IGNOU MHI 08 Free Assignment In Hindi 2021-22

MHI 08

भारत में पारिस्थितिकी पर्यावरण का इतिहास

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MHI 08 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

भाग क

प्रश्न 3. भारत में पर्यावरण इतिहास लेखन परंपराओं की प्रमुख प्रवृत्तियों की चर्चा कीजिए।

उत्तर भारत में मानव की पर्यावरण के प्रति जागरूकता प्राचीनकाल से ही देखने को मिलती है। यहाँ मानव-प्रकृति के सम्बन्ध सदा मित्रवत् रहे हैं।

प्राचीन साहित्यिक स्रोतों के आधार पर इतिहासकारों ने तत्कालीन पारिस्थितिकी की संरचना करने की कोशिश की है। हालाँकि भारत में पर्यावरणीय इतिहास के क्रमबद्ध लेखन का आरम्भ आधुनिक काल में ही आकर देखने को मिलता है

भारत में सर्वप्रथम इतिहासकार फ्रांसिस जिम्मरमैन ने प्राचीन पाठों का परीक्षण कर तत्कालीन पर्यावरणीय स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

प्राचीन पाठों में उपलब्ध पारिस्थितिकी के ऐसे सन्दर्भो की खोज-बीन की है, जिसने जीव-जन्तुओं को दो भागों में क्रमश: बाँटा है। पहला शुष्क भूमि के जन्तु तथा दूसरा दलदली भूमि के जन्तु हैं। इनका मानना है कि इस प्रकार प्राचीन पाठों के सूक्ष्म विश्लेषण से हम प्राचीन पारिस्थितिकी के विषय में बहुत निष्कर्ष निकाल सकते हैं।

वैसे भारत में पर्यावरणीय इतिहास के क्रमबद्ध रूप से लेखन का आरम्भ इतिहासकार रामचन्द्र गुहा तथा माधव गाडगिल के लेख ‘दिस फिसड लैंड से माना जाता है।

इन विद्वानों के अनुसार पर्व औपनिवेशिक भारत में संसाधनों के उपयोगों में प्रकृति के साथ एक अनकलता थी तथा समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा इन संसाधनों का बँटवारा सौहार्दपर्ण था। एक जातिवादी समाज द्वारा विभिन्न संसाधनों पर भिन्न-भिन्न अधिकारों के कारण एक प्रकार का संतलन बना हुआ था।

जिसके कारण बदले में हम संसाधनों की माँग तथा आपति में एक स्थिरता पाते हैं। लेकिन आगे चलकर पर्यावरण सम्बन्धी आन्दोलन हए, जिसके मुख्य जिम्मेदार अंग्रेज थे।MHI 08 Free Assignment In Hindi

क्योंकि अंग्रेजों ने वनवासियों के वनों के पारम्परिक उत्पाद-उपभोग पर प्रतिबन्ध लगा दिए थे। इस प्रकार रामचन्द्र गुहा तथा माधव गाडगिल द्वारा भारतीय सन्दर्भ में मानव पर्यावरण के पारम्परिक प्रभाव की एक रूमानी छवि का चित्रण किया गया है।

यद्यपि आरम्भिक लेखक पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति अधिक जागरूक थे। इसके बावजूद उनका लेखन कार्य कुछ विशिष्ट विषयों पर ही केन्द्रित रहा तथा अन्य विषयों की उपेक्षा की है।

उदाहरण के लिए, कृषि की अपेक्षा वन पर, शहरी निवासियों की परिस्थितियों के प्रति बदलती प्रतिक्रिया की अपेक्षा आदिवासियों तथा कृषि आन्दोलनों पर जल अधिकार से सम्बन्धित विवादों की अपेक्षा सिंचाई के इतिहास पर ध्यान केन्द्रित रहा।

हालाँकि इतिहासकार सुमित गुहा द्वारा पूर्व-ब्रिटिश तथा ब्रिटिश काल के मध्य की खाई को भरने का प्रयास किया गया है। उनका अध्ययन क्षेत्र मराठा आधिपत्य क्षेत्र है।

उन्होंने कृषि तथा जंगलों के मध्य के भ्रमित करने वाले काल्पनिक विभाजन को तथा नृजातीयता को अनदेखा कर पर्यावरण के विस्तृत सन्दर्भ में प्रयोग किया है। उन्होंने नवीन साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणित किया है कि आदिवासी राज्य व्यवस्था का विकास एकांगी नहीं हुआ, बल्कि इस पर पर्यावरण का विशेष प्रभाव है।

इसके अलावा सुमित गुहा ने यह स्पष्ट किया है कि मराठों के उत्कर्ष काल में भी पश्चिमी पठार का बहुत बडा भाग जो कोंकण के अधिक वर्षा वाले तटीय क्षेत्र था, वृक्षविहीन हो गया था।

इस क्षेत्र के रहन-सहन ने पर्यावरण में भी परिवर्तन कर दिया था। फलस्वरूप व्यापक रूप से पारिस्थितिकी का रूपान्तरण हो गया था। इसी प्रकार वे तत्कालीन राज्य के दृष्टिकोण के सन्दर्भ में कहते हैं कि पूर्व ब्रिटिश काल में भी राजाओं, MHI 08 Free Assignment In Hindi

जैसे कि मराठों ने वनों को एक बाधा के रूप में देखा, जैसे वन आच्छादित क्षेत्रों में डाकुओं, विद्रोहियों तथा शेरों का भय और भी बढ़ जाता था। इस कारण जंगलों को साफ करने की नीति पर भी राज्यों ने कार्य किया।

हालाँकि जंगलों की सफाई को नयी आय प्राप्ति की सम्भावनाओं के रूप में देखा गया। एक अन्य विद्वान नन्दिनी सिन्हा ने मेवाड प्रदेश के सन्दर्भ में कछ इसी प्रकार का अन्वेषण किया है।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भारत में पर्यावरण इतिहास का लेखन कार्य क्रमबद्ध रूप से आधुनिक काल में ही शुरू हो सका। हालाँकि आधुनिक काल के पूर्व के लेखकों का भी योगदान कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।

फिर पूर्व के पर्यावरणीय लेखकों से कई संदर्भित चीजें छूट जाती थीं अथवा उनका ध्यान एकांगी ही रहा, परन्तु आधुनिक पर्यावरणीय लेखक अब ज्यादा प्रासंगिक दृष्टिकोण अपना रहे हैं।

20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में विद्वानों द्वारा पर्यावरण और इतिहास को विभिन्न तरीकों से परिभाषित करने की व्यापक रूप से कोशिश की गई है। इसको लेकर विद्वानों के दो वर्ग क्रमशः विकासवादी एवं विसरणवादी बन गए हैं।

जहाँ पहला पक्ष पर्यावरणीय परिवर्तन को ज्यादा महत्त्व देता है वहीं दूसरा पक्ष परिवर्तनशीलता को कम महत्त्व देता है। साथ ही पर्यावरणीय इतिहास को निर्धारित करने वाले लक्षणों अथवा अंगों में, जैसे वनों, वनवासियों तथा राज्यों के मध्य सम्बन्धों के इतिहास आदि महत्त्वपूर्ण हैं।MHI 08 Free Assignment In Hindi

सर्वप्रथम विकासवादी इतिहासकारों के अनुसार पर्यावरणीय इतिहास वस्तुत: पर्यावरण की ऐसी गतिशीलता या परिवर्तनशीलता का परीक्षण है, जिस प्रक्रिया, का माध्यम मानव है तथा जिसमें परिवर्तन किसी-न-किसी रूप में मापे जा सकने योग्य है,

जबकि विसरणवादी विद्वानों के अनुसार परिवर्तन का आकलक) उन परिस्थितियों में भी सम्भव है जहाँ आँकड़े पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हों।

पर्यावरण के साथ समाज की होने वाली प्रक्रिया कभी-कभी ऐसे छोटे छोटे कालखण्ड में भी सीमित हो जाती है, जहाँ परिवर्तनशीलता बहुत स्पष्ट रूप से उजागर नहीं हो सकती।

इस तरह पर्यावरणीय इतिहास को परिभाषित करने की इतिहासकारों की द्विविधा स्पष्ट रूप से दिखायी देती है। हालाँकि उन सभी लेखन कार्यों का, जो ‘पर्यावरणीय इतिहास’ के शीर्षक के अन्तर्गत आते हैं,

यदि उनका सूक्ष्म विश्लेषण किया जाए, तो पता चलता है कि उन सभी प्रलेखों में, जिसमें पारिस्थितिकी विक्षोभ की बात की गई है, का मुख्य जिम्मेदार औपनिवेशिक हस्तक्षेप को माना गया है।

यद्यपि यहाँ कुछ अपवाद भी देखने को मिलता है। पर्यावरणीय इतिहास से सम्बन्धित अधिकतर अध्ययन औद्योगिकीकरण के परिणामस्वरूप पारम्परिक जीवनयापन में होने वाले विघटनों के कारणों पर केन्द्रित हैं।

भारत के सम्बन्ध में ऐसे विघटन उपनिवेशवाद के कारण उत्पन्न हुए तथा कुछ विघटन स्वतन्त्रता के बाद भी बने रहे।MHI 08 Free Assignment In Hindi

सामान्य रूप से आधुनिक इतिहासकारों का भी मानना है कि औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा आर्थिक शोषण के साथ-साथ प्राकृतिक स्रोतों का भी शोषण किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा अपनी मातृभूमि के स्वार्थों का पोषण करना था।

इसी प्रकार प्राकृतिक वनस्पतियों तथा जीव-जन्तुओं के विनाश के कारणों और इससे उत्पन्न पर्यावरणीय प्रभाव की व्याख्या इतिहासकारों के लिए एक महत्त्वपूर्ण विषय बना हुआ है।

जबकि संशोधनवादी तथा सबअल्टिर्न विचारधारा के इतिहासकारों ने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि हाशिये पर स्थित सामाजिक समूहों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा तथा इसकी क्या भूमिका रही है?

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि पर्यावरण का इतिहास मूलभूत रूप से समाज तथा प्रकृति के पारस्परिक सम्बन्धों तथा मेलजोल का अन्वेषण है।

चूंकि आदिकाल से लेकर वर्तमान काल में मानव-प्रकृति अन्तर्सम्बन्धों में एक व्यापक बदलाव आ चुका है। एक लम्बे ऐतिहासिक काल तक मानव-प्रकृति बीच एक अनवरत आदान-प्रदान की प्रक्रिया चलती रहती है।

इनके निरन्तर विकसित होते सम्बन्धों एवं व्यवहारों में आये परिवर्तन को समझने के लिए पर्यावरणीय इतिहास शोध का अध्ययन आवश्यक है।MHI 08 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 4. खानाबदोश पशुपालकों की मुख्य विशेषताओं पर चर्चा कीजिए। बसे हुए समुदायों के साथ उनके संबंधों पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर प्राचीनकाल में पशुचारी समाज के लोग सदैव अच्छे चरागाहों की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते रहते थे। इसके परिणामस्वरूप पशुचारण में भ्रमणशील प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ।

इसके बावजूद इनका अन्य समुदायों से सम्पर्क सम्बन्ध थे। पशुचारी समुदायों के लोग अपनी कुछ जरूरतों को पूरा करने के लिए पशचारी विनिमय प्रणाली पर विश्वास रखते थे।

इससे स्पष्ट होता है कि पशचारी समाज के लोगों के अन्य कषीय स्थिर समाज से सम्बन्ध जरूर रहे होंगे। इसकी पुष्टि पुरातात्त्विक खोजों के विश्लेषण से हो जाती है।

पुरातत्त्वीय स्थलों से हमें पशुपालन के जो प्रमाण मिलते हैं, उनसे पता चलता है कि पशुओं के झुण्डों के आकार अत्यधिक बड़े नहीं होते थे। चूँकि पशुचारी समाज के लोग अपने पशुओं के झुण्डों को उतनी ही मात्रा में रखता थे, जिससे वे ठीक से उनका परिपालन कर सकें।MHI 08 Free Assignment In Hindi

इसीलिए वे अनाज पैदा करने वाले अन्य पड़ोसी समूहों के साथ सहजीवी सम्बन्ध विकसित कर रहे थे। इसी सन्दर्भ में इतिहासकार रोमिला थापर का कहना है, “कुछ पशुचार भ्रमणशील थे,

जबकि कुछ अन्य अर्ध स्थिर प्रकृति के थे, जो आवश्यकता पड़ने पर कृषि भी बहुत अल्प मात्रा में कर लेते थे। अधिकतर पशुचारी विनिमय प्रणाली पर विश्वास रखते थे तथा इसी के द्वारा वे कृषकों एवं अन्य संगठनों के सम्पर्क में आए।”

भ्रमणशील पशुचारी समाज तथा स्थिर कृषीय समाज के बीच के सम्बन्ध दोनों के लिए परस्पर लाभदायक थे। पशुचारी की अनाज की माँग की पूर्ति कृषक समुदायों द्वारा पूरी की जाती थी। फसलों के उगाने में जिस गहन कार्य क्षमता की आवश्यकता होती थी, उससे आसानी से पशुचारी बच जाते थे।

फलतः वे अपना अधिकांश समय अपने पशु झुण्डों की देखभाल में व्यतीत कर सकते थे। साथ ही इसके बदले में कृषक समुदायों को भी बहुत सारा प्रतिफल मिलता रहता था, जैसे उनको मांस, ऊन तथा खाल की नियमित रूप से आपूर्ति पशुचारी समाजों द्वारा ही की जाती थी।

कालान्तर में इन दोनों समाजों के बीच के सम्बन्धों में परस्पर गुणात्मक वृद्धि हुई। अब कृषक समाजों को पशुओं के विभिन्न प्रकार तथा स्तरों वादा माँग में वृद्धि हुई।MHI 08 Free Assignment In Hindi

परिणामस्वरूप पशुचारी समाजों द्वारा विभिन्न प्रकार के पशुओं की उपलब्धि में वृद्धि की गई। अब कृषकों द्वारा खेतों से फसल कार लिए जाने के बाद खेतों की सफाई जरूरी होती थी।

अतः पशुचारी समाज की सहायता से वे अपने खेतों में पशुओं के झुण्ड को लगा देते थे। ये पशु फसल कटाई के बाद बचे उसके अवशेष अर्थात ठूठों को चर जाते थे।

साथ ही एक अन्य लाभ यह था कि खेतों में चराई के दौरान पशु झुण्डों के मल त्याग के कारण किसानों को जैविक खाद की भी प्राप्ति हो जाती थी।

इसके अलावा भी भ्रमणशील पशुचारी द्वारा आवास स्थलों के समय-समय पर किए गए भ्रमण अथवा निरीक्षण के परिणामस्वरूप कृषक समुदायों से पशुधनों के चरागाहों की व्यवस्था में भी उनकी सेवाओं का प्रयोग होने लगा।

इन सेवाओं के बदले शायद उन्हें विनिमय में अन्य वस्तुओं के साथ चारा भी उपलब्ध हो जाता था। इस प्रकार इन दोनों के बीच सहजीवी सम्बन्ध विकसित हो रहे थे, जो परस्पर एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति के आधार बन रहे थे।

भारतीय उपमहाद्वीप में विभिन्न पर्यावरणीय तथा जलवायु अवस्थाएँ पायी जाती हैं, जिसके कारण यहाँ विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के विकास को प्रोत्साहन मिला। MHI 08 Free Assignment In Hindi

यद्यपि इनका अधिकार क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ तथा बीहड़ था, परन्तु मुख्य नदियों का जल विकास तन्त्र का फैलाव पश्चिम से पूर्व की ओर हुआ है।

इसके कारण चरागाह टुकड़ों में बहुत ही उत्तम अवस्था में समस्त क्षेत्रों में उपलब्ध है। आरम्भ से ही इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पशुपालन व्यवस्था एक आवश्यक अनिवार्यता के रूप में पाई जाती थी।

वास्तव में, पशुपालन की व्यवस्था कृषि पर पूर्ण रूप से निर्भर थी। साथ ही यह व्यवस्था समस्यापरक नहीं थी।

इतिहासकार भट्टाचार्य के अनुसार उपमहाद्वीप के कुछ स्थलों पर पाए जाने वाले नाँद तथा भस्म के टीले यह साबित करते हैं कि पशुओं की संख्या काफी बड़ी होती थी इसलिए बारी-बारी से चरागाह प्रयोग में आते थे।

इस प्रकार विभिन्न संस्कृतियों से इनका परस्पर सम्बन्ध भी बना रहता था।

उपर्युक्त व्याख्या के आधार पर कहा जा सकता है कि पशुचारी खानाबदोश समाज तथा कृषीय समाज के बीच सदैव परस्पर निकट सम्बन्ध रहे हैं। इन दोनों समाज के लोगों के बीच एक-दूसरे की आवश्यकताओं की आपूर्ति के कारण सम्पर्क में आए।MHI 08 Free Assignment In Hindi

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प्रश्न 5. दक्षिण भारत में कृषि के प्रसार पर एक टिप्पणी लिखिए।

उत्तर आरम्भिक मध्यकालीन दक्षिण भारत की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता कृषि क्षेत्रों का विस्तार है। चूँकि इस समय तक कृषि उपकरण तकनीको दिका काफी विकास हो चुका था।

साथ ही व्यापक रूप से जनसंख्या में भी वृद्धि हुई थी। फलत: बस्तियों पर आबादी का दबाव पड़ा और लोगों ने अन्य सुदूर क्षेत्रों के जंगलों को साफ कर नयी बस्तियाँ बसाईं।

इस समय तक दक्षिण क्षेत्रीय राज्य सत्ताओं का उदय एक शक्ति के रूप में हो चुका था। फलत: सत्ता शक्ति के साथ मिलकर लोगों ने विभिन्न सिंचाई साधनों का विकास किया।

परिणामस्वरूप फसल के उत्पादन में गुणात्मक तथा परिमाणात्मक वृद्धि हुई। फलतः इस काल में जाकर कहीं दक्षिण भारतीय समाज में जटिल सामाजिक सम्बन्धों का उदय हुआ।

दक्षिण भारत के कृषि समाजों के बारे में इतिहासकार बर्टन स्टीन का मानना है कि लगभग 9वीं शताब्दी में आकर ही यहाँ एक अपेक्षाकृत स्थिर कृषि समाज का उदय हुआ।

इस सन्दर्भ में लिखते हैं कि केवल एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन दृष्टिगत होता है कि जब साफ की गई कृषि के अन्तर्गत भूमि वनों का क्षेत्र भी अब उपयोग किया जाने लगा था।

वनों में कमी तथा नियमित रूप से था नियमित रूप से कषि में आने वाली भमि का विस्तार एक निरन्तर होने वाली प्रक्रिया थी। MHI 08 Free Assignment In Hindi

किसी भी अन्य विकासशील उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र की भाँति वनों की कटाई कृषि के विस्तार की एक मानक पद्धति थी जबकि पर्यावरण में इस प्रकार का परिवर्तन एक नियमित प्रक्रिया मानी जा सकती है, जिसमें विस्तार की गति एक महत्त्वपूर्ण कारक है।

प्रायद्वीपीय भारत की कृषि बस्तियों के विकास हेतु सभी क्षेत्रों में वनों का ह्रास नहीं हुआ था। ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले बस्तियों के आस-पास में बेकार पड़ी भूमि अथवा अप्रयुक्त भूमि को कृषक स्वयं कृषि योग्य बना सकते थे तथा कृषि सम्बन्धित क्रियाकलाप किया जा सकता था।

जबकि वनों की कटाई तथा सिंचाई के साधनों का निर्माण केवल ब्रह्मदेय तथा मन्दिरों के माध्यम से ही सम्भव था। तटीय भूमि को धान की खेती के लिए उपयोग में लाया गया था।

उत्तर पल्लव काल में स्कन्दशिष्य ने वनों को जलाकर सफाई करने का आदेश दिया था तथा सेलम जिले में नये गाँवों को बसाया था MHI 08 Free Assignment In Hindi

इसी तरह आन्ध्र में काकतीय शासकों तथा उनके अधीन मध्यवर्तियों को तेलंगाना पठार के क्षेत्र में वनों को साफ कर कृषि को विकसित करने का श्रेय दिया गया।

प्रायद्वीपीय भारत से अभिलेखों से प्राप्त समृद्ध ऐतिहासिक सामग्री मिलती है, जिससे कृषि क्षेत्र के विस्तार की प्रक्रिया की पुष्टि होती है।

आरम्भिक मध्यकाल में सिंचाई सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। परन्तु पल्लव काल से पूर्व जलाशयों व नदियों से नहर निकालकर तथा कपाट लगाकर उनसे जल की निकासी को नियन्त्रित करने का विकास नहीं हो सका था।

आठवीं शताब्दी से उत्तरोत्तर प्रयोग में आने वाली इस प्रकार की कपाट विधि के कारण सिंचाई में वृद्धि हुई तथा परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई। पल्लवों से पहले के काल में सतही सिंचाई अथवा इसकी परिवर्तित तकनीक पिकोटा सिंचाई की प्रमख पद्धतियाँ थीं।

जल-निकासी पद्धतियों में होने वाले विकास नम कृषि उत्पादन से सीधे जुड़े हुए थे। आरम्भिक मध्य काल में उन अन्य फसलों में जिनका उत्पादन बढ़ गया था, सम्मिलित थी।

नम स्थानों पर पैदा होने वाले धान के अधिशेष को लम्बी दूरी के व्यापार में विनिमय के लिए अथवा मन्दिरों से सम्बन्धित सेवाओं व प्रथाओं के लिए उपयोग में लाया जा सकता था।

जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण कई प्रजातियों की फसलों की बड़े पैमाने पर पैदावार की जाने लगी थी। उदाहरण के लिए, मोटे अनाज, जैसे रागी, कानुगा व जोवार आदि।

रागी या तो अफ्रीका से भारत आने वाला अनाज था अथवा कर्नाटक में प्राप्त होता था, जहाँ से यह आन्ध्र प्रदेश तमिलनाडु तथा महाराष्ट्र में फैला था। अभिलेखीय घोषणापत्रों में कृषकों के लिए आदेश है कि वे रागी अवश्य उपजाएँ।MHI 08 Free Assignment In Hindi

तमिल काव्यसंग्रहों में विवरण मिलता है कि दक्षिण तमिलकम क्षेत्रों में ईसवी सन् की आरम्भिक शताब्दियों में गन्ने की खेती का प्रचलन था। इस प्रकार के उत्पादन के फलस्वरूप इन क्षेत्रों में व्यापक पैमाने पर गुड़ का उत्पादन होने लगा था।

गुड़ का उत्पादन इतना ज्यादा होने लगा कि इसने 10वीं शताब्दी ई. तक व्यापारिक रूप ग्रहण कर लिया था। 11वीं शताब्दी ई. में वृद्धि पाने वाला ताम्बूल था।

सुपारी मन्दिरों में होने वाले अनुष्ठानों में इनके प्रयोग से सीधे जुड़ गई। कोंकण के पश्चिमी तट से सम्बन्धित अध्ययनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि गुवका (सुपारी) का व्यापारिक उत्पादन नवीं शताब्दी के मध्य स हो रहा था।

पश्चिमी तट मसालों के उत्पादन तथा व्यापार के लिए आमतौर पर तथा काली मिर्च के लिए विशेषकर लोकप्रिय था। प्रायद्वीप में ईस्वी सन की आरम्भिक शताब्दियों में नारियल का उत्पादन शुरू हो चुका था तथा धार्मिक अनुष्ठानों में इसका विशेष महत्त्व का था।MHI 08 Free Assignment In Hindi

इस प्रकार हम देखते हैं कि दक्षिण भारत में आरम्भिक मध्यकाल के लगभग कृषि क्षेत्रों का विस्तार, सिंचाई साधनों का विकास तथा विभिन्न प्रकार की फसलों के उत्पादन में विविधता आदि मख्य परिवर्तन था।

भाग ख

प्रश्न 7. प्रकृति का संरक्षण समय की मांग है। आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर संरक्षण की अवधारणा सम्भवत: मानव के अस्तित्व जितनी ही पुरानी है। पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं ने पिछले कुछ दशकों में लोगों तथा सरकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इससे सम्बन्धित मदें लगभग प्रत्येक देश में राजनीतिक विवेचना का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गई हैं।

निरन्तर बढ़ते पृथ्वी के प्रदूषण के कारण मानव प्रजाति के अस्तित्व पर मँडराने वाला संकट सभी की चिन्ता का विषय बन गया है। हाल ही में वैश्विक स्तर पर पर्यावरण पर होने वाले ह्रास ने संरक्षण की आवश्यकता तथा इस सम्बन्ध में लोक जागृति को बढ़ावा दिया है।

मानव प्रजाति तथा अन्य जीवों के पृथ्वी पर अस्तित्व के लिए संरक्षण अति आवश्यक है। पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति असंख्य कारकों तथा संश्लिष्ट युग्मों का परिणाम है। इन कारकों में वायुमण्डल सबसे महत्त्वपूर्ण है, जिसमें प्राणदायी ऑक्सीजन, जल, भूमि तथा सूर्य विशेष महत्त्वपूर्ण हैं।

ऐसा माना जाता है कि इनमें से किसी भी एक संघटन तत्त्व की कार्यक्षमता में ह्रास पर्यावरण क्षरण को बढ़ावा देगा तथा पृथ्वी पर से जीवन समाप्त हो जायेगा। MHI 08 Free Assignment In Hindi

अतः इन संघटनों का न केवल संख्यात्मक संरक्षण आवश्यक है, बल्कि इनका गुणात्मक संरक्षण भी अत्यन्त आवश्यक है।

पृथ्वी पर वनस्पतियाँ ऑक्सीजन की प्रमुख उत्पादक मानी जाती हैं। इसलिए उनकी उपयोगिता को कम करके नहीं आंका जा सकता।

साथ ही, वे सभी कारण जो पृथ्वी पर वनस्पतियों के विकास में रुकावट पैदा करते हैं, ये सभी अंतत: ऑक्सीजन की कमी के कारण बनेंगे।

अत: पर्यावरण को प्रभावित करने वाले उन सभी कारणों की जाँच-पड़ताल आवश्यक है। जबकि संरक्षण के कुछ पहलू जैसे प्रदूषण पर रोकथाम अधिक संकीर्ण परन्तु तात्कालिक महत्त्व के हैं,

पर्यावरण के सभी महत्त्वपूर्ण घटक वायु, जल तथा भूमि सभी प्रदूषित हो रहे हैं। जिसका सीधा प्रभाव मानव के स्वास्थ्य तथा अस्तित्व पर पड़ रहा है।

अब तो यह भी माना जाने लगा है कि प्रदूषण का केवल मनुष्यों से ही सीधा सम्बन्ध नहीं है, बल्कि इसने दूसरे जीव-जन्तुओं पर भी अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है।

पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा मनुष्यों के आर्थिक लाभों से सम्बन्धित है। चूँकि मनुष्य अपने आर्थिक लाभ के स्वार्थों के कारण व्यापक पैमाने पर पर्यावरण का दोहन कर रहा है।

वर्तमान में कुछ समुद्री वनस्पतियों का भी दोहन मानव ने अपने आर्थिक लाभ के लिए करना शुरू कर दिया है, इसके कारण समुद्री जीव-जन्तुओं की खाद्य श्रृंखला प्रभावित होगी तथा इसके परिणामस्वरूप समुद्री जीवन समाप्त हो जायेगा। MHI 08 Free Assignment In Hindi

यही बात वनों की लगातार कटाई पर भी लागू हो सकती है, जिसके परिणामस्वरूप न केवल आहार श्रृंखला प्रभावित होगी वरन् वायुमण्डल में ऑक्सीजन की कमी भी हो जायेगी कोई भी अल्पकालिक आर्थिक लाभ की स्थिति सम्भवत: पर्यावरण को इतना प्रदूषित कर दे कि उसे सुधारने के उपायों में लगने वाली पूँजी इस लाभ को पूरी तरह से नगण्य कर दे।

– इसी प्रकार हमें इस बात की भी चिन्ता करनी चाहिए कि पर्यावरण की सुन्दरता को कहीं अपूरणीय क्षति तो नहीं हो रही है।

मानव तथा उसके द्वारा उपयोग में लाई गई तकनीक से पर्यावरण के घटकों में व्यापक परिवर्तन हो रहा है। अतः भविष्य में इस बात की सम्भावना है कि पर्यावरण की वास्तविक प्रकृति से कहीं नगर के लोग पूर्णतः अनभिज्ञ न रह जाएँ।

पर्यावरण संरक्षण के कुछ महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक मूल्य भी है। चूँकि मानव के पास पृथ्वी के सभी कालों के बारे में जानकारी अल्प ही है।

अतः यह जरूरी है कि प्राकृतिक पर्यावरण के कुछ भाग को अवश्य सुरक्षित रखा जाए, जिससे उससे सम्बन्धित वैज्ञानिक शोध व अनुसन्धान में सुविधा हो। इसके साथ ही अभी भी अनेक ऐसे पदार्थ तथा प्राकृतिक संसाधन हैं, जिनको अभी उजागर नहीं किया जा सका है। अतः ऐसे पदार्थों पर वैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

उपर्युक्त विवरणों के आधार पर कहा जा सकता है कि पर्यावरण का संरक्षण खुद की सुरक्षा व अस्तित्व के लिए आवश्यक है। MHI 08 Free Assignment In Hindi

अत: मानव समाज को इसके लिए सदैव तत्पर, पर संवेदनशील होना पड़ेगा। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन की मार समाज के सभी लोगों को भुगतनी पड़ रही है तथा हमारे पर्यावरण का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है।

इसलिए वक्त रहते इसका समुचित समाधान करना जरूरी है। साथ ही आज सत्ता प्रतिष्ठानों के साथ-साथ आमजन को भी पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूक एवं सजग हो जाना चाहिए।

ऐसा न हो कि पर्यावरण का प्रदूषण इतना न बढ़ जाए कि इसका परिणाम समस्त जीव-जगत के साथ-साथ मानव को भी भुगतना पड़े। यह भी सम्भव है कि कहीं कुछ जीव-जन्तु पृथ्वी से हमेशा के लिए विलुप्त न हो जाए ।

पर्यावरण संरक्षण का इतिहास सदैव उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पर्यावरण संरक्षण के प्रति आधुनिक विचार व प्रथाएँ मुख्यतः पश्चिमी समाज के सामाजिक सोच-विचार के सम्बन्ध में विकसित हुई हैं।

यह पश्चिमी समाज में होने वाली राजनीतिक तथा आर्थिक उथल-पुथल से भी बहुत प्रभावित हुई है। आधुनिक औपनिवेशिक काल में पर्यावरण के प्रति यह विचारधारा काम कर रही थी कि मनुष्य द्वारा प्रकृति का दोहन करना उसका अधिकार है,

अत: कोई भी नीति इसका विरोध नहीं कर सकती है। चूँकि यूरोप के लोगों का मानना था कि प्रकृति का निर्माण मानव प्रजाति की सेवा के लिए ही हुआ है, अत: इसका पूर्ण दोहन करना चाहिए।

जब 15वीं सदी में समुद्री यात्राओं का काम प्रारम्भ हुआ, उसी समय यूरोपीय संस्कृति सारे विश्व में फैली। 17वीं सदी तक यूरोपीय शक्तिशाली तकनीक से परिचित हो चुके थे।

साथ ही इसके कारण उस समय पृथ्वी के एक बड़े क्षेत्र में परिवर्तन करने की शक्ति उनके पास थी। इस काल के उपनिवेशवादियों की रुचि अधिकांशतः इस बात में थी कि वे अपने नये क्षेत्रों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए करें। वे इन क्षेत्रों की दूरगामी प्रभावशीलता को सदैव नजरअंदाज करते रहे।

सभी जानते हैं कि यूरोपीय उपनिवेशवाद का विस्तार अपने साथ भू-क्षरण तथा प्राकृतिक वनस्पति व वन्य जीवन का विनाश जैसी क्रियाएँ लाया। यद्यपि इस काल में संरक्षण सम्बन्धी कुछ विचार व प्रथाएँ भी चर्चा में आई थीं।

उदाहरण के लिए, वन संरक्षण ने ठोस शुरुआत की, क्योंकि जलावन लकड़ी की लगातार बढ़ती माँग ने प्राकृतिक वनों को विनाश के कगार पर खड़ा कर दिया था। इसी के साथ-साथ वन्य जीवन में भी लोगों को रुचि तथा उसके प्रति चिन्ता बढ़ रही थी।MHI 08 Free Assignment In Hindi

19वीं सदी में पर्यावरण का दोहन व विनाश व्यापक पैमाने पर हुआ। अफ्रीका की बहुत-सी वन्य जीवों की प्रजातियाँ शिकार के कारण लुप्त हो गई।

यहाँ तक कि बड़े शिकार करने वाले जानवर लगभग समाप्त से हो गये और उनमें से कुछ आगे चलकर विलुप्त ही हो गये।

अनेक प्रकार के पक्षी, जो पहले बड़ी संख्या में पाये जाते थे, लगभग पूरी तरह से समाप्त कर दिए गए। वनों की कटाई तथा वनों को जलाने की दुष्प्रथा ने बड़ा विनाश किया।

ऊँच पहाड़ियों पर जानवरों द्वारा इतनी अधिक चराई हुई कि वे अभी तक उस परिस्थिति से उबर नहीं पाये हैं। इस प्रकार प्राकृतिक चरागाहों से कई वनस्पतियों का लोप हो गया।

लेकिन 19वीं सदी के मध्य तक जीव विज्ञान में प्राकृतिक विश्व सम्बन्धी विचारों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आरम्भ हो गए। इस परिवर्तन का सबसे सुन्दर उदाहरण प्राकृतिक चुनाव का सिद्धांत था, जो संयुक्त रूप से डार्विन तथा अल्फ्रेड वालिस द्वारा प्रतिपादित किया गया।

प्राकृतिक चुनाव के इस सिद्धान्त ने प्रजातियों की सृष्टि के सिद्धान्त का स्थान ग्रहण किया। इस विकासशील विचारधारा ने बहुत से लोगों के विचार को इस तथ्य के आधार पर बदल दिया कि पर्यावरण में परिवर्तन बहुत-सी प्रजातियों के विलोप का कारण बन सकते है-

कालान्तर में एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में पर्यावरण संरक्षण का आरम्भ अमेरिका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट तथा उनके सलाहकारों द्वारा किया गया था।

वैसे रूजवेल्ट के प्रमुख वन संरक्षण गिफर्ड पिचाट की संरक्षण को अपने आधुनिक सन्दर्भ में प्रयोग में लाने का श्रेय दिया जाता है।MHI 08 Free Assignment In Hindi

लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण संरक्षण के मुद्दों से विश्व का ध्यान दूसरी ओर मुड़ गया। द्वितीय विश्व युद्ध के कारण अनेक प्रकार के प्रदूषण में वृद्धि हुई, जो रासायनिक अवशिष्टों द्वारा हो रहा था

इन परिवर्तनों का परिणाम यह था कि विश्व समुदाय का ध्यान फिर से पर्यावरण के संरक्षण से सम्बन्धित मुद्दों की ओर गया।

युद्ध के बाद इस मुद्दे को गम्भीरता से लिया गया तथा इस बात पर विचार किया गया कि विश्व जैविक सम्पदा को विभिन्न प्रकार के पर्यावरणीय समस्याओं के कारण बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। तब से लेकर अब विश्व राजनीति में पर्यावरण के मुद्दे हमेशा छाये रहते हैं।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि 19वीं सदी में विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में उपनिवेशवादियों द्वारा पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया गया।

हालाँकि प्रदूषित हो रहे पर्यावरण के साथ-साथ इसके संरक्षण से सम्बन्धित प्रथाएँ भी विकसित होती चली गईं। यही संरक्षणवादी प्रथाएँ आज के विश्व में पर्यावरणवादी संरक्षण के विचार से लोकमत तथा सरकारों को सचेत कर रही हैं, जिससे लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ी है।

प्रश्न 9. जैव विविधता के महत्व पर एक नोट लिखिए और इन-सीटू और एक्स-सीटू संरक्षण के बीच अंतर का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

उत्तर जलवायु और प्रकृति के स्वरूप में व्याप्त विविधता के कारण पारितन्त्र में व्याप्त जीवन के विभिन्न स्वरूपों को ही जैव-विविधता कहते हैं पेड-पौधे, जीव-जन्तु एवं सूक्ष्म प्राणियों के सम्मिलित जीवन को जैव-विविधता के अन्तर्गत देखा जाता है। MHI 08 Free Assignment In Hindi

जैव-विविधता मख्य रूप से जैव संरचना के तीन मौलिक घटकों, जैसे पारितन्त्र, प्रजाति, आनुवंशिकी की एक-दूसरे से सोपानवत सम्बद्धता को प्रकट करता है। इन्हीं कारणों से जैव-विविधता का महत्त्व मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में है।

जैव-विविधता भारत जैसे देशों में अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। भारत जैसे देशों में एक विशाल जनसमूह अपनी आवश्यक आवश्यकता की पूर्ति जैव-विविधता से ही करता है।

पारम्परिक समुदाय अर्थात वनों में रहने वाले लोग अपने भोजन, वस्त्र, आवास, दवा, घरेलू सामान, खाद, मनोरंजन जैसी दैनिक जरूरतों के लिए अपने आस-पास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर करते हैं। जैव-विविधता का बना रहना खाद्य श्रृंखला के लिए अति आवश्यक है,

क्योंकि खाद्य श्रृंखला के लिए प्रत्येक प्रजाति किसी दूसरी प्रजाति पर निर्भर करती है। अत: किसी प्रकार के भी व्यवधान इस विविधता में आने पर पूरी श्रृंखला में अव्यवस्था पैदा हो जाएगी।

इस कारण जैव-विविधता का संरक्षण पृथ्वी पर जीवों के अस्तित्व के लिए अति आवश्यक है।

जैव-विविधता के प्रत्यक्ष उपयोग एवं उत्पादन सम्बन्धी लाभों, यथा खाद्यान्न, शाक-सब्जियाँ, फल, पेड़-पौधे, दवा, इमारती लकड़ी, तेल, वन्य उत्पाद, अण्डा आदि के साथ-साथ गैर-उपभोग सम्बन्धी लाभ भी अति महत्त्वपूर्ण हैं।

जैव-तकनीकी, जल एवं पोषक तत्त्व चक्र नियन्त्रण, मौसम पर नियन्त्रण, कार्बन स्थिरीकरण आदि के लिए कच्चा माल प्रदान कराने में जैव-विविधता की भूमिका उल्लेखनीय है।

विकासशील एवं अविकसित देशों में 80 प्रतिशत जनता अपने प्राथमिक उपचार के लिए प्राकृतिक दवाओं पर निर्भर करती है।MHI 08 Free Assignment In Hindi

भारत में जो दो चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकृतिप्रदत्त उपादनों पर ही निर्भर करती हैं। आयुर्वेद की अधिकांश दवाएँ पेड़-पौधों और जीव-जन्तुओं एवं खनिज लवणों से प्राप्त होती हैं।

अब तक ज्ञात लगभग 20000 प्रजातियों के पेड़-पौधों का उपयोग दवा के लिए होता है। इसके साथ ही पश्चिमी चिकित्सा पद्धति अर्थात एलोपैथी में प्रयुक्त होने वाली एक-चौथाई दवाएँ पेड़-पौधों से ही निर्मित होती हैं।

इसके अतरिक्त आनुवंशिक विविधता के कारण ही फसलों एवं मवेशियों की नयी-नयी संकर प्रजातियों को विकसित कर पाना सम्भव हुआ है।

नई संकर प्रजाति की फसलों के विकास के कारण ही तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के लिए खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराना सम्भव हो सका।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि जैव-विविधता एक ऐसा बहुउपयोगी संसाधन है, जिसके बगैर मनुष्य जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती जैव-विविधता से प्राप्त हो रहे लाभ एवं सम्भावित लाभों को देखते हुए लुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक विस्तृत रणनीति बनाना आवश्यक है।

विद्वानों ने जैव-विविधता के संरक्षण के लिए दो तरीके बताए हैं। पहले के अनुसार मौलिक परिवेश से प्रजाति विशेष को अलग कर संरक्षण करना, जिसे एक्स-सिटु कंजर्वेशन कहते हैं और दूसरे में मौलिक परिवेश के अन्दर संरक्षण करना, जिसे इन-सिटु कंजर्वेशन कहते हैं।MHI 08 Free Assignment In Hindi

एक्स-सिटु कंजर्वेशन में जैव-स्वरूपों को उनके प्राकृतिक परिवेश से अलग कर दिया जाता है ताकि लुप्त हो रही प्रजाति के जीवन को बचाया जा सके।

इसका कारण यह है कि ये प्रजातियाँ इतनी दुर्बल हो गई होती हैं कि वन्य परिवेश में उनका जीवन असम्भव हो जाता है। अनेक बार दूरी और कानूनी कारणों से भी लुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण उनके प्राकृतिक परिवेश में सम्भव नहीं रह जाता। एक्स-सिटु संरक्षण कई तरीके से किए जाते हैं

(i) जैव एवं वनस्पति उद्यानों को स्थापित करके.
(ii)शोध केन्द्र, एक्वेरिया तथा अन्य संस्था बनाकर

(iii)इन-विट्रो तकनीकी से जीन बैंक एवं सीड बैंक बनाकर,
(iv) लुप्तप्राय प्रजाति में अपने परिवेश से बाहर पुनरुज्जीवन और प्रसार के लक्षण दिखें तो उन्हें पुनः वन्य परिवेश में रखकर।

दूसरी ओर इन-सिटु कंजर्वेशन में लुप्तप्राय प्रजातियों को उनके प्राकृतिक परिवेश में ही संरक्षित कर उनके जीवन की रक्षा का प्रयास किया जाता है। इन-सिटु कंजर्वेशन कुछ खास प्रकार के क्षेत्रों में ही सम्भव हैं, जैसे

(i) राष्ट्रीय उद्यान और सैंक्चुअरी,
(ii) संरक्षित एवं सुरक्षित वन,

(iii) बायोस्फीयर,
(iv) नेचर रिजर्वस,
(v) बायोडाइवर्सिटी पार्क आदि।MHI 08 Free Assignment In Hindi

जैव-विविधता के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रकार के कदम उठाए जा रहे हैं। भारत सरकार द्वारा जैव-विविधता के संरक्षण के लिए अपना ध्यान कुछ विशेष जैव-स्वरूपों के संरक्षण पर केन्द्रित किया गया है।

ये ऐसे जैव स्वरूप हैं, जो अन्य विभिन्न प्रजातियों और पारितन्त्र के पुनर्वास और प्रसार में सहायक भूमिका निभाते हैं। इसके लिए सरकार ने देश के कुल क्षेत्रफल के 4.2 प्रतिशत भाग को सुरक्षित क्षेत्र, राष्ट्रीय उद्यान और सैंक्चुअरीज के लिए सुनिश्चित किया है।

अब तक भारत में 85 राष्ट्रीय उद्यान और 498 वन्य जीव अभयारण्य स्थापित किए जा चुके हैं। सुरक्षित क्षेत्रों में अनेक प्रकार की लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण के लिए कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं, जैसे प्रोजेक्ट हंगुल, टाइगर लॉयन, ब्राउ-एंटलर्ड डीयर, एलीफैंट, क्रोकोडायल आदि।

दस बायोस्फेयर रिजर्व स्थापित किए गए हैं, जहाँ विभिन्न पारितन्त्र के प्रतिनिधि स्वरूपों का संरक्षण हो सके। दलदल भूमि, कच्छ वनस्पति, कोरल रीफ, मरुस्थलों जैसे पारितन्त्र के संरक्षण हेतु भी कई कार्य-योजनाओं की शुरुआत की गई है।

सरकार द्वारा अनेक प्राणी एवं वनस्पति उद्यानों की स्थापना एक्स-सिटु कंजर्वेशन को ध्यान में रखकर ही की गई है।MHI 08 Free Assignment In Hindi

चिड़ियाघर, डीयर पार्क, सफारी पार्क, एक्वेरिया आदि के रूप में लगभग 275 एक्स-सिटु वन्य जीवन संरक्षण केन्द्र स्थापित किए गए हैं। वन्य जीवों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए अनेक द्वारा बनाए गए हैं. यथा वन्य जीव सरक्षा कानन, वन्य कानन, पर्यावरण सरक्षा कानन आदि।

जून, 1992 में रियो डि जेनेरिओ में सम्पन्न हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में जैव-विविधता संधि पर भारत सहित विश्व के लगभग सभी देशों ने हस्ताक्षर किए। इस सन्धि में जैव-विविधता को बनाए रखने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर परस्पर संसाधनों एवं तकनीकों के द्वारा सहयोग करने पर विशेष बल दिया गया।

केन्द्र सरकार द्वारा एक जैव-विविधता सूचना नेटवर्क बनाने का काम भी हो रहा है। साथ ही जैव-विविधता की सुरक्षा हेतु व्यावहारिक पद्धतियों के विकास हेतु राज्य सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों, जमीनी स्तर पर कार्यरत संस्थानों, विशेषज्ञों एवं कानून-वेत्ताओं से भी विचार-विमर्श जारी है।

इन-सिटु कंजर्वेशन में सरकारी योजनाओं एवं कार्यों के साथ जनता की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है।

इन-सिटु कंजर्वेशन को ध्यान में रखते हुए विभिन पारितन्त्र एवं जैव-मौसम क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए बायो-रिजर्व एवं जैव-उद्यानों की स्थापना, जर्म प्लाज्मा बैंक की स्थापना, जैव विविधता की महत्ता के लिए जागरूकता अभियान आदि आवश्यक हैं।

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