IGNOU MPA 15 Free Assignment In Hindi 2021-22

MPA 15

लोक निति और विश्लेषण

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MPA 15 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 2. तर्कसंगत नीति-निर्माण मॉडल की जाँच कीजिए।

उत्तर-तर्कसंगत मॉडल को नीति निर्माण में ‘बुद्धिमत्ता का मानदण्ड’ समझा जाता है। यह उपागम नीति निर्माण में तर्कसंगत आधारों पर नीति विकल्पों में से चयन पर जोर देता है। तर्कसंगत नीति-निर्माण सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चुनाव करना है।

राबर्ट हैवमैन ने अपने प्रेक्षण में माना है कि तर्कसंगत नीति वह है जो ‘शुद्ध मूल्य प्राप्ति’ के अधिकतमीकरण के लिए बनाई जाती है। थॉमस डाई के अनुसार, ‘नीति निर्माण तर्कसंगत होता है जब यह सबसे ज्यादा कुशल है,

अर्थात यदि मूल्यों के मध्य अनुपात यह प्राप्त करता है और यह मूल्यों की बलि देता है तो यह सकारात्मक है और किसी भी अन्य नीति विकल्प की बजाय ज्यादा ऊँचा है।’ अतः राजनीतिक नीति-निर्माताओं को तर्कसंगत तथा व्यवहारिक निर्माण पर बल देना चाहिए।

साइमन कहता है कि ‘आदर्श’ निर्णय करने के बदले तर्कसंगत निर्णय करने की प्रक्रिया में नीति-निर्माता समस्या की जटिलता को छोटे-छोटे और स्वाभाविक मांगों में वगीकृत करेंगे। तर्कसंगत नीति-निर्माण के लिए नीति विकल्पों में सशक्त चुनाव करने की जरूरत है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

सके लिए निम्नलिखित अवस्थाएं जरूरी हैं

आरंभ करने के लिए नीति-निर्माता अंतर्निहित समस्या की पहचान करता है। वह लक्ष्य प्राथमिकताओं का निरूपण और निर्धारण करता है।

दूसरी अवस्था में नीति-निर्माता उन विकल्पों और चयन की श्रेणी की पहचान करता है, जो लक्ष्य प्राप्त करने में मदद करते हैं।

तीसरी अवस्था के लिए नीति विकल्पों के लागत और लाभ के संदर्भ में पूर्वानुमानों का परिकलन करना जरूरी है।

नीति-निर्माता सबसे ज्यादा कुशल नीति विकल्प का चयन करता है।

तर्कसंगति के लिए प्रतिबंध : तर्कसंगत निर्णयन पर अधिक व्यवरोध होते हैं। तर्कसंगति की संकल्पना पर भेदभाव के कारण अपना अर्थ ही खोने का खतरा होता है। तर्कसंगत निर्णय करने पर कुछ प्रमुख व्यवरोध हैं

(1. लक्ष्य पूरा करना-तर्कसंगत निर्णय करना ज्यादा जटिल कार्य है। संभावनाएं जो तर्कसंगत नीति से पैदा होंगी, बहुत कम हैं। जब तक नीति-निर्माता तर्कसंगत नीति का सुझाव देता है, प्रश्नास्पद समस्याएं कभी-कभी इतनी कठिन हो सकती हैं कि वे विवरण ही निर्णय होते हैं, जो अन्य प्रयोजनों के आधार पर किए जाते हैं।

इष्टतम प्राप्त करना-तर्कसंगत नीति-निर्माण प्रारूप से इष्टतम नतीजे पैदा होने की संभावना की जाती है। नीति में निजी हितों की कुल संख्या की बजाय जनहित को ज्यादा प्रमुख माना जाता है।

र्कसंगत चयन और कार्यवाही की आवश्यकता के बीच विरोध-तर्कसंगत व्यवहार की खोज और कार्यवाही की जरूरत के मध्य विरोध है। नीति-निर्माताओं को तर्कसंगति के माध्यम से निर्णय करने के लिए अभिप्रेरित नहीं किया जाता है, अपितु वे अपने ही प्रतिलाभों के इष्टतमीकरण की कोशिश करते रहते हैं।

दूसरा, निकट विधायन का गंभीर मूल्यांकन करने के लिए समय कम हो सकता है। समाजीय मूल्यों पर भी स्वतः आम राय नहीं होती है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

राजनीतिक व्यवहार्यता की दुविधा-प्रत्येक नीति-निर्माता राजनीतिक व्यवहार्यता के असमंजस का मुकाबला भी करता है। राजनीतिक असमंजस का तात्पर्य वह संभाव्यता है,

जो हालांकि तर्कसंगत और वांछनीय है, लेकिन वास्तविक रूप से नीति चयन राजनीतिज्ञ प्रणाली द्वारा स्वीकृत किया जा सकता है और कार्यान्वित किया जा सकता है।

लागत-लाभ विश्लेषण की समस्या-नीति-निर्माताओं के लिए ठीक प्रकार से लागत-लाभ अनुपातों का परिकलन करना जटिल है, जब अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्य दाव पर हो।

इनके अतिरिक्त नीति-निर्माताओं को निजी जरूरतें, अंतर्बाधाएं और त्रुटियां होती हैं, जो तर्कसंगत निर्णयों पर पहुंचने के लिए उन्हें विकल्पों का आकलन करने के लिए अक्षम बनाती हैं।

अधिकारी तंत्र का स्वरूप और परिवेश-तर्कसंगत नीति-निर्माण के लिए एक प्रमुख समस्या नौकरशाही युक्त का परिवेश है। थॉमस डाई का मानना है कि ‘विशाल नौकरशाहियों में नीति निर्माण के लिए वर्गीकरण आकार का समन्वय करना कठिन होता है ताकि समस्त विशेषज्ञों को निर्णय के समय ध्यान में लाया जा सके।’

ऐसे भी नीति समीक्षक हैं, जो तर्कसंगत प्रारूप पर अत्यधिक विश्वास रखने के खिलाफ चेतावनी देते हैं। यदि तर्कसंगत प्रारूप का अनुसरण किया जाना है तो ज्यादा तर्कसंगत निर्णयों से समझौता करना उचित होगा।

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प्रश्न 5 नीति वितरण में विभिन्न कार्यान्वयन अभिकरणों की भूमिका का वर्णण कीजिए

उत्तर-नीति वितरण के प्रकार और कार्यान्वयनकर्ता-नीति वितरण की पद्धतियों ने नीति समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया है। उन तरीकों के अनुसार इन वितरण प्रणालियों ने समुचित महत्त्व स्वीकार किया है, जिनमें सार्वजनिक और निजी संस्थाओं के नेटवर्क द्वारा सार्वजनिक माल और सेवाएं प्रदान की गई हैं।MPA 15 Free Assignment In Hindi

कई अभिकरणों में जिम्मेदारी के इस विभाजन ने भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नियंत्रण और जवाबदेही की समस्याएं पैदा की हैं। अब कुछ पदानुक्रमिक निःश्रेणियों ने नीति वितरण पद्धतियों में सफलता प्राप्त किया है,

जो सरकारी और निजी क्षेत्रों के मध्य सामूहिक सहभागिता प्रयोग करती है, प्रक्रिया में गैर-सरकारी संगठनों और वितरण के परिणामी मिश्रण को प्रशासकों, बाजार और नागरिक समाज अभिकरणों के मिश्रण के संबंध में देखा जा सकता है।

प्रशासनिक संगठनों की भूमिकाएं और उत्तरदायित्व :

प्रशासक सरकार की कार्यकारी शाखा है। यह प्रशासनिक संगठन है, इसमें गैर-निर्वाचित पूर्णकालिक सरकारी अधिकारियों का कानूनी निकाय है, जो उनकी सेवाओं की शर्तों के शासित करने वाले नियमों के अनुसार विभागों में पदानुक्रमित रूप से व्यवस्थित किए जाते हैं।

यह एक प्रमुख संस्था है, जो शासन के ज्यादातर दैनिक कार्यों का कार्यान्वयन करती है। यह संस्था कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से अधिकतर कार्यान्वयन निर्देश प्राप्त करती है।

विकल्प की दृष्टि से मंत्री नीतियों पर निर्णय लेते हैं और सिविल कर्मचारी उन्हें कार्यान्वित करने के लिए जरूरी कार्यकारी कार्यवाही करते हैं। वरिष्ठ प्रशासक नीति निष्पादन में प्रमुख भूमिका निभाते हैं,

क्योंकि वे उद्देश्यों से संबंधित हैं, केवल साधनों से नहीं। अलग-अलग नीति सिद्धांतों पर वित्तीय और प्रशासनिक प्रभावों पर परामर्श देना वरिष्ठ प्रशासकों का संवैधानिक उत्तरदायित्व है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

प्रशासकों द्वारा नीति कार्यान्वयन नीति निरूपण में पुनर्निवेश करता है ताकि वे अलग-अलग नीति सिद्धांतों की व्यवहार्यता पर अपने अनुभव से आधिकारिक रूप से परामर्श दे सकते हैं। MPA 15 Free Assignment In Hindi

इसके अतिरिक्त नीति कार्यान्वयन के प्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त ज्ञान वरिष्ठ प्रशासकों को नीति-निर्माण के सुसंगत ज्ञान का एकाधिकार प्रदान करता है जैसे ही प्रशासक उन समस्याओं का सामना करने के लिए अपने अनुभव और विचारों को काम में लाता है, नई नीति उत्पन्न होती है, जिन्हें राजनीतिक स्वामी हल करना चाहते हैं।

वरिष्ठ प्रशासक ज्ञान और अनुभव के आधार पर निम्न कर्मचारियों को इस संबंध में अनुदेश और परामर्श देने में दक्ष होते हैं कि नीति को कैसे कार्यान्वित करना है। इस प्रकार नीति कार्यान्वयन में प्रशासकों की भूमिका समुचित महत्त्व की है।

प्रशासकों के विवेकाधिकार और सीमाएँ :

विधानमण्डल कभी भी स्वयं कार्यान्वयन नहीं कर सकता है, लेकिन अनेक संगठनों और कार्मिकों को कार्य करने के लिए प्रत्यायोजन की जरूरत होती है। कार्यान्वयन के दायित्व का प्रत्यायोजन और विवेकाधिकार प्रशासकों के पास है,

जो नीति निर्माण और नीति निष्पादन की संरचना में प्रमुख भूमिका निभाता है। तकनीकी रूप से समस्त सार्वजनिक संगठनों और कार्मिकों का कार्य कानून और नीति कार्यान्वित करना, निष्पादित करना और लागू करना है। ज्यादातर कार्मिक ऐसा करने में प्रशासकों के विवेकाधिकार का प्रयोग करते हैं। MPA 15 Free Assignment In Hindi

कार्यान्वयन पर अत्यधिक शक्ति और नियंत्रण प्रशासनिक संगठनों और कार्मिकों के हाथ में होता है, इसलिए मुख्य कार्यपालकों को अधीनस्थ अभिकरणों और प्रशासकों को नियंत्रित करने पर सावधान और सशक्त प्रयास करने चाहिए।

प्रशासकों के विवेकाधिकार को नियंत्रित करने के प्रयास अनेक रणनीतियों पर आश्रित होते हैं,
जैसे-(1) यदि नीति अभिकरण के द्वारा विधायिका की संतुष्टि पर कानून का कार्यान्वयन नहीं करते हैं तो नीति में राजनीतिक कार्यपालकों द्वारा बदलाव किया जा सकता है।

(2) समय-समय पर प्रशासन से संबंधित ज्यादातर समस्याओं के हल की जिम्मेदारी या तो अन्य मैत्रीपूर्ण अभिकरण को स्थानांतरित कर दी जाती है या उदण्ड अभिकरण प्रमुख को बदल दिया जाता है।

(3) विधायिका ज्यादा व्यापक कानून बनाकर प्रशासकों के विवेकाधिकार पर नियंत्रण करती है।

प्रशासक की बुनियादी समस्याएँ : MPA 15 Free Assignment In Hindi

नीति कार्यान्वयन प्रशासकों को निम्नलिखित कार्य और भूमिका निष्पादित करनी चाहिए। सर्वप्रथम प्रशासकों को नीतियों की प्रकृति और महत्त्व को स्पष्टतः समझना चाहिए, जिन्हें राजनीतिक स्वामियों ने सुनिश्चित किया है।

उद्देश्य प्राप्ति के लिए अभिकल्पिक नीतियों के निरूपण के संबंध में परामर्श देना और इन नीतियों के निर्वहन के लिए जरूरी संसाधनों को गतिशील बनाने, व्यवस्थित करने और प्रबंध करने का भी उनका उत्तरदायित्व है।

उन्हें अस्पष्टता से बचने में भी नीति-निर्माताओं की मदद करनी चाहिए। उन्हें सामान्य नीति और उनके प्रचालनात्मक उद्देश्यों में उसके लक्ष्यों को कार्यान्वित करने में दक्ष होना चाहिए। जहां तक संभव हो उन्हें नीति निर्माण में विचारयुक्त दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और उचित प्रबंधन तकनीक का प्रयोग करना चाहिए।

विधायी निकाय :

लोक नीति के प्रमुख कार्यान्वयनकर्ता राजनीतिक संगठन हैं, विधायी निकाय भी नीति कार्यान्वयन में शामिल है। हालांकि कार्यान्वयन में उनकी भूमिका सीमित हो सकती है। विधायी निकाय अनेक प्रकार से प्रशासनिक संगठनों के कार्यों को प्रभावित कर सकते हैं।

कानून में विशिष्ट मामलों पर विधायिका की शक्ति वास्तव में असीमित है। प्रशासनिक कार्यों की जांच और आलोचना विधायी निकायों द्वारा हो सकती है।

वे अधिकारीतंत्र के विवेकाधिकार और प्रत्यायोजन पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। विधायिका कराधान और व्यय का अधिकार प्रदान करती है और अपने आर्थिक निर्णयों के लिए कार्यकारी जिम्मेदार होती है।

विधायिका और उसकी विभिन्न समितियां न केवल नियंत्रण करती हैं, बल्कि प्रशासनिक अभिकरणों के कार्यों को भी प्रभावित करने का प्रयास करती हैं MPA 15 Free Assignment In Hindi

जो उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं। भारत में संसद को अपने निर्णयों और कार्यों के लिए राजनीतिक कार्यपालकों पर नियंत्रण का अधिकार प्राप्त है। यह आमतौर पर तीन क्षेत्रों में कार्य करता है-(1) नीति पर नियंत्रण, (2) नीति कार्यान्वयन और विभागों के दैनिक कार्यों पर नियंत्रण और (3) सार्वजनिक व्यय पर नियंत्रण।

न्यायिक निकाय :

प्रशासनिक न्यायाधिकरणों सहित न्यायिक निकाय भी लोक नीतियों के विश्लेषण करने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। भारत जैसे अन्य अनेक विकासशील देशों में ज्यादातर कानून न्यायिक कार्यवाही द्वारा ही लागू किए जाते हैं।

नीति-निष्पादन में न्यायपालिका महत्त्वपूर्ण भूमिका रखती है। जब भी नीति के उद्देश्य अस्पष्ट हों या उसकी अनेक व्याख्याएँ संभव हों, तब न्यायालय अपना निर्णय देता है, जिसे अंतिम माना जाता है,

जब तक विधायिका इस निर्णय पर आगे और विधान न बनाए। नीतियों के कार्यान्वयन के समय भूल, गलतफहमी या जानबूझकर एजेंसियों की किसी गतिविधि से व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारी को चोट पहुंच सकती है।

अत: इनकी शक्तियों के दुसपयोग को रोकने हेतु न्यायपालिका के पास नियंत्रण के अधिकार होते हैं। प्रशासनिक निर्णयों द्वारा अनेक मुद्दों को हल किया जाता है। पारित तथा क्रियान्वित की गई नीतियाँ संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार न होने पर अमान्य घोषित कर दी जाती है।

नागरिक समाज :

लोक नीति के क्षेत्र में नागरिक समाज संगठनों की प्रमुख भूमिका है। नागरिकों की भूमिका को समझने के लिए नागरिक के विषय में जानना आवश्यक है। नागरिक जन्म एवं स्वभाव से राज्य का सदस्य होता है।

वह राज्य के प्रति निष्ठावान होता है तथा उसके कानूनों, नियमों व नीतियों द्वारा प्रदान की गई सुरक्षाओं एवं विशेषाधिकारों को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

सरकार नीतियों का निर्माण नागरिकों या नागरिकों के विशिष्ट वर्ग के कल्याण के लिए करती है। अतः उनके निष्पादन में नागरिकों की भूमिका सक्रिय होती है।

नागरिक नीति-निष्पादकों पर बहुत निर्भर करते हैं। जनतांत्रिक सरकार लोगों के लिए होती है, जिन्हें लाभ एवं न्याय निष्पादकों द्वारा प्राप्त होता है।

लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से नीति-निष्पादकों (सरकारी प्रशासन) तथा नागरिकों के बीच काफी दूरी आ गई है, क्योंकि नागरिक नीतियों का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाते एवं इसके लिए वे प्रशासकों को दोषी मानते हैं।

मुदाय की भूमिका :

समुदाय नीति कार्यान्वयन में एक अन्य प्रमुख घटक है। लोक नीति के परिप्रेक्ष्य के रूप में सामुदायिकीकरण की वकालत करने में सबसे आगे एमिती एटजिओनी है।

1980 के दशक के बाद समुदाय आधारित लोक नीति की कार्यनीतियां स्थानीय लोक नीति-निर्माण और कार्यान्वयन के लिए नए परिप्रेक्ष्य में प्रमुख विकास कर रही हैं।

परिप्रेक्ष्य का लक्ष्य अपनी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के समाधान में समुदाय की भागीदारी बढ़ाना है।

भारत में 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 अपने-अपने समुदायों के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए नीतियों और कार्यक्रमों के निरूपण और कार्यान्वयन के लिए ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करता है। समुदाय को सामाजिक बदलाव और सुधार के एजेंट के रूप में देखा जाता है।

राजनीतिक संरचना का प्रभाव : MPA 15 Free Assignment In Hindi

राजनीतिक दल और कार्यकारी स्टाफ अभिकरण भी नीति कार्यान्वयन प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। सिविल कर्मचारियों का मानना है कि मंत्रियों को उनकी नीति संबंधी सलाह कार्यान्वयन में व्यवहार्यता के पूर्णत: व्यावहारिक तर्कों पर आधारित है।

दूसरी ओर राजनीतिकों का मानना है कि उनके हस्तक्षेप यह देखने के लिए है कि कार्यान्वयन प्रावस्था के दौरान नीति लक्ष्यों को विकृत तो नहीं किया जा रहा है।

इसके अतिरिक्त केन्द्रीय सरकार नीति निर्माण और वित्तीय संसाधनों के प्रावधानों के अलावा उचित प्रशासनिक संरचनाओं का परामर्श देने में प्रमुख भूमिका निभाती है।

भाग –b

प्रश्न 6. नीति कार्यान्वयन में विभिन्न प्रकार की क्या समस्यायें हैं? नीति कार्यान्वयन के अध्ययन में कई प्रकार के दृष्टिकोणों के अनुसरण की आवश्यकता का औचित्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर-नीति कार्यान्वयन में समस्याएँ-समस्त देशों में नीति कार्यान्वयन में उत्पन्न समस्याएं समान होती हैं, चाहे देश विकसित हो या विकासशील हो।

यहां तक कि बेहतर प्रशासनिक संरचनाओं के साथ भी लोक नीति में संकल्पनात्मक और राजनीतिक समस्याओं के कारण उसका अभिप्रेत प्रभाव नहीं हुआ है। कार्यान्वयन का अभाव अपेक्षित संसाधनों की कमी के कारण हो सकता है।

अवधारणात्मक समस्याएँ

लोक नीति के कार्यान्वयन में प्रसंगाधीन समस्याओं और इन समस्याओं का हल करने के लिए जरूरी नीतियों एवं प्रक्रियाओं के प्रकारों को जानने में अवधारणात्मक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। ये संकल्पनात्मक समस्याएं नीति डिजाइन और नीति विश्लेषण से संबंधित हो सकती हैं। MPA 15 Free Assignment In Hindi

1नीति डिजाइन – हॉगवुड और गुन्न का विचार है कि सफल परिणामों के अवसरों में वृद्धि होगी यदि नीति डिजाइन की अवस्था में कार्यान्वयन की अपेक्षित कठिनाइयों पर समुचित ध्यान दिया जाता है। कार्यान्वयन में प्रमुख कमियों से बचने के लिए वे निम्नलिखित सुझाव प्रस्तुत करते हैं

2 कार्यान्वित की जाने वाली नीति कारण और प्रभाव के मान्य विकल्प पर आधारित होती है।

3 संपूर्ण संसाधनों के अनुसार कोई व्यवरोध नहीं है और कार्यान्वयन प्रक्रिया में किसी भी अवस्था में नहीं होते हैं।

4 कारण और प्रभाव के मध्य संबंध प्रत्यक्ष होता है।

5 सम्मत लक्ष्यों की ओर बढ़ते हुए प्रत्येक सहभागी द्वारा निष्पादित किए जाने वाले कार्य पूर्ण विवरणों सहित और सही-सही अनक्रम में विनिर्दिष्ट किए जाने चाहिए।

6 कार्यान्वयन, अभिकरण से बाहर की परिस्थितियां, कमजोर करने वाले व्यवरोध नहीं डालते हैं।

नीति डिजाइन में एक अन्य वैचारिक समस्या भारत में ज्यादातर लोक नीतियों में प्रमुख नियामक विकल्पों का अभाव है। आमतौर पर देखा गया है कि ज्यादातर राज्यों में उद्योग पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के प्रावधानों का अनुपालन करने में आगे नहीं आए हैं।

इसी प्रकार 1987 में राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद द्वारा स्वीकृत राष्ट्रीय जल नीति राष्ट्रीय सर्वसम्मति पैदा करने की दिशा में वांछनीय प्रयास था। लेकिन यह सामान्य डिजाइन के कारण ज्यादातर अकार्यान्वित रहा।

नीति विश्लेषण – भारत में लोक नीतियों का कार्यान्वयन भी नीति मूल्यांकन में वैचारिक कमियों द्वारा बाधित हुआ है, जैसे-राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (1983) वैकल्पिक नीति प्राथमिकताओं की जाँच के बिना अपनाई गई।

राज्य के स्वास्थ्य विभागों द्वारा प्राथमिकताएँ सुनिश्चित करने और स्वास्थ्य समस्याओं में कमी के लिए उचित कार्यनीतियां पैदा करने में अक्षमता का परिणाम अपर्याप्त नीति मूल्यांकन से था। इसके अतिरिक्त प्रमुख नीतियां अनेक नीति विकल्पों पर समुचित चर्चा के बिना अपनाई गई हैं। MPA 15 Free Assignment In Hindi

नीति विवरण – अधिकतर सरकार द्वारा घोषित विवरण में अस्पष्ट और परस्पर विरोधी शर्तों के कारण कार्यान्वयन में समस्याएं पैदा होती हैं। क्षेत्रीय स्तर पर कार्यान्वयनकर्ताओं को ज्यादातर नीति विवरण में स्पष्टता की कमी के कारण अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

भारत में न्यायालयों द्वारा परस्पर विरोधी नीति विवरण का ज्यादातर अलग-अलग व्याख्या के कारण नई नीति का आविर्भाव होता है।

राजनीतिक समस्याएँ

लोक नीतियों के कार्यान्वयन में राजनीतिक समस्याएं भयंकर होती हैं। ये महत्त्वपूर्ण कार्यान्वयन में समस्या उत्पन्न करती हैं।

नीति प्रक्रिया का केन्द्रीकरण – नीति कार्यान्वयन पर केन्द्र और राज्य सरकारों के मध्य वैमनस्यता प्रतिकूल प्रभाव डालती है। पर्यावरण संरक्षण के संबंध में नीति प्रक्रिया ज्यादातर केन्द्रीयकृत है।

लक्ष्य निर्धारण और कार्यविधि सहित केन्द्रीय स्तर पर लिए गए निर्णय, स्थानीय संस्कृति की उपेक्षा करते हैं। केन्द्रीय स्तर पर नीति-निर्माताओं का मानना है कि कई सामाजिक नीतियों के संदर्भ में कार्यान्वयन में अत्यधिक अंतर निहित हैं।

अधिकारीतंत्र का संघीकरण – नीति-निष्पादन निचले स्तर पर प्रारम्भ होता है, जो पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। अपने उच्चाधिकारों का पूर्ण सहयोग न मिलने के कारण नीति-निष्पादन प्रभावी नहीं बन पाता।

प्रशासकों का उच्च और मध्यवर्ती स्तर भी शक्तिहीन है और प्रशासन को दरकिनार कर भ्रष्टाचार और अनुक्रियाहीनता के मामले में नागरिकों को कोई भी मदद देने में विवश होता है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

इसके अतिरिक्त राजनीतिक कार्यपालकों द्वारा जातीय राजनीति में दखल उच्च होने के कारण प्रशासकों के सीमान्तीकरण को ज्यादा बढ़ावा मिलता है, इससे लोक नीतियाँ प्रमुख तरीके से कार्यान्वित करने में उसकी शक्ति की अनदेखी की जाती है।

हितबद्ध समूह राजनीति – हितबद्ध समूह राजनीति के कारण नीतियों का कार्यान्वयन नहीं हो पाता है। उद्योगपति पर्यावरण नीति कार्यान्वयन प्रक्रिया को या तो प्रत्यक्ष रूप से या व्यापारिक समूहों और संबंधित व्यापारिक हितों के प्रतिनिधियों के माध्यम से प्रभावित करते हैं।

संसद में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम पर चर्चा के दौरान परिणाम पालन न करने पर दण्ड कम किए गए और सरकार को अधिनियमित कानून लागू करने में देरी करने के लिए भी विवश किया गया।

भारत में ज्यादातर उद्योगपति राजनीतिक परिस्थितियों द्वारा नियंत्रित होते हैं। शासक दलों तथा अभिजात समूहों से उनके घनिष्ठ संबंध होते हैं। इसलिए पर्यावरण नीति प्रक्रिया में राजनीतिक प्रभाव का प्रयास आम बात है।

प्रशासनिक समस्याएँ :

कार्यान्वयन समस्याओं का मूल्यांकन करने का एक तरीका यह है कि प्रशासन की सीमाओं के संबंध में विचार कर इसे शुरू किया जाए। कुछ प्रशासनिक समस्याएं निम्नलिखित हैं

र्याप्त संस्थागत क्षमता का अभाव-परिवर्तन संबंधी कानूनों और नीतियों के कार्यान्वयन के लिए संस्थागत संरचना और प्रशासनिक क्षमताएं पर्यावरणीय, राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं की कठिनाइयों के सामने किसी भी स्थिति में समुचित नहीं हैं। MPA 15 Free Assignment In Hindi

यहां संस्थागत ढांचे में नियमों और विनियमों की व्यवस्था शामिल है, जिससे प्रशासनिक कार्य और जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से परिभाषित किए जाते हैं और संबंधित प्रशासकों की क्षमताओं के अनुकूल रखे जाते हैं।

कार्मिक और वित्तीय संसाधनों का अभाव-शासन को उत्कृष्ट एवं त्रुटिहीन बनाने के लिए नेतृत्व, संगठन, वित्त, मनोबल, श्रम शक्ति आदि तत्त्व आवश्यक हैं, जिनमें श्रम-शक्ति सबसे महत्त्वपूर्ण है।

जब संबंधित एजेंसी में स्टाफ सदस्यों की संख्या कम हो, तो निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करने में कठिनाई होती है। एजेंसी में इतने कर्मचारी होने चाहिए कि कुछ को प्रशिक्षण हेतु भेजा जा सके।

कुछ आलोचक कहते हैं कि स्टाफ की संख्या पहले की तुलना में बढ़ती जा रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि स्टाफ की तुलना में कार्यभार अधिक बढ़ा है।

स्टाफ की कमी के कारण एजेंसी उन्हें प्रशिक्षित नहीं करवा पाती, जिससे कार्मिक उचित तथा प्रभावी ढंग से किसी मसले को सुलझा पाने में असफल होते हैं। किसी भी नीति के निर्माण के पश्चात उसका नियोजन तथा निष्पादन किया जाता है।

इन सब कार्यों के लिए धन की आवश्यकता होती है। भवन, पदार्थ तथा आवश्यक उपकरण आदि बुनियादी ढाँचागत संसाधन हैं। इन पर निष्पादक निर्भर होते हैं। यदि धनराशि अपर्याप्त हो, या स्वीकृत धनराशि समय पर न मिल पाए, तो निष्पादन प्रभावित होता है।MPA 15 Free Assignment In Hindi

मय का व्यवरोध-अधिकतर देखा गया है कि समय का व्यवरोध कार्यान्वयन अंतर पैदा करता है। नीति-निर्धारणकर्ता आदर्शवादी रूप में समय सीमा को निर्धारित करते समय निष्पादन एजेंसियों के कार्यभार की अनदेखी कर देता है,

परन्तु निष्पादन शीघ्र करने हेतु जब मुख्य कार्यालय एजेंसी पर दबाव डालते हैं, तो वे काम के बोझ के कारण अपने कर्तव्यों का पालन यथेष्टतः नहीं कर पातीं।

प्रशासनिक इच्छा और अभिप्रेरण की कमी-आमतौर पर देखा गया है कि प्रशासनिक इच्छा और अभिप्रेरण के अभाव में सामाजिक नीतिया अकार्यान्वित रह जाती हैं।

आधुनिक वातावरण में सरकारी अधिकारी नीति के कार्यान्वयन विशेष रूप से पर्यावरण संबंधी कानूनों को लागू करने के लिए उत्साहित दिखाई नहीं देते हैं। उनमें से ज्यादातर वित्तीय हितों के प्रभुत्व और धन के लालच में पड़ जाते हैं और विनियमों की प्रवर्तन औपचारिकता में समाप्त हो जाती है।

समन्वय और सहयोग का अभाव-प्रशासनिक अभिकरणों में लचर समन्वय और लुप्त कड़ियां भी समुचित नीति कार्यवाहियों के मार्ग में खड़ी हो जाती हैं, जैसे-प्रशासनिक स्तर पर अनेक विभाग गरीबी उन्मूलन से संबंधित नीतियों के कार्यान्वयन से संबंधित हैं।

नीति कार्यान्वयन में अंतर जनसंख्या और परिवार नियोजन कार्यक्रमों में पाया जाता है। प्रशासनिक अभिकरणों की अधिकता से उनमें उचित समन्वय और सहयोग का अभाव संपूर्ण संस्थागत प्रणाली में प्रमुख कमी है।

सार्वजनिक सहभागिता का अभाव :

शिक्षा, स्वास्थ्य, जनसंख्या नियंत्रण, प्रदूषण नियंत्रण, वन संरक्षण आदि नीति कार्यान्वयन कार्यक्रमों में सार्वजनिक भागीदारी परिणाम पैदा करने में प्रशासनिक स्टाफ पर बहुत व्यवरोध रखता है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

निष्पादन एजेंसी में स्टाफ कम होने के कारण कुछ व्यक्तियों को विशेष प्रशिक्षण के लिए नहीं भेजा जा सकता। उस प्रशिक्षण के बिना कार्मिक उन मुद्दों को समुचित तथा प्रभावी ढंग से हल नहीं कर पाते।

जनता ने प्रदर्शनों और विरोधों के माध्यम से जन आदोलन शुरू करके हितलाभ समूहों का शक्ति आधार पैदा करने का प्रयास किया है।

फल कार्यान्वयन के लिए शर्ते :

सफल कार्यान्वयन में अनेक प्रकार्य और गतिविधियां तथा समय और संसाधन विद्यमान हैं। इसके बावजूद भी सफल कार्यान्वयन के प्रभावी उपायों से मुकाबला नहीं करना चाहिए क्योंकि कार्यान्वयन वैसा नहीं है जैसा कि प्रभाव।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (1983) पूर्णत: कार्यान्वित हो सकती है और इसका थोड़ा अभिप्रेत प्रभाव है। विलियम नीति की असफलता को रोकने के लिए नीति निर्माताओं को कार्यान्वयन क्षमता के निम्नलिखित बिन्दुओं पर ज्यादा ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित करता है

1 नई नीति निर्माण तथा निर्वहन करने में कार्यान्वयनकर्ता कितने सक्षम हैं?

2 कार्यान्वयनकर्ताओं को लोक नीति कितनी सुस्पष्ट की गई है?

3 क्रम को बदलने के लिए नीति निर्माताओं और कार्यान्वयनकर्ताओं में से किसी एक को कितनी शक्ति है? ।

4 कार्यान्वयनकर्ताओं को मदद देने और मदद के लिए सार्थक मार्ग निर्देश पैदा करने में नीति निर्माता कितने दक्ष हैं?

मेजमेनियम और सेबाटियर ने महत्त्वपूर्ण कार्यान्वयन के लिए निम्नलिखित बिन्दुओं पर ज्यादा ध्यान देने के लिए प्रोत्साहित किया हैMPA 15 Free Assignment In Hindi

1 कार्यान्वयनकर्ता अभिकरण के नेता समुचित प्रबंधकीय और राजनीतिक कुशलता सम्पन्न होते हैं, वे सांविधिक लक्ष्यों के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

2 उन नीति लक्ष्यों को सौंपने के लिए कानून को दक्ष बनाना चाहिए, जो स्पष्ट और संसगत हैं अथवा कम से कम लक्ष्य विवादों को हल करने के लिए समुचित नियम प्रदान करते हैं।

3 संपूर्ण कार्यान्वयन प्रक्रिया के दौरान न्यायालय तटस्थ एवं सहयोगशील होते हैं, संगठित घटक दल और प्रमुख विधायक सक्रिय रूप में कार्यक्रम का समर्थन करते हैं।

4 महत्त्वपूर्ण घटकों और आपात संबंधों का निर्धारण के सशक्त विकल्प समावेश करने के लिए कानून को दक्ष बनाना चाहिए।

इस प्रकार क्रिस्टोफर हुड पूर्ण कार्यान्वयन के लिए निम्नलिखित शर्ते सुनिश्चित करता है

1 संगठन की इकाइयों में और उनके मध्य पूर्ण संचार होना चाहिए।

2 नियम लागू किए जाएंगे और उद्देश्य निर्धारित किए जाएंगे।

3 लोग वही करेंगे, जो उन्हें करने के लिए कहा जाएगा।

4 समय का किसी प्रकार का व्यवरोध हो सकता है।

5 आदर्श कार्यान्वयन स्पष्ट प्राधिकार रेखा सहित एकात्मक ‘सेना’ का परिणाम है।

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प्रश्न 9. नीति-मूल्यांकन की विधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर-समाज में घटनाओं की संरचना और बदलावों का अध्ययन करने के लिए उपलब्ध अनेक विधियाँ प्रयोजन और परिप्रेक्ष्यों के आधार पर नीति मूल्यांकन में प्रयोग की जा सकती हैं।

आमतौर पर सामाजिक विज्ञान में दो प्रमुख दृष्टिकोणों-परिमात्रात्मक और गुणात्मक के मध्य अंतर करना आम हो गया है। कैस्ली और कुमार (1988) के अनुसार दो के मध्य अत्यंत स्पष्ट अंतर यह है कि परिमात्रात्मक विधियाँ संख्यात्मक आंकड़े पैदा करती हैं और गुणात्मक विधियां शब्दों में सूचना पैदा करती हैं।

प्रमुख रूप से गुण दोष निर्धारण अध्ययनों में परिमात्रात्मक विश्लेषण का प्रयोग परिणाम और प्रभाव मापन के लिए हो सकता है। MPA 15 Free Assignment In Hindi

1 लाभ-लागत विश्लेषण-स्टोकी और जेखोसेर का मानना है कि लाभ-लागत विश्लेषण मुख्य विश्लेषणात्मक संरचना है, जो सार्वजनिक व्यय निर्णयों का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

लाभ-लागत विश्लेषण के लिए समस्त लाभों और लोगों की क्रमबद्ध गणना जरूरी है, जो सुनिश्चित और अनिश्चित शीघ्र निर्धारण करना कठिन हो सकते हैं। यह तब संभव है जब विशेष परियोजना स्वीकार की जाती है।

ज्यादातर मामलों में लागत काफी यथार्थ रूप से निर्धारित हो सकती है। रोसी और फ्रीमैन (1993) मुद्रीकरण के पाँच उपायों का वर्णन करते हैं

2 बाजार मूल्यांकन।

3 आर्थिक अनुमान।

4 प्रत्यक्ष मापन आकलन।

5 परिकल्पनात्मक प्रश्न।

6 राजनीतिक विकल्पों का प्रेक्षण।

7 लागत-प्रभाविता विश्लेषण-लागत-प्रभाविता को लाभ-लागत विश्लेषण का सरलीकृत प्रारुप माना जाता है। यह उस मात्रा के अनुसार अनेक विकल्पों का विश्लेषण करने की प्रणाली है, जिनसे वे निर्दिष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं।

रोसी और फ्रीमैन का मानना है कि लागत प्रभाविकता विश्लेषण अपने पारंपरिक रूप में लाभ-लागत विश्लेषण के समान है, बजाय इसके कि मुद्राकरण केवल लागत के लिए आवश्यक है, जबकि लाभ प्रत्यक्ष परिणाम इकाइयों में व्यक्त किए जा रहे हैं।

8 प्रयोगात्मक विधि-सामाजिक अनुसंधान में प्रयोगात्मक विधियां असामान्य नहीं हैं। मूल्यांकन का आधार में ‘आदर्श’ प्रयोगशाला की तरह की स्थिति है, जिसमें आबादी में कुछ इकाइयों,

जिन्होंने नीति उपायों के अंतर्गत कुछ सेवाएं प्राप्त की, मनमर्जी से चुनी गई हैं, जबकि अन्यों ने इसे प्राप्त नहीं किया है। इस प्रकार की नीतियों और कार्यक्रमों के निष्पादन के मूल्यांकन में अलग-अलग समूहों के नमूने तुलनात्मक मूल्यांकन के लिए चुने जाते हैं। ….

9 सांख्यिकीय सर्वेक्षण-नीति मूल्यांकन क्षेत्र में सर्वेक्षण विधि अत्यंत उपयोगी है। यह सामाजिक अनुसंधान में बहुत प्रचलित है। इस विधि से सूचना को एकत्रित किया जाता है और विशेष कर नमना लेने की तकनीकों,

प्रश्नावली एवं प्रेक्षण विधि तथा गौण सूचना द्वारा समर्थित साक्षात्कार की मदद से सांख्यिकी साधनों का प्रयोग कर मूल्यांकन किया जाता है। समुचित परिवर्तियों क बाद उचित परिकल्पनाएं उत्पन्न की जाती हैं।

10 गुणात्मक विधियाँ-कई स्थितियों में सूचना का परिमाण सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। सामान्य रूप से संख्यात्मक सूचनाओं का संदर्भ मूल्यांकन किया जाना चाहिए, जो परिणाम में व्यक्त नहीं किया जा सकता है।

परिणामत: सूचनाओं को पूर्णत: परिमाण में होना चाहिए। परिमाणात्मक दृष्टिकोण निम्नलिखित स्थिति में जरूरी है

11 जब ऐसी कठिन प्रक्रियाओं के परिणाम परिवर्तित हों, जिनमें अत्यंत अंत:सम्बद्ध तत्त्व अंतर्निहित हों। ।

12 अंतर्निहित मूल्य निर्धारण के कारण प्रासंगिकता का मूल्यांकन करने के लिए।

13 जब सांख्यिकीय रूप में लाभभोगियों के प्रातिनिधिक नमूने का अध्ययन करना संभव नहीं है।

14 जब संगठनात्मक पहलुओं का अध्ययन कर रहे हों।MPA 15 Free Assignment In Hindi

15 मॉडल निर्माण-किसी निर्धारित नीति से सम्बद्ध लागत और लाभ का महत्त्वपूर्ण तरीके से विश्लेषण करने और ऐसी नीति के विकल्पों की खोज में मदद करने के लिए अधिकतर मॉडलों की मदद ली जाती है।

ऐसे मॉडल केवल तालिकाओं अथवा ग्राफों की श्रेणियां होते हैं, जो क्रमबद्ध रूप में सुसंगत सूचनाओं को प्रदर्शित करते हैं और उनका आकलन करते हैं।

प्रश्न 10. विनिवेश नीति की चर्चा कीजिए तथा राज्य स्तर पर इसके प्रभाव को उजागर कीजिए।

उत्तर-विनिवेश : केंद्रीय सार्वजनिक उद्यम-भारत में 1991-92 में केंद्रीय सार्वजनिक उद्योगों में आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया के रूप में सरकारी शेयरों का विनिवेश शुरू हुआ। 2004-05 तक 50 उद्योगों द्वारा 47,645 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। हालांकि उनका लक्ष्य 96,800 करोड़ रुपये था।

केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों में विनिवेश को चार अवधियों में बाँटा जा सकता है।

1 प्रावस्था I-1991-92 से 1997-98-केंद्रीय सार्वजनिक उद्यमों में विनिवेश को 1991 की औद्योगकि नीति में बढ़ावा मिला। इसे आर्थिक विकास के भाग के रूप में सरकारी शेयरों को म्यूचल फंडों के रूप में 20 प्रतिशत तक सार्वजनिक उद्योगों में विनिवेश करना था।

इसमें कर्मचारियों को बिक्री या हस्तांतरण भी शामिल था। विनिवेश को संसाधन उत्पत्ति, कार्य निष्पादन में सुधार हेतु बाजार संवेदनशीलता शुरू करने और जन भागीदारी हेतु किया गया।

विनिवेश की प्रक्रिया में नीलामी भी की गई। प्रारंभ में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, बीमा कंपनियों, UTI आदि के लिए बोलियाँ खोली गईं।

1992-93 में निजी उद्यमों तथा 1993-94 में मान्यता प्राप्त विदेशी निवेशों (FIIs) के लिए खोली गईं। बिक्री के लिए शेयरों की संख्या निश्चित नहीं की गई थी।MPA 15 Free Assignment In Hindi

विनिवेश वार्षिक बजट का कार्य भाग था, अत: सलाहकार के रूप में विनिवेश आयोग की स्थापना की गई। यह सार्वजनिक उद्योगों के लिए दीर्घकालिक विनिवेश कार्यक्रम तैयार करना,

विनिवेश की सीमा के निर्धारण और शेयर निर्धारकों, कर्मचारियों एवं अन्य स्टेकहोल्डरों से समग्र हित में विनिवेश के वरीय मॉडलों की सिफारिश करना, सलाहकार, विनिवेश हेतु उद्योगों की पहचान आदि कार्य करता है।

अगस्त 1999 तक आयोग ने 58 सार्वजनिक उद्यमों की सिफारिशें की। _ विनिवेश मुख्यतः लाभकारी उद्योगों तक सीमति रहा। लगभग आधा विनिवेश पाँच उद्यमों – BPCL, HPCL, SAIL, ONGC तथा MTNL से प्राप्त हुआ।

विनिवेश की यह अवधि निष्क्रिय’ या ‘मौन दृष्टिकोण की रही। इसमें सार्वजनिक उद्योगों का निजीकरण नहीं हो पाया तथा प्रबंधकीय स्वायत्तता बाजार से सकारात्मक प्रभाव भी नजर नहीं आए।

2 प्रावस्था – वर्ष 1998-99-इस अवधि में वित्त मंत्री ने उद्योगों में सरकार का शेयर भाग 26 प्रतिशत से नीचे लाने के निर्णय का उल्लेख किया। वाहन, वित्तीय संस्थाओं को शेयरों की बिक्री, पूर्ण बिक्री तथा शेयर क्रॉस होल्डिंग जैसे प्रयोजन शामिल थे।

ONGC, IOC तथा GAIL ने शेयर क्रॉस होल्डिंग द्वारा विनिवेश गया। यह इक्विटी विनिमय की गई नीति थी परंतु इसका प्रभाव भी अपेक्षा से कम रहा।MPA 15 Free Assignment In Hindi

3 अवधि III- वर्ष 1999-2000 से 2003-2004- 1999-2000 के बजट में पहली बार ‘निजीकरण’ शब्द का प्रयोग किया गया। इसका उद्देश्य कमजोर सार्वजनिक इकाइयों को पुन: सुदृढ़ करना था।

इसके लिए पुनर्वास पैकेज विकसित कर गैर-राजनीतिक इकाइयों के तर्कसंगत मिश्रण का उपाय निकालना था। विनिवेश प्रयोजन हेतु सार्वजनिक उद्यम कार्यनीतिक तथा गैर-राजनीतिक क्षेत्र में आरक्षित किए गए। इसमें सुरक्षा उपकरण, हथियार, गोला बारूद, परमाणु ऊर्जा, रेल परिवहन आदि को सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया।

कार्यनीतिक रूप में 13 केंद्रीय सार्वजनिक उद्योग शामिल हैं। इनमें से चार उद्योगों को 1996 में विनिवेश आयोग से पुनः वापस ले लिया गया। इनमें से एक BIFR के पास भेजा गया है।

विनिवेश आंशिक शेयरधारिता हेतु की जानी थी तथा कार्यनीतिक बिक्री की पिछली नीति छोड़ दी गई। राष्ट्रीय विनिवेश निधि (NIF) को स्थापित किया गया जिसमें लाभकारी सार्वजनिक उद्यमों में सरकार के कम शेयरों की बिक्री से प्राप्त धन को सारणीबद्ध करना था।

राष्ट्रीय निवेश निधि को भारत की संचित नीति से अलग रखकर उसे शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार अथवा सार्वजनिक उद्योगों के पुनरुद्धार के लिए प्रयोग किया जाना था।

विनिवेश का राजनीतिक औचित्य लोगों को संसाधनों का स्वामित्व तथा नियंत्रण का अधिकार प्रदान करना है। सामान्यतः यह ‘लोक प्रचलित पूँजीवाद’ के नाम से जाना जाता है।

ऐसा U.K. में भी है। यह इस सिद्धांत पर चलता है कि सरकार को व्यापार के प्रबंधन में हस्तक्षेप न कर ‘शासन व्यवस्था’ पर ध्यान देना चाहिए।MPA 15 Free Assignment In Hindi

आर्थिक आधार पर विनिवेश सरकार के वित्त भार को कम करने के लिए उचित है। सार्वजनिक क्षेत्रों में निजी निवेश से प्रौद्योगिक उन्नयन के सरल होने तथा तीव्र गति से आर्थिक विकास की अपेक्षा की जाती है।

विनिवेश : राज्य स्तर के सार्वजनिक उद्यम केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों ने भी अपने सार्वजनिक उद्यमों के निजीकरण की दिशा में कदम उठाए हैं।

आँकड़े बताते हैं कि 63% राज्य सार्वजनिक उद्यम काम नहीं कर रहे थे या घाटे में चल रहे थे। अधिकांश राज्य अपने सार्वजनिक उद्यमों की पुनर्संरचना के लिए प्रयास कर रहे थे।

राजस्थान और तमिलनाडु में सार्वजनिक उद्योगों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब थी। सभी राज्यों का कुल सार्वजनिक घाटा कुल निवेश का लगभग प्रतिशत था।

इस दिशा में अनेक राज्यों के आर्थिक सुधारों हेतु विनिवेश आयोग भी नियुक्त किए थे। आंध्र प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश आदि राज्य इस सूची में शामिल हैं।

आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश जैसे राज्य विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक तथा DFID की सहायता से सार्वजनिक उद्यमों की पुनर्संरचना हेतु कार्य कर रहे हैं।

अनेक राज्य अपने सार्वजनिक उद्यमों को ऋणों को इक्विटी परिवर्तन के अनुसार सहायता दे रहे हैं। राज्य स्तर पर सार्वजनिक उद्यमों की पुनर्संरचना की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैंMPA 15 Free Assignment In Hindi

1 राजस्थान राज्य स्तर के 24 सार्वजनिक उद्यमों में 11576 करोड़ रुपये निवेश हैं जिनमें केवल 15 लाभ में हैं। विनिवेश समिति ने 21 राज्य स्तर के सार्वजनिक उद्यमों में छहः को बंद करने या उनके निजीकरण का फैसला किया है।

2 उत्तर प्रदेश-41 सार्वजनिक उद्यमों में 17773 करोड़ रुपये निवेशित हैं तथा 27 उद्योगों के पुनर्गठन के प्रयास किए जा रहे हैं।

3 हरियाणा-यहाँ 41 सार्वजनिक उद्यमों में 443 करोड़ रुपये का निवेश है। 14 उद्योग बंद हो गए थे तथा 22 की पुनर्संरचना के प्रयास किए जा रहे हैं।

4 हिमाचल प्रदेश-कुल 21 सार्वजनिक उद्यमों में 15 उद्योगों को पुनर्संरचना हेतु चुना गया है।

5 पंजाब-53 उद्यमों में 25 घाटे में थे तथा 23 अक्रियाशील थे। 5 उद्योग बंद किए गए और कुछ का निजीकरण किया गया।

6 मध्य प्रदेश- 26 सार्वजनिक उद्यमों में 23 घाटे में थे। राज्य में कुल 7923 करोड़ रुपये का निवेश था।

7 उड़ीसा-68 सार्वजनिक उद्यमों में 9796 करोड़ रुपये का निवेश था। ज्यादातर उद्यम घाटे में चल रहे थे। 27 उद्योग विनिवेश हेतु चुने गए। ऊर्जा क्षेत्र को काफी महत्त्व दिया गया।

8 महाराष्ट्र-65 उद्यमों में 60 घाटे में चल रहे थे। कुछ उद्यमों की शेयरधारिता घटाकर 49 प्रतिशत से 26 प्रतिशत किया गया।

9 गुजरात-54 उद्यमों में 23438 करोड़ रुपये का निवेश था। 24 उद्यमों को पुनर्संरचना हेतु चुना गया।

10 तमिलनाडु-59 सार्वजनिक उद्यमों में मात्र 26 लाभ में थे। इनमें 6,192 करोड़ रुपये का कुल निवेश था।

11 आंध्र प्रदेश-128 उद्यमों में 48794 करोड़ रुपये का निवेश था और 2919 करोड़ रुपये की हानि हुई। 55 प्रतिशत उद्यम घाटे में चल रहे थे।MPA 15 Free Assignment In Hindi

12 केरल-109 सार्वजनिक उद्यमों में 65 प्रतिशत उद्यम घाटे में थे तथा इनमें 9805 करोड़ रुपये का निवेश था।

13 कर्नाटक-82 उद्यमों में मात्र 31 लाभ में थे। कुल निवेश 21,209 करोड़ रुपये था। इनमें से 15 उद्यमों को निजीकरण करने/बंद करने तथा कुछ उद्योगों को इक्विटी विनिवेश हेतु चुना गया।

विनिवेश नीति : विश्लेषण और सिफारिशें :

1990 के दशक से निजीकरण प्रारंभ हुआ। इसका उद्देश्य संसाधन प्राप्त करना, प्रबंधन में सुधार अथवा उद्यम के कार्य निष्पादन को बाजार अनुशासन प्रदान करना था।

शुरुआत में विनिवेश ‘आंशिक इक्विटी’ के स्थापित अथवा नियंत्रण में किसी प्रकार के परिवर्तन के बिना स्वामित्व अथवा नियंत्रण केवल थोड़ी संख्या में शेयरो की बिक्री हेतु था 1999 से 2003 के बीच इसमें शेयरों की अल्प बिक्री के स्थान पर निजी उद्योग को हस्तांतरित करने पर बल दिया गया।

2004-05 से आगे आंशिक इक्विटी की बिक्री के साथ विनिवेश नीति में परिवर्तन कर स्वामित्व नियंत्रण के हस्तांतरण सहित कोई रणनीतिक बिक्री नहीं थी। इसे यह भी कह सकते हैं कि विनिवेश नीति ने आंशिक बिक्री से कार्यनीतिक बिक्री और दोबारा आंशिक बिक्री की ओर रुख किया।MPA 15 Free Assignment In Hindi

1999 में विनिवेश विभाग स्थपित कर विनिवेश प्रक्रिया की संस्थागत रूप दिया गया। विभाग ने कार्यनीतिका बिक्री के माध्यम से सरकारी शेयरों के विनिवेश की नीति अपनाई।

2001-02 से 2005-06 के बीच उत्पादन में 60 प्रतिशत वृद्धि हुई तथा अर्जन प्रति शेयर 20 गुणा बढ़ा है। पूँजी निवेश में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

रिलायंस इंडिया लिमिटेड के IPCL के लिए, टाटा ने CML तथा VSNL के लिए, स्र्टीलाइट ने HZL और BALCO के लिए, हिंदुस्तान लीवर लिमिटेड ने MFIL के लिए, सुजुकी ने MUL के लिए, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने IBP के लिए सफल बोली लगाई। IOC को IBP की बिक्री को निजीकरण का मामला न कहकर पुनर्संरचना का विषय कहा जा सकता है।

विनिवेश नीति में समझौते के अनुसार कार्यनीतिक को बिक्री, पटटा अथवा व्यापार की नई लाइन अपनाने हेतु सरकार की सलाह लेना अनिवार्य है। रोजगार, भाषा प्रोत्साहन अथवा अन्य विभागों को वस्तुओं व सेवाओं की आपूर्ति जैसे मुद्दों पर भी विचार जरूरी है।

विनिवेश से प्राप्त राशि को सामाजिक और बुनियादी सेवा क्षेत्रों सार्वजनिक उद्यमों की पुनर्संरचना और लोक ऋण के भुगतान हेतु प्रयोग किया जाना चाहिए।MPA 15 Free Assignment In Hindi

सार्वजनिक निगमों के पुनरुद्धार हेतु नीतियों के कार्यांवयन की समय सीमा निर्धारित करना भी जरूरी मुद्दा है। निजीकरण करते समय राष्ट्रीय निर्णय पर सहमति बनाना जरूरी है क्योंकि विनिवेश के बाद केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है।

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