

उसे हम बीसवीं शताब्दी की मानवीय प्रगति की प्रतिक्रिया भी कह सकते हैं।” हिन्दी साहित्य कोश में भी छायावाद का पर्याय माना जा सकता था।BHDE 144 Free Assignment In Hindi

उसी तरह यदि वह केवल प्राचीन रूढियों के विरुद्ध विद्रोह की अभिव्यक्ति होता तो उसे स्वच्छंदतावाद से अभिन्न माना जा सकता था किनतु उसकी मूल प्रवृत्ति प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि रचनात्मक है,

जो भारतीय संस्कृति की जीवन परम्परा, राष्ट्रीयता की सशक्त आकांक्षा और नवीन मानवतावादी आदर्शों की प्रेरणा से अनुप्राणित है।

अतः छायावाद रहस्यवाद अध्यात्मवाद, स्वच्छंदतावाद, मानवतावाद, राष्ट्रीयता और सूक्ष्म सौन्दर्य बोध आदि विविध प्रवृत्तियों का समग्र रूप है। अर्थात् वह उस जागरण युग की प्रबुद्ध ।

आत्मा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है।” इस नवीन दृष्टिकोण के प्रकाश में छायावादी काव्य का राष्ट्रीय चेतना के साथ संबंध सहज हो जुड़ जाता है

किन्तु छायावादी काव्य में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति को प्रमाणित करने और उसके स्वरूप का निर्धारण करने के पूर्व उचित होगा कि उन कवियों के संबंध में भी हमारी धारणा स्पष्ट हो जावे जिन्होंने छायावादी काव्यधारा के उद्भव और विकास में यसोगदान दिया है।

सामान्यतः छायावादी काव्य की रचना का श्रेय केवल कवि-चतुष्ट्य के नाम से विख्यात चार कवियों प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी – को दिया जाता है किन्तु यह धारणा समीचीन नहीं है।

किसी भी नवीन काव्यधारा का अविर्भाव और अवसान अचानक या एकाएक नहीं होता। वह अनेक कवियों के क्रमशः योगदान का प्रतिफल होता है। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

अतः छायावादी काव्यधारा का उत्कर्ष भले ही कवि-चतुष्ट्य के काव्य में मान लिया जाये किन्तु उसका आविर्भाव और अवसान गढने वाले अन्य अनेक महत्वपूर्ण कवि रहे हैं।

प्रमुख छायावादी कवि सुमित्रानंदन पंत इसी तथ्य को स्वीकारते हुए कहते हैं कि “छायावादी काव्य के कवि-चतुष्ट्य तक सीमित कर देना मुझे विचार की दृष्टि से संगत नहीं प्रतीत होता।

अभिव्यंजना शैली, भाव-संपदा, सौन्दर्य बोध तथा काव्य-वस्तु आदि की दृष्टि से उस युग के आगे-पीछे अन्य भी अनेक समृद्ध कवि हुए हैं, जो छायावाद के उद्भव और विकास में सहायक हुए हैं।

उनमें से माखनलाल जी, मुकुटधर पांडे, रामनरेश त्रिपाठी, नवीन जी, सियाराम शरण जी, मोहन लाल महतो, उदयशंकर भट्ट, इलाचंद्र जोशी, डॉ. रामकुमार वर्मा, जानकी वल्लभ शास्त्री आदि अनेक लब्ध प्रतिष्ठ कवियों के नाम गिनाये जा सकते है।”

यह एक निर्विवाद तथ्य है कि पंत जी द्वारा गिनाये गये कवियों ने छायावादी काव्य धारा के उद्भव और विकास में किसी न किसी रूप में अपना योगदान दिया है।

अतः इन सभी को छायावादी कवि के रूप में मान्य कर छायावादी काव्य में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति का अनुसंधान करना उचित होगा। छायावादी काव्य में राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति की मुख्य तीन भाव-भूमियाँ है –

(1. भारत के स्वर्णिम अतीत का गौरव-गान।

(2. भारती की वर्तमान दयनीय दशा का चित्रांकन ओर

(3. भारत के उज्ज्वल भविष्य का रूपांकन।

इन तीनों भाव-भूमियों को एक सूत्र में बाँधने वाला कालक्रम ही नहीं मनोवैज्ञानिक क्रम भी है।

किसी भी देश का स्वर्णिम अतीत देशवासियों के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन का अक्षय स्रोत होता है।

शताब्दियों से गुलामी के बंधन में जकडे हुए भारतवासियों में व्याप्त हीनता की भावना को दूर कर उसमें आत्मगौरव और आत्म-विश्वास का संचार करने के लिए भारत के स्वर्णिम अतीत का गौरवगान आवश्यक था।

इसे अपनी पूर्णता तक पहुँचाने के लिए मातृभूमि वंदना, राष्ट्रप्रेम एवं जागरण-संदेश के गीतों को भी जोडा गया है।

प्रश्न 6 सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के काव्य की मूल संवेदना को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- निराला के पास महाकवि की वह सूक्ष्म दृष्टि थी जिसने अपने आस-पास के जीवन को बड़ी गहराई से देखा। निराला काव्य में छायावादी युग की अन्तर्वस्तु के सभी तत्व तो मिलते ही हैं, साथ ही प्रयोगशील एवं प्रगतिवादी विचारों की गहरी छाप भी मिलती है।

किंतु निराला सारे वादों की सीमा को पार करते चले गए हैं। निराला काव्य में संवेदना के मुख्य स्वर निम्न प्रकार से देखे जा सकते हैं BHDE 144 Free Assignment In Hindi

(1) राष्ट्रीयता की भावना-निराला नवजागरण काल के कवि हैं। राष्ट्र को पराधीनता के बंधन से मुक्त देखने की लालसा उस काल के प्रायः सभी कवियों के काव्य का मुख्य विषय रहा है।

निराला काव्य में राष्ट्रीय भावना का धरातल बड़ा विस्तृत और बहुरंगी है। निराला ने असंख्य गीतों में भारत के गौरव का गान, माँ भारती का शतशः स्मरण कर जातीय जीवन में उत्तेजना के प्राण फूंके हैं।

भारतीय जन मानस में उद्बोधन का संचार करते हुए निराला “तुलसीदास” में जागरण का सन्देश इस प्रकार से देते हैं:

“जागो, जागो आया प्रभात,
बीती वह, बीति अन्धरात।

इसके लिए कवि आत्म बलिदान हेतु माँ भारती के चरणों में भावपूर्ण समर्पण करते हुए कहता है

“बाधाएँ आएँ तन पर
देखू तुझे नयन निर्भर
क्लेदयुक्त अपना तन दूंगा
मुक्त करूँगा तुझे अटल,
तेरे चरणों पर देकर बलि
सकल श्रेय-श्रम-सिंचित फल।

(2) अद्धैत भावना-राष्ट्रीयता के अतिरिक्त अद्वैत तत्व की संवेदना का संस्पर्श निराला काव्य की अन्तर्वस्तु में मुख्यता से गाया गया है। निराला के जीवन पर रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानन्द के विचारों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा।

“परिमल”, अनामिका”, “गीतिका”, “अर्चना”, “बेला” एवं “अणिमा” इत्यादि में निराला की अद्धैत भावना को देखा जा सकता है।

निराला का प्रसिद्ध गीत “तुम तुंग हिमालय श्रृंग और मैं चंचल गीत सुर सरिता” इसी भाव भूमिका की अभिवयक्ति करता है। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

(3) करुणा एवं पीड़ा-निराला काव्य में पीड़ा एवं करुणा की गहरी व्यंजनाएँ देखने को मिलती हैं। कवित की संवेदना का विस्तार स्वर से लेकर जगती की विभिन्न बदलती हुई स्थितियों तक छाया हुआ है।

निराला का “सरोज स्मृति”, “विधवा”, “मैं अकेला”, “स्नेह निर्झर बह गया है” इत्यादि में कवि-हृदय की आंतरिक पीड़ा एवं करुणा का उत्कृष्ट रूप देखा जा सकता है।

(4) व्यंग्य एवं आक्रोश-निराला काव्य की संवेदना में व्यंग्य एवं आक्रोश का भाव बड़े पैने रूप से व्यक्त किया गया है।

सामाजिक विषमताओं के प्रति निराला सदैव ही विद्रोही रहे हैं। निराला को “महाप्राण” की उपाधि से साहित्य जगत ने सम्मानित किया।

उनके महाप्राण होने की प्रामाणिकता व्यंग्य एवं आक्रोश के गहरे मर्मस्पर्शी रूपों में मिलती है। निराला की संवेदना वह पारस है

जिसके स्पर्श मात्र से जगती के सम-विषम भाव स्वर्ण के समान अमूल्य बन जाते हैं। “कुकुरमुत्ता”, “गर्म पकौड़ी”, “बादल राग”, “दौड़ते हैं बादल यह काले काले”, “कुत्ता भौंकने लगा”, “घोड़ी के पेटों में बहुतों को आना पड़ा”, “दगा की”, “झींगुर डटकर बोलो”, “डिप्टी साहब आये” और “महगूं मंहगा रहा” जैसे रचनाओं में व्यंग्यात्मकता का हास्य एवं आक्रोश जनित रूप काफी सशक्त बन पड़ा है।

हास्य व्यंग्य का निम्न रूप निराला के उसी भाव को साकार करता हैजमींदार का सिपाही लट्ठा कान्धे पर डाले आया और लोगों की ओर देखकर कहा, BHDE 144 Free Assignment In Hindi

“डेरे पर थानेदार आये हैं;
डिप्टी साहब ने चन्दा लगाया है,
एक हफ्ते के अन्दर देना है।
चलो बात दे आओ।”

देखा जाये तो निराला की काव्य-संवेदना इतनी विराट और विस्तृत है कि उसमें उच्च से उच्च भाव भूमि एवं निम्न क्षुद्र अंश तक समाया हुआ है।

छायावादी काव्य वस्तु के सभी प्रमुख तत्व भी उसमें समाये हैं और आधुनिक कविता के समस्त नए-नए प्रयोगों की भाव भूमि भी उसी में समाविष्ट है।

नारी जीवन के प्रति करुणा एवं सम्मान का भाव, प्रेम की निश्छल अभिव्यक्ति, प्रकृति के विभिन्न रूपों की भावपूर्ण प्रस्तुति, मानवतावादी दृष्टि, सर्वमंगल की कामना, परमात्मा के प्रति अटूट विश्वास, जीवन की नश्वरता का बोध, सौन्दर्यानुभूति के साथ-साथ रहस्यानुभूति के अनेक भाव निराला की काव्य संवेदना में भरे पड़े हैं।

प्रश्न 7 महादेवी वर्मा की काव्य भाषा की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर- महादेवी छायावाद द्वारा प्रदत्त अनेक कला-विषयक विशेषताओं को ग्रहण करते हुए अपनी भाषा का सहज शृंगार करती है।

कहा जाता है कि खड़ी बोली को काव्योचित भाषा का रूप देने का श्रेय प्रधानतः पंत जी को है किंतु यह भी सत्य है कि उसे सुकोमल मार्मिकता देने का गौरव जितना महादेवी को है

उतना अन्य किसी को नहीं। महादेवी प्रत्येक शब्द को ध्वनि, वर्ण और अर्थ की दृष्टि से नाप-तोल और काट-छाँटकर सूक्ष्मतम भावनाओं को कोमलतम कालेवर देती है।

उनकी शैली में तरलता और मार्दव है तो भाषा संस्कृत गर्भित खड़ी बोली होकर भी अत्यन्त परिष्कृत, शिल्वित तथा मधुर कोमल है।BHDE 144 Free Assignment In Hindi

व्याकरणिक नियमों से स्वच्छन्द रहने वाली महादेवी कभी शब्दों के निरंतर प्रयोग से उसमें एक विशिष्ट अर्थ कर देती है।

“पंत और महादेवी” निबन्ध में छायावाद के जाने-माने आलोचन शांतिप्रिय द्विवेदी लिखते हैं-“पंत ने जिस खड़ी बोली को, रमणीयता दी, महादेवी ने उसे मार्मिकता देकर प्राण प्रतिष्ठा कर दी।

ताजमहल के भीतर उन्होंने दीपक जला दिया। भाषा के सौन्दर्य में पंत बेजोड़ हैं, अभिव्यक्ति की मार्मिकता में महादेवी।”

शब्द-निरूपण, वर्ण-विन्यास, नाद-सौन्दर्य एवं उक्ति सौन्दर्य-सभी दृष्टियों से महादेवी का भाषा पर सहज अधिकार है।

शब्द-कवयित्री महादेवी के शब्द-शब्द में काव्य के दर्शन होते हैं। साधना की उष्मा से दमकते शब्द-माणिक्य कविता के परिवेश एवं वातावरण को जीवन्त बना देते हैं।

“शलभ मैं शापमय वर हूँ” या गई वह अधरों ) की मुस्कान मुझे मधुमय पीड़ा में बोर” जैसी अनेकों पंक्तियाँ जिनका प्रत्येक शब्द अपने में एक चित्र को समेटे हैं-वास्तव में सराहनीय है।

“नीहार” से “दीपशिखा” तक की यात्रा में तत्सम, तद्भव, देशज तथा विदेशी शब्दों का सुटीक प्रयोग महादेवी के संयमी शिल्पी होने का प्रमाण है। महादेवी भाव तथा चित्रों के अनुरूप वर्णों का संकलन एवं परिमार्जन करती हैं।

भीर (भीड़), पंखुरियाँ, सपने (स्पप्न) आदि अनेकों ऐसे उदाहरण दिए जा सकते हैं जो लालित्य-विधान में सहायक होते हैं। पीड़ा और करुणा को माधुर्य-गुण से संकलित करने की कला निश्चित ही अनोखी है-

      रूपसि तेरा-धन-केश-पाश 
      श्यामल-श्यामल कोमल-कोमल
       लहराता सुरभित केश-पाश

करुण, मधुर, सुन्दर, श्यामल आदि शब्दों की द्विरुकित माधुर्य गुण को भी द्विगुणित कर देती है इसी प्रकार “गया गया क्या-क्या उत्पात”, “भरकर छलक-छलक जाती”, “चाह-चाह थक-थक कर”, “सिहर-सिहर उठता सरिता उरे तथा पलक-पलक, रोम-रोम, साँस-साँस, बुझ-बुझ, फैला-फैला, घुल-घुल, घिर-घिर कन-कन, झूम-झूम तथा पल-पल” जैस अनेकों देखे जा सकते हैं।

महादेवी की कविता में ओज तथा प्रसाद गुण के दर्शन भी होते हैं। जागरण का एक गीत देखिए, जिसमें पौरुष पूर्ण “ओज गुण” प्रशंसनीय है BHDE 144 Free Assignment In Hindi

      बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले? 
     पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?

इसी प्रकार चातक, दीपक, कुल बुल एवं कांह अभी अप्रस्तुतों द्वारा जिस करुण भाव को वे व्यंजित करती है, उसमें सरलता एवं बोधगम्यता से प्रसाद गुण का निर्वाह हो जाता है।

महादेवी की भाषा में उक्ति सौन्दर्य, वक्रोकित-सौन्दर्य लिगात्मकता, ध्वन्यात्मकता एवं व्यंग्य सौन्दर्य आदि के भी दर्शन होते हैं।

“घोरतम छाया चारों ओर, घटाएँ आई घनघोर” में अविधा का सुन्दर प्रयोग है तो “कौन है वह सम्मोहन राग, खींच लाया तुमको सुकुमार?” में सुन्दर लाक्षणिक प्रयोग देखा जा सकता है। “खींच लाना” सजीव का ही काम है और यहाँ मुख्यार्थ बाधित है।

किसी व्यक्ति विशेष की ओर संकेत है। इसी प्रकार लक्ष्मार्थ से आगे व्यंजित होने वाला व्यंग्यार्थ भी उनकी कविता में कई स्थानों पर मखर है।

परिवेश को चित्रित कर महादेवी प्रेमिका के मिलन क्षणों की सुखद अनुभूति को व्यंजित करने में किनी सिद्धहस्त है। देखिए

     गुलालों से रवि का पथ लीप 
     जला पश्चिम में पहला दीप 
     विहँसती संध्या भरी सुहाग
     दृगों से झरता स्वर्ण पराग।

ग्रामीण, लौकिक तथा विदेशी शब्दों का प्रयोग भी उनके काव्य को सहज-स्वाभाविक स्पर्श देता है। रैन (रात्रि), बता (वायु), चितचोर, विछोह, होले, करतार, मरम, बिछलना तथा धावा आदि ग्रामीण और ब्रजभाषा के शब्द भी यहाँ मिलते। हैं BHDE 144 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 8 जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ के चिंता सर्ग के मूल स्वर को रेखांकित कीजिए।

उत्तर- ‘कामायनी’ आधुनिक काल की महत्वपूर्ण एवं बहुचर्चित काव्य कृति है। प्रसाद ने कामायनी में भारत के अतीत तथा उसकी प्राचीन संस्कृति के अतिरिक्त जीवन के विविध स्वरूपों और उसकी विभिन्न स्थितियों का भी चित्रण किया है, जो किसी भी महाकाव्य में सहजता से उपलब्ध होते हैं।

जल-प्लावन देवों की उच्छंखल भोग-वृत्ति और निर्बाध आत्मतुष्टि का प्रकृति के द्वारा प्रतिकार था। और विध्वंस के उपरांत, मनु मानव-संस्कृति की स्थापना करने वाले आदि पुरुष कहे जाते हैं।

इस जल-प्लावन से आरम्भ होने वाली मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा के अंशों का विभिन्न पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है। और इसी जल-प्लावन पर प्रसिद्द पंक्तियों से कामायनी शुरू होती है:

हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर
बैठ शिला की शीतल छाँह,
एक पुरुष भीगे नयनों से
देख रहा था प्रलय प्रवाह।
नीचे जल था ऊपर हिम था
एक तरल था एक सघन,
एक तत्त्व की ही प्रधानता

  • कहो उसे जड़ या चेतन। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

यह तो सभी को पता है कि कामायनी केवल मनु-श्रद्धा-इड़ा आदि का इतिवृत्तांत भर नहीं है, सर्गों के नामों से ही संकेत मिल जाता है कि यह मानव के अंतस की यात्रा है।

प्रसाद कामायनी के आमुख में लिखते भी हैं कि इस कथा में मन-श्रद्धा-इझा “अपना ऐतिहासिक अस्तित्व रखते हुए भी, सांकेतिक अर्थ की भी अभिव्यक्ति” करते हैं मनु मन के रूपक हैं,

और उसके दो पक्ष है :- श्रद्धा हदय या भाव पक्ष की प्रतीक हैं, और इडा मस्तिष्क या बुद्धि पक्ष की कामायनी मनुष्य) की मन के इन दोनों पक्षों के मनन से मानवता की विकास-यात्रा है।

तो इतना तो लगता है कि कामायनी को समझने से जीवन की समझ बढ़ेगी। परन्तु कामायनी बड़ी सघन है। अगर पढ़तेपढ़ते कहीं दुरुह और सूक्ष्म पर अटक जाता हूँ तो सांसारिक कर्मों में फँसकर भटकने का बहाना मिल जाता है।

सबसे प्रथम सर्ग है चिंता। हम आय वृद्धि के साथ और कुछ सीखें या न सीखें, बिना किसी प्रयास के ही सहज चिंता करना जरूर सीख जाते हैं।

मनुष्य और चिंता जैसे पर्याय हो। ज़रा सोचिए आज आपने क्या किया? भले ही कुछ और न किया हो लेकिन किसी न किसी बात की चिंता जरूर की होगी।

कभी अतीत की चिंता, कभी भविष्य की चिंता; वर्तमान तो मतलब घर की मुर्गी दाल बराबर, जब जी चाहे काटो, पकाओ और खाओ। तो मनु की यात्रा भी चिंता से ही आरम्भ होगी, प्रसाद कहते हैं:

चिंता करता हूँ मैं जितनी
उस अतीत की, उस सुख की,
उतनी ही अनंत में बनती
जाती रेखाएँ दुख की।
और आगे कहते हैं:
मणि-दीपों के अंधकारमय जो
अरे निराशापूर्ण भविष्या
देव-दम्भ के महामेघ में
सब कुछ ही बन गया हविष्य।
(हविष्य: हवन सामग्री)

ये चिंता भी ईश्वर से कम नहीं है, इसके अनेक रूप हैं :- अतीत में जो बुरा था वह क्यों था, उसकी चिंता; अतीत में जो अच्छा था वह अब क्यों नहीं है, उसकी चिंता; अतीत में जो अच्छा नहीं हुआ वह क्यों नहीं हुआ,

उसकी चिंता; अभी अगर दुःख है तो कब तक रहेगा, उसकी चिंता; और अगर सुख है तो कहीं चला न जाए उसकी चिंता। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

ऐसे ही चिंता के कितने ही रूप हैं, और अपनी ही नहीं दूसरों से तुलना की न जाने कितनी ही चिंताएँ।

जैसे गणपति, राम, कृष्ण, शिव से लेकर दुर्गा और काली तक ईश्वर-रूप के सहस्त्रों विकल्प हैं, जो मन को भाए उसे पूजो; वैसे ही चिंता के सहस्त्रों रूप हैं, आपको जो भाए उसे पकड़ के बैठ जाओ।

खंड -ग

प्रश्न 9 छायावादी कवियों के प्रगतिशील तत्वों का विवेचन कीजिए।

उत्तर- कविता में निरन्तर नए सोच तथा सामाजिक सरोकार की गहनता का परिचय देते आ रहे थे।

गौरतलब है कि जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकांत त्रिपाठी निराला छायावाद के दौर के अग्रदूत के रूप में ख्यात थे। जो भी हो, हिंदी में प्रगतिवाद का विधिवत् प्रारंभ 1936 से माना जाता है।

‘छायावाद” जैसा कि पहले ही चर्चा की गई है, अपने आप में कविता का एक ऐसा युग है जिसका सम्बन्ध भाव-जगत से हे, हृदय की भूमि से है।

भावलोक की तो सत्ता ही अनुभव विषय हे, हृदय से जानने, समझने ओर महसूस करने की वस्तु है। उसी छायावाद में समय समय पर अनेक रचनाकारों ओर कवियों का समावेश होता रहा।

कभी वहाँ “बृहतत्रयी” के रूप में “प्रसाद”, “निराला” और “पन्त” की चर्चा की जाती रही तो कभी बृहच्चतुष्ट्य के रूप में इन तीनों कवियों के साथ “महादेवी’ का नाम जोडकर देखा जाता रहा।

कुल मिलाकर छायावाद प्रमुख कवियों या आधार स्तम्भों में इन चारों महाकवियों की चर्चा, किसी न किसी रूप में चलती ही रही। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

यह अलग बात है कि इन चार कवियों के साथ.साथ छायावाद के अन्य कवियों में, उत्तरछायावादी कवि या गौण छायावाद कवि कहकर माखनलाल चतुर्वेदी, डा. रामकुमार वर्मा, जानकीबल्लभ शास्त्री, हरिकृष्ण प्रेमी, जनार्दन झा “द्विज’, लक्ष्मी नारायण मिश्र, इलाचन्द्र जोशी, डा. नगेन्द्र, चन्द र्पकाश सिंह, विद्यावती कोकिल, तारा पाण्डेय, मुकुटधर पाण्डेय, उदय शंकर भट्ट तथा नरेन्द्र शर्मा आदि कवियों को भी इसमें समाविष्ट किया जाता रहा।

छायावाद के चार प्रमुख कवियों से इतर इन सभी कवियों के काव्य और उनकी प्रवृत्तियों को लेकर विवाद भी चलते रहे परन्तु इन्हें छायावाद के प्रमुख कवियों में सर्वमान्यता से शामिल नहीं किया जा सका।

प्रश्न 10 सुमित्रानंदन पंत के काव्य में अभिव्यक्त प्रकृति सौंदर्य पर प्रकाश डालिए।

उत्तर- सुमित्रानंदन पंत छायावादी काव्य के चार प्रमुख स्तंभ में से एक माने जाते हैं, वह प्रकृति के सुकुमार कवि कहे । जाते है। उनके काव्य की काफी सारी विशेषताए है, जिनमें प्रकृति चित्रण सबसे प्रमुख है।

प्रकृति चित्रण-छायावादी कविता की एक प्रमुख विशेषता रही है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता इसके लिए इस धारा के कवियों ने अपनी आत्मनिर्भर व्यक्ति के लिए स्वच्छंद कल्पना और प्रकृति का सहारा लिया। पंत के काव्य में प्रकृति के प्रति अपार प्रेम और कल्पना की ऊँची उड़ान है।

सुमित्रानंदन पंत को अपने परिवेश से ही प्रकृति प्रेम प्राप्त हुआ है। पंत के काव्य में प्रति अपार प्रेम और कल्पना की ऊँची उड़ान है।

सुमित्रानंदन पंत को परिवेश से ही प्रकृति प्रेम प्राप्त हुआ है अपने प्रकृति परिवेश के विषय में उन्होंने लिखा है-“कविता की प्रेरणा मुझे सबसे पहले प्रकृति निरक्षण से मिली हैं,

जिसका श्रेय मेरी जन्मभूमि कुर्माचल प्रदेश को है कवि जीवन से पहले भी याद है मैं घंटो एकांत में बैठा प्रकृति दृश्य को एकटक देखा करता था। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

“छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाते तेरे बाल-जाल में
उलझा हूँ में कैसे लोचन?

सुमित्रानंदन पंत के यहाँ प्रकृति निर्जीव वस्तु होकर एक साकार और सजीव सत्ता के रूप में उपस्थित हुई है, उसका एक-एक अणु प्रत्येक उपकरण कभी मन में जिज्ञासा उत्पन्न करता है संथ्या, प्रातः, बादल, वर्षा, वसंत, नदी, निर्झर, भ्रमर, पक्षी आदि सभी उसके मन को आंदोलित करते हैं।

यहाँ संध्या का एक जिज्ञासा पूर्ण चित्र दर्शनीय हैं। सुमित्रानंदन पंत की बहुत सी प्रकृति संबंधी कविताओं में उनकी जिज्ञासा भावना के साथ ही रहस्य भावना भी व्यक्त हुई है।

“प्रथम रश्मि”, “मौन निमंत्रण” आदि जैसे बहुत सी कविताएँ तो मात्र जिज्ञासा भाव को व्यक्त करती है। इसके लिए “प्रथम रश्मि” का एक उदाहरण पर्याप्त होगा

“प्रथम रश्मि का आना रंगीनी
तूने कैसे पहचाना
कहाँ-कहाँ है बाल विहंगिणी
पाया तूने यह गाना।”

आलंबन रूप-जब प्रकृति में किसी प्रकार की भावना का अध्याहार न कर प्रकृति का ज्यों का त्यों वर्णन किया जाता है। जो वह आलंबन रूप होता है,

पंत जी के काव्य में प्रकृति चित्रण का यह रूप पर्याप्त मिलता है”गिरी का गौरव गाकर हग्ग फर-फर मंद में नस-नस उत्तेजित कर मोती की लड़ियों से सुन्दर झड़ते हैं झाग भरे निर्झर।”प्रकृति व्यक्ति की भावनाओं को भी उदीप्त करती है। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

उसका वह उद्दीपन रूप होता है उस रूप में प्रकृति का वर्णन बहुत ही अधिक हुआ है विशेषता विरह काव्य में। अलंकारिक रूप-इस रूप में प्रकृति का उपयोग अलंकारों के प्रयोग के लिए किया जाता हैं- ।

“मेरा पावस ऋतु जीवन
मानस-सा उमड़ा अपार मन
गहरे धुंधले धुबे सांवले
मेघों से मेरे भरे नयन।”

प्रश्न 11′जागो फिर एक बार कविता का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- ‘जागो फिर एक बार’ कविता के रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी है। निराला जी की यह कविता ‘परिमल’ कविता संग्रह में संकलित है। जिसका प्रकाशन 1930 में हुआ था। इस कविता में कवि ने भारत के अतीत का गौरवमय चित्रण किया है।

जागो फिर एक बार!
समर अमर कर प्राण,
गान गाये महासिन्धु-से सिन्धु-नद-तीरवासी!
सैन्धव तुरंगों पर चतुरंग चमू संग;
“सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा
गोविन्द सिंह निज नाम जब कहाऊंगा”
किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति दुर्जय संग्राम राग,

कविता में कवि भारत के अतीत की गौरव-गाथा को स्मरण करते हुए देशवासियों को नई उत्साह और ओजस्विता को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

वे ऐतिहासिक परिवेश की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि भारत का अतीत बहुत ही गौरवशाली था। हमारे यहाँ के वीर युद्ध-क्षेत्र में प्राणों की बाजी लगाकर अमरत्व को प्राप्त हो जाते थे। ऐसे ही वीर योद्धाओं की गौरव गाथा का गुणगान करते हैं।

यहाँ के समंद्र के विशाल नदियों और उनके तटों पर रहने वाले लोगों अथार्त सिन्धु सभ्यता के लोगों ने भी अनेक बार गाया था।

इसलिए जब-जब विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत पर आक्रमण किया है। तब-तब यहाँ के वीरों ने चतुरंगी सेना के साथ उनका डटकर मुकाबला किया।BHDE 144 Free Assignment In Hindi

इसी तरह जब विदेशियों ने आक्रमण किया तब गुरु गोबिंद सिंह जी ने यह घोषणा किया था कि- “सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा।”

अथार्त “जब तक सवा-सवा लाख शत्रुओं पर अपने एक वीर को समर्पित नहीं करूंगा तब-तक मैं अपने नाम को सार्थक नहीं मानूंगा।”

कवि कहते है कि वीर लोग इस राग को सुनकर और भी उत्साह से झूमने लगते है। इस राग से वीर योद्धाओं में दो गुणा शक्ति बढ़ जाता था।

अथार्त शत्रु उनपर विजय नहीं पा सकते थे। गुरु गोबिंद सिंह और उनके योद्धा बारह महीनों तक खून की होली खेलते थे।

आज भी गुरु गोबिंद सिंह जैसे शेर है किन्तु आज उन शेरों के माँद में शियार घूस गया है इन्हें मारने के लिए। हे! भारतीय वीरों अब तुम जागों और सतर्कता के साथ उनसे सामना करों। उसका दमन करों।

    सत, श्री अकाल, भाल-अनल......... 
    जहाँ असान है सहस्त्रार, जागों फिर एक बार

कवि मातृभूमि के खातिर बलिदान होने वाले सिक्ख वीरों की प्रशंसा करते हुए कहते है कि मुगलों के विरुद्ध गुरु गोबिंदसिंह जी ने जब ‘सत्य श्रीअकाल’ का घोस करते हुए युद्ध क्षेत्र में उतरे तब उनके ललाट पर क्रोध रूपी आग की ज्वाला प्रज्वलित हो रही थी। उस धधकती हुई आग में काल भस्म हो गया था।

तीनों गुण अथार्त सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तथा दैविक, दैहिक और भौतिक ये तीनों ताप भी भस्म हो गए थे। हे! भारतवासियों जिसके परिणामस्वरुप तुम शत्रुओं से अभय हो गए थे। उस समय तुम मृत्यु को जितने वाले देव शिवाजी के सामान बन गए थे। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

तुम योग साधना के द्वारा सातों आवरणों को भेदकर तथा समस्त शोक से रहित होकर उस उच्चतम स्था के अधिकारी बन गए थे जहाँ पर सिद्ध योगी लोग सांसारिक कष्टों से मुक्त होकर, सहस्त्र-दल कमल पर आसन लगाकर परमानंद में लिन हो जाते हैं। इसलिए तुम फिर से एक बार जागकर उसी शौर्य का प्रदर्शन करो।

सिंहनी की गोद से छीनता रे शिशु कौन?……….
स्मरण करों बार-बार जागो फिर एक बार।

इन पंक्तियों में कवि ने वीरों को वसुंधरा की दुहाई देकर देशभक्ति का ओजस्वी स्वर व्यक्त किया है।

कवि कहते है कि इस तरह की शक्ति और साहस किस्मे है जो शेरनी के गोद से उसके बच्चे को बलपूर्वक छीन सके क्या शेरनी जीते-जी अपने बच्चे को छीनने देगी और वह छुओ बैठी रहेगी? अथार्त सिंहनी ऐसा तब तक नहीं होने देगी जबतक उसके प्राण रहेंगे कवं भेद ही ऐसी होती है

जो अपने बच्चे को गोद से छीने जाने के बाद चुप रहती है वह दुर्बल होने के कारण अपने बच्चे के छीने जाने के बाद भी टकटकी लगाकर देखती रहती है

वह अपने संतान के छीने जाने के बाद जीवन भर दुखी होकर आँसू बहाती रहती है अपने व्यथित जीवन पर रोटी रहती है।

क्या शक्तिशाली प्राणी इस तरह के अत्याचार को सहकर जीवित रह सकता है? अथार्त नहीं वह अत्याचार सहने से की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझेगा। आते तो यही है कि शक्तिशाली व्यक्ति ही जीवित रहता है।

यह उक्ति पाश्चात चिंतन की दें नहीं है, यह तो गीता का उपदेश है अतः गीताके कर्मयोग के उपदेश में बार-बार स्मरण करो जागो और जागकर तुम अपने शक्तिशाली स्वरुप को पहचानों।

पशु नहीं, वीर तुम, समर-शूर, क्रूर नहीं…
पड़ रज भर भी नहीं पूरा यह विश्व-भार।
जागो फिर एक बार।

इन पक्तियों में कवी ने भारतवासियों को उनकी शक्ति का स्मरण कराते हुए कहते है कि तुम पशु नहीं हो तुम युद्ध में पराक्रम दिखाने वाले वीर योद्धा हो, तुम क्रूर आचरण करने वाले नहीं हो तुम तो न्याय के लिए वीरता का प्रदर्शन करने वाले हो तुम कालरुपी चक्र में दबे हुए राजकुमार हो तथा युद्धक्षेत्र के श्रेष्ठ योद्धा हो परन्तु तुम इस तरह क्यों हो?

लोकाचार तो माया के बंधन है और तुम हमेशा ही इस सबसे मुक्त रहे हो। जिस प्रकार बाधाओं से अथार्त यति, विराम, लघु और गुरु आदि नियमों के बंधन से मुक्त रहने वाले अथार्त मुक्त छन्द कविता भावपूर्ण लगती है वैसे ही तुम सदा संसारिकता से मुक्त रहकर सच्चितान्न्द अथार्त परब्रहम के निमग्न रहते हो।

इस देश के कण-कण में अणुपरमाणुओं में ऋषियों के महामंत्र व्याप्त हैं जो मानव के सुखद एवं मुक्ति प्रदान करने वाले हैं इसलिए हे! भारतवासियों तुम सदा से ही महान रहे हो तुम्हारे मन में जो दीनता, कायरता की भावना तथा काम वासनाओं की आसक्ति के भाव उत्पन्न होते रहें है वे सभी नष्ट होने वाले है।

अतः तुम ब्रह्मस्वरूप हो यह समस्त विश्व तुम्हारे चरणों की धूल से भी तुच्छ है। आशय यह है कि तुम परमात्मा की सृष्टि के सर्वाधिक सबसे शक्तिशाली प्राणी हो अतएव तुम अपनी शक्ति को पहचानों और फिर से जाग जाओ।

प्रश्न 12 महादेवी वर्मा के काव्य में नारी चेतना को व्यक्त कीजिए।

उत्तर- महादेवी वर्मा की कविता में दु:ख और करुणा का भाव प्रधान है। वेदना के विभिन्न रूपों की उपस्थिति उनके काव्य की एक प्रमुख विशेषता है। वह यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं करती कि वह ‘नीर भरी दु:ख की बदली’ हैं। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

वस्तुतः समूचा छायावादी काव्य ही व्यक्तिवाद का प्रभाव लेकर चला और वहाँ आत्माभिव्यक्ति को सहज ही स्थान मिला। उनकी वेदना के उद्गम के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहना संभव नहीं है। उनके एक गीत की पंक्ति है

शलभ मैं शापमय वर हूँ
किसी का दीप निष्ठुर हूँ।’

उनके पूरे काव्य पटल पर इस तरह के असंख्य बिंब बिखरे पड़े हैं, जिनसे उनके अंतस में पलती अथाह पीड़ा का स्पष्ट संकेत मिलता है। महादेवी की वेदना नितांत वैयक्तिक भी नहीं है।

स्वयं उन्होंने अपने जीवन में दुख और अभाव की बात से इंकार किया है। वस्तुतः उनके वेदना-भाव का प्रासाद दो आधार-भूमियों पर टिका हुआ है-आध्यात्मिक भावभूमि तथा मानवतावादी भावभूमि।

दोनों आधारभूमियाँ परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। बौद्ध धर्म के अध्ययन और उसके प्रति उनके रुझान ने भी महादेवी के वेदना-भाव के लिए आध्यात्मिक भावभूमि तैयार की।

महादेवी ने दु:ख को आध्यात्मिक स्तर पर ही अपनाया। भारतीय संस्कारों में लगी महादेवी करुणा-भाव में आकंठ डूबी हुई हैं। वेदना की अधिकता उन्हें अध्यात्मक का आवरण लेने को बाध्य करती है। किसी दार्शनिक की तरह वह कह उठती हैं

‘विजन वन में बिखरा कर राग,
जगा सोते प्राणों की प्यास,
ढालकर सौरभ में उन्माद नशीली फैलाकर विश्वास,
लुभाओ इसे न मुग्ध वसंत!

विरागी है मेरा एकांत!’ और, ‘मैं क्यों पूछू यह विरह निशा
कितनी बीती क्या शेष रही?’
तथागत की महाकरुणा का प्रभाव इन पंक्तियों में देखा जा सकता है
‘अश्रुकण से डर सजाया त्याग हीरक हार, ।

भीख दु:ख की माँगने जो फिर गया प्रति द्वार,
शूल जिसने फूल छू चंदन किया सन्ताप,
सुनो जगाती है उसी सिद्धार्थ की
पदचाप,
करुणा के दुलारे जाग।’

जब व्यक्ति वेदना के अनुभव से गुजरता है और उसकी तीव्रता के दंश सह चुका होता है तो वह पराई पीर को उसी धरातल पर खड़े होकर समझ सकता है। यहीं से उसमें समग्र मानव जाति के दु:खों के प्रति सहानुभूति और करुणा के भाव जन्म लेते हैं। BHDE 144 Free Assignment In Hindi

महादेवी के वेदना-भाव-प्रासाद की दूसरी आधारभूमि मानवतावादी भावभूमि है। मानव मात्र के प्रति करुणा का प्रत्यक्षीकरण महादेवी के गद्य लेखन में देखा जा सकता है।

पद्य के क्षेत्र में, ‘सांध्यगीत’ और ‘दीपशिखा’ तक आते-आते उनकी वेदना को मानव मात्र के प्रति करुणा का रूप लेते देखा जा सकता है। इस दृष्टि से ‘दीपशिखा’ महादेवी की अनुपम कृति है।

पथ न भूले एक पग भी
घर न खोए लघ विहग भी
स्निग्ध लों की तूलिका से
आँक सबकी छाँह उज्ज्वल।’

महादेवी वर्मा व्यापक सृष्टि के पक्ष में अपने स्वयं के दुख, अपनी वेदना को भी तिरोहित करने को तैयार रहती हैं। एक कविता में वह कहती हैं

‘मेरे बंधन नहीं आज प्रिय,
संसृति की कड़ियाँ देखो
मेरे गीले पलक छुओ मत,
मुरझाई कलियाँ देखो।’

एक अन्य कविता में, सुमन के माध्यम से वह वंचितों, शोषितों की उपेक्षा से क्षुब्ध होकर उनके प्रति सहानुभूति प्रकट करती हैं

‘कर दिया मधुर और सौरभ
दान सारा एक दिन
किंतु रोता कौन है
तेरे लिए दानी सुमन?’

कवयित्री दु:ख और पीड़ा के बोझ तले घुट-घुटकर सिसकती नहीं, अपितु निरंतर बढ़ते हुए आनंद भाव की ओर उन्मुख होती है। वह आनंद की ऐसी अवस्था में पहुँच जाती है, जहाँ ‘नयन श्रवणमय श्रवण नयनमन’ हो जाता है।

वेदना की धरा प्रवाहित होकर अंतत: आनंद के सागर में ही जा मिलती है। यहाँ तक कि मृत्यु को भी महादेवी वर्मा अंत अथवा दु:खद नहीं मानतीं। उनकी दृष्टि में तो BHDE 144 Free Assignment In Hindi

अमरता है जीवन का हास
मृत्यु जीवन का चरम विकास।

मृत्यु तो नियति है जो आनंद के ही सौ द्वार खोल देती है

‘सृष्टि का है यह अमिट विधान
एक मिटने में सौ वरदान।’

उनका जीवन-दर्शन मानवता के लिए दु:ख और वेदना के काँटे छोड़ना नहीं जानता। वह तो एक नई आशा, अमल आनंद की ही सृष्टि करना चाहती है। वह तो ‘सब बुझे दीपक जला’ देना चाहती है। उनकी कामना है

‘दु:ख’ से सुखमय सुख हो दु:खमय,
उपल बने पुलकित से निर्झर,
मरु हो जाए उर्वर गायक
।’

व्यथा-वेदना से आनंद की ओर यह प्रस्थान महादेवी वर्मा की काव्य-यात्रा का सार है।

BEGS 186

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