IGNOU MSO 2 Free Assignment In Hindi 2021-22

MSO 2

शोध कार्यपद्धितिया एव विधियाँ

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MSO 2 Free Assignment In Hindi july 2021 & jan 2022

प्रश्न 3. सामाजिक विज्ञान शोध में प्रयुक्त तुलनात्मक विधि की प्रकृति और विस्तार क्षेत्र की आलोचनात्मक जाँच कीजिए

उत्तर-तुलनात्मक विधि (Comparative Method) : तुलना व विषमता की प्रक्रियायें -यदि हम निकटवर्ती सामाजिक जगत की दैनिक जानकारी के बारे में विचार करें, तो हम यह अहसास करते हैं कि इसमें तुलना और विषमता की प्रक्रियायों में सम्मिलित हैं।

हम चीजों, लोगों, खाद्य पदार्थों, संस्कृतियों इत्यादि का उनके श्रेष्ठ या निकृष्ट होने की सहज गुणवत्ताओं के सदंर्भ में मूल्यांकन करते हैं। उनकी संस्कृति हमारी संस्कृति की अपेक्षा अधिक विकसित है।

इस प्रकार की टिप्पणियाँ प्रायः होती रहती हैं। संस्कृति विशेष के अधिक विकसित होने वाले उपर्युक्त कथन में विकासवादी पूर्वाग्रह का आभास होता है। इस प्रकार विकास की अवस्थाएँ अग्रसर होती हैं। प्रत्येक आगामी अवस्था गत अवस्था की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है।

दीर्घ समय तक समाजशास्त्र में जंगली के सभ्य के साथ या आदिम के साथ आधुनिक की तुलना की जाती थी। समाजशास्त्रियों ने विकासवादी तुलनात्मक पद्धति पर आधारित अंतर्निहित मूल्य निर्णय से बचने के लिए ‘सरल’ और ‘जटिल’ समस्याओं का प्रयोग प्रारम्भ किया है।

दैनिक जीवन में भी यह जागरूकता आ गई है कि तुलना न करके इसके स्थान पर प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु या विचार को स्वयं के लिए मूल्यांकित किया जाना चाहिये।MSO 2 Free Assignment In Hindi

दैनिक जीवन में तुलना व समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के मध्य अन्तर – तुलनात्मक पद्धति के कुछ प्रकरण दैनिक जीवन की धारणाओं में भी विद्यमान होते हैं।

तुलना के प्रति दैनिक अनुप्रयोग और समाजशास्त्रीय उपागम के मध्य अंतर करना कठिन है। कारण, समाजशास्त्र एवं दैनिक जीवन के मध्य घनिष्ठ सम्बन्ध है, दोनों स्तर एक-दूसरे के क्षेत्र में आते-जाते रहते हैं।

  1. बेते का मत-बेते ने दैनिक जीवन में तुलनात्मक और समाजशास्त्रीय तुलनात्मक दृष्टिकोणों के मध्य अन्तर निम्न प्रकार किया है। उसके अनुसार सामाजिक विज्ञानों में सम्मिलित विभिन्न विषयों के लक्षणात्मक अंतर निम्न प्रकार होते हैं

(i) अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान आदि कुछ विषय अधिकांशतः सार्वभौमिक सरंचनाओं और प्रत्येक स्थान पर सम्पूर्ण मानवजाति की सामान्य प्रक्रियाओं पर केन्द्रित हैं।

(ii) इन विषयों ने समाजों के मध्य विद्यमान विशेष और निरन्तर बने रहने वाले अंतरों पर कम ध्यान दिया है।

(iii) इतिहास में अपने चयनित देशकाल की सीमाओं से दूर जाये बिना समाजों के विशिष्ट लक्षणों का उल्लेख किया जाता है।

(iv) शोध साधन के रूप में बिना प्रत्येक के विशिष्ट लक्षणों की उपेक्षा किये समस्त समाजों अथवा संस्कृतियों के सामान्य लक्षणों को खोजने के लिये सचेतन रूप से तैयार की गई पद्धति ने समाजशास्त्र और सामाजिक नृशास्त्र को आकृष्ट किया है।MSO 2 Free Assignment In Hindi

इवन्स प्रिचर्ड – इवन्स प्रिचर्ड ने अपने एल.टी. हॉबहाउस मैमोरियल ट्रस्ट लेक्चर, 33 में तुलना के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि व्यापक अर्थ में कोई अन्य विधि है ही नहीं। उसके अनुसार तुलना सम्पूर्ण विज्ञान की अनिवार्य क्रियाविधियों में से एक है। यही “मानव विचारधारा की मूल प्रक्रियाओं में से एक है।”

दुर्खाइम – दुर्खाइम (1964) ने लिखा, “तथ्यों का विवरण देने के स्थान पर तथ्यों की व्याख्या करने के रूप में तुलनात्मक समाजशास्त्र तो समाजशास्त्र की एक विशिष्ट शाखा न होकर स्वयमेव समाजशास्त्र ही है।”

मैक्फार्लेन – मैक्फार्लेन ने लिखा है कि “अनेकों प्रेक्षकों के अनुसार एक तथ्य को आवश्यक समझने के लिए उसे परिप्रेक्ष्य में रखना या दूसरों के साथ उसकी तुलना करना है।”

लेवी – लेवीनकहाँ तथ्य की कवल र तथ्यों के सन्दर्भ समझा जाता है। उसने तक दिया था कि जिसे केवल इंग्लैण्ड के बारे में ही ज्ञात है, उसे इंग्लैण्ड के बारे में बहुत कम ज्ञात है।” मैक्फार्लेन ने कहा-“इतिहास में तुलनाएँ प्रायः काल के अनुसार की जाती हैं।

अन्य समाज विज्ञानों में देश के सन्दर्भ में होती हैं। इतिहासकार अपने समाजों एक प्रतिमान के रूप में लेकर यह देखते हैं कि पुरातनकाल उनसे कितना समान है या मिलता है। नृशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों व अर्थशास्त्रियों के द्वारा यही तुलनात्मक अध्ययन देश के आयाम में किया जाता है।”

पोकॉक-पोकॉक ने कहा था, “अनौपचारिक रूप से तुलना शोध की पद्धति में निहित होती है। यहाँ तक कि अपने सर्वप्रथम क्षेत्र-कार्य में हर नृशास्त्री ने प्रायः अपने समाज की श्रेणियों से ही अपने अध्ययन क्षेत्र के समाज की श्रेणियों की तुलना की है।”

द टाकविल-द टाकविल ने अपने संस्मरणों में तुलना विधि का उदाहरण प्रस्तुत किया था। उसने लिखा था कि “उसने अमेरिका पर अपनी रचनाओं में फ्रांस के बारे में सोचे बिना या उसे अपने सामने रखे बिना एक भी पृष्ठ नहीं लिखा। MSO 2 Free Assignment In Hindi

उसने ऐसे निष्कर्ष प्राप्त करने का प्रयास किया, जो उस विदेशी समाज की सम्पूर्ण दशा न होकर ऐसी बातें थीं, जो अमेरिकी समाज से भिन्न थीं या उसके समान थीं।

उसने सदैव समानताओं और भिन्नताओं को देखकर ही एक रोचक और सही विवरण दे पाने में सफलता पाई। वस्तुतः भिन्न-भिन्न समय पर समाजशास्त्रियों में तुलना और मूल्य निर्धारणों की समस्या के प्रति जागरूकता उत्पन्न हुई।”

केवल समाजशास्त्रियों ने ही तुलना पद्धति का प्रयोग नहीं किया, वरन् प्राचीन विद्वानों में हेरोडोटस, अरस्तू, पॉलिटिक्स, प्लूटार्क आदि विचारकों और पुनर्जागरण के बोडिन तथा मेक्यिावेली ने भी इसे प्रयुक्त किया।

मैक्फार्लेन ने अपनी सूची में पैरी एंडरसन, फर्नाड, ब्राडेल, लुई दुमो, अर्नेस्ट ग्लैनर, जैक गुडी. ई.एल. जोन्स, डेविड लैंडस और विलियम मैक्लीन के नाम सम्मिलित किये हैं।

समकालीन समाजशास्त्रियों जैसे आंद्रे बेते ने तुलनात्मक पद्धति के अनुप्रयोग को जारी रखने पर बल दिया, तथापि पूर्व समाजशास्त्रियों द्वारा की गई त्रुटियों से बचने की ओर भी उसने ध्यान दिया।

तुलनात्मक पद्धति : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – उन्नीसवीं शताब्दी से प्रारम्भ -यद्यपि प्राचीन और मध्यकालीन विद्वानों ने अपनी कृतियों में तुलनाओं का प्रयोग किया, पर सामाजिक शोध की निर्दिष्ट विधि के रूप में तुलनात्मक पद्धति की उत्पत्ति उन्नीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्र और सामाजिक नृशास्त्र से हुई थी।

इसका कारण यह था कि उन्नीसवीं शताब्दी में यह अनुभव किया गया कि तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग मानव समाज और संस्कृति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक नियमों की खोज के लिए भी किया जा सकता है।

तुलनात्मक पद्धति के समर्थक समाज के ऐसे प्राकृतिक विज्ञान की संभावना में विश्वास करते थे. जो व्यवस्थित तुलनाओं के द्वारा सामाजिक जीवन के रूपों में सहअस्तित्व और अनुक्रम की नियमबद्धतायें स्थापित करेगा।

उस समय समाजशास्त्र और नृशास्त्र के अन्तर्गत सामाजिक और सांस्कृतिक तथ्यों के अध्ययन में मानव जीवन के भौतिक या जैविक पक्ष का अध्ययन भी सम्मिलित था।MSO 2 Free Assignment In Hindi

प्रमुख समाजशास्त्री – फ्रांस में दुर्खाइम, इंग्लैंड में हर्बर्ट स्पेंसर और जर्मनी में मैक्स वेबर आदि प्रांरभिक समाजशास्त्रियों ने यह विचार प्रस्तुत किया कि तुलना मानव जाति की विचार करने की मूलभूत प्रक्रियाओं में से एक है।

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स्पेंसर ने प्रिंसिपल्स ऑफ सोशियोलोजी’ में तथा दुर्खाइम ने ‘दि रूलस ऑफ सोशियोलोजिकल मैथड’ में जैव सादृश्य पर बल दिया।

दुर्खाइम ने सामाजिक जगत के अध्ययन हेत तुलनात्मक दृष्टिकोण का निर्माण करने में जैव सादृश्य के शोध-पद्धतिजनक प्रयोग का विकास किया।

दुर्खाइम के तुलनात्मक विधि के व्यवस्थित प्रयोग ने समाजशास्त्र और सामाजिक नृशास्त्र में इसके व्यापक प्रयोग को विश्व के विभिन्न भागों में शोधों में इस मूल्यवान पद्धति का प्रयोग रैडक्लिफ ब्राउन और उसके साथियों ने किया है।

समाजशास्त्रियों और तृशास्त्रियों ने अपनी कृतियों में सामाजिक प्रचलनों और संरचना के मध्य सम्बन्ध की तुलना तथा विरोध प्रकट किये।

अधिकांश सामाजिक शोधों में समाज के सम्बन्ध में एक विशेष अवधारणा प्रचलित थी, जिसके अनुसार समाज स्वजातिक यथार्थता है तथा बाहर से इसका अवलोकन करके पुनः उसका निष्पक्ष वर्णन किया जा सकता है।

इनगोल्ड ने समाज की इस अवधारणा की उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगा कर कहा कि समाजशास्त्र में तुलनात्मक पद्धति ने अनेक अपेक्षाएँ उत्पन्न कर दी।MSO 2 Free Assignment In Hindi

वेबर का मत – मैक्स वेबर के दृष्टिकोण ने तुलनात्मक पद्धति के सम्बन्ध में एक भिन्न मार्ग अपनाया। वेबर ने स्वयं को सामाजिक तथ्यों के अर्थो से आर्थिक सम्बन्धित रखा है। वेबर का कथन है,

“घटक व्यक्तियों के सम्बन्धों में तुलनात्मक पद्धति का प्रारम्भिक प्रयोग केवल समाज के प्राकृतिक विचारों से ही सम्बद्ध न होकर अधिक स्पष्ट रूप से विकास के सिद्धांत से आबद्ध था।”

उन्नीसवीं शताब्दी के नृशास्त्र के एक बड़े भाग का सम्बन्ध सामाजिक प्रतिरूपों के उद्गमों से तथा पुनः निर्माण की उन अवस्थाओं से था, जिनसे गुजरकर उनका सरलतम से जटिलतम रूपों में विकास हुआ।

बेते ने एक ओर मूल्य-तटस्थ और निष्पक्ष उपागम एवं दूसरी ओर स्पेंसर, एमिल दुर्खाइम व मैक्स वेबर जैसे प्रारंभिक समाजशास्त्रियों पर विकासवादी उपागम के प्रभाव से होने वाले तनाव पर टिप्पणी करते हुए उनके विचारों को प्रकट किया।

उनके अनसार समाज, संस्कति में धर्म परिवार विवाह इत्यादि ने सर्वत्र मानव-जीवन को आकार प्रदान किया। इन्होंने देश में ही नहीं वरन् विदेश में भी गम्भीर व बौद्धिक रूप से ध्यान आकर्षित किया।

तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग करने वालों से अपने समाज एवं संस्कृति से एक प्रकार की तटस्थता की अपेक्षा होती है। इस प्रकार की अपेक्षा ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग करने वालों द्वारा नहीं की जाती।

तुलनात्मक पद्धति विशेषाधिकार प्राप्त अपवादों को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार नहीं करती। अतः यह मुक्त रूप से राष्ट्रवाद की भावना को स्वीकार नहीं कर सकती।

यह मौन रूप से स्वीकार किया गया कि पश्चिमी समाज विकास की उच्चतम अवस्था तक पहुँच चुके हैं तथा अन्य समाज उनके नीचे क्रमिक दूरी पर खड़े हैं।MSO 2 Free Assignment In Hindi

तुलनात्मक पद्धति की आकांक्षाओं तथा उसकी उपलब्धियों के मध्य प्रारम्भ से ही एक अंतर था। महिलावादी और सहभागी दृष्टिकोण आधारभूत रूप से मूल्य-तटस्थता की मान्यता को विचलित करते हैं। उनका तर्क है कि प्रभावी वर्ग के परिप्रेक्ष्य ही विश्व व्यापक और तटस्थ मतों के रूप में स्वीकर कर लिये गये हैं।

जैसे उन्नीसवीं शताब्दी के विशेषाधिकार प्राप्त श्वेत पुरुष विद्वानों के विचार निश्चित रूप से सार्वभौमिक ज्ञान के रूप में मान्य हुए। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टिकोण की उत्पत्ति उन महिलावादी और सहभागी दृष्टिकोणों से भिन्न है, जिन्होंने सामाजिक विज्ञान शोध को प्रभावित किया है।

वेबर और दुर्खाइम जानते थे कि वर्ग या राजनीतिक सम्बन्ध के अनुसार विचारों में भिन्नता हो सकती है, पर उन्होंने राष्ट्रीय परंपरा की भिन्नता पर अधिक ध्यान नहीं दिया।

उन्होनें गैर-पश्चिमी समाजों के विचारों और मूल्यों को दृष्टिगत रखा। पर उन्होंने यह कार्य केवल शोध के विषय की भांति ही रखा, शोध-पद्धति निर्माण के अवयवों के रूप में नहीं।

बेते ने यह ज्ञात करने का प्रयास किया है कि क्या विभिन्न विधियों का परामर्श देने से यह कमी दूर की जा सकती है? इसका उत्तर सम्भवत: नकारात्मक है, तथापि समाजशास्त्री के लिये शोध-पद्धतिजनक सुदृढ़ता को स्थापित करना सम्भव होगा. यदि वह अपने अध्यापन के प्रारम्भ में निम्न को स्पष्ट करे –

  1. अपनी-अपनी अवस्थितियों अर्थात् राष्ट्र, लिंग तथा जाति को
  2. सैद्धांतिक अभिरुचियों की

उस स्थिति में उनके पाठकों के लिये समाजशास्त्रीय अध्ययनों की आंतरिक सम्बद्धता तथा उसकी प्रधान मान्यताओं का आलोचनात्मक परीक्षण करना सरल होगा।

तुलनाओं की संख्या और प्रकृति के स्तर पर निम्नलिखित सुझाव दिये गये हैं

  1. हम द्विआधारी चिंतन न करें। MSO 2 Free Assignment In Hindi
  2. हम विश्लेषण की युग्मीय प्रणाली का प्रयोग न करें।

यदि एक युग्म या जोड़े की तुलना की जाये। उदाहरण के लिए, भारत और इंग्लैंड या पश्चिमी देश और शेष देशों की तुलना की जाये, तब निश्चित रूप से यह कहा जायेगा कि इन युग्मों में से एक-दूसरे से बेहतर/श्रेष्ठ/ऊँचा है।

मैक्फार्लेन ने एक आदर्श प्रारूप का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए सामंतवाद पर बर्क की टिप्पणी का सन्दर्भ दिया है कि फ्रांसीसी सामंतवाद को ‘सटीक’ और ‘सामंतवाद’ के अन्य समस्त रूपों को विचलनों के रूप में देखा गया है।

बर्क ने इस मान्यता पर प्रश्नचिह्न लगाया। इसका कारण यह पाया कि पश्चिमी विद्वानों ने अपने-अपने समाजों के बिंबों के आधार पर ही समाजशास्त्र की अधिकांश अवधारणाओं को प्रकट किया है।

त्रिकोणीय तुलना – मैक्फार्लेन ने वास्तविक, ठोस, ऐतिहासिक तथ्यों की सुस्पष्ट त्रिकोणीय तुलना का सुझाव दिया। इनका निर्धारण वेबर के आदर्श प्रकारों के पृष्ठपट की छाया में किया गया।

मैक्फार्लेन का मत है कि त्रिकोणीय विधि को दो तथ्यों तथा एक आदर्श प्रारूप से तीन तथ्यों और एक आदर्श प्रारूप तक बढ़ाने से हम सापेक्षवाद और सारवाद की उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं,

जो गत डेढ़ सौ वर्षों से भी अधिक समय से समाजशास्त्र के समक्ष हैं। हम ऐसी स्थिति की ओर बढ़ सकते हैं, जहाँ लोगों में समानताओं पर बल देने के अतिरिक्त उनकी अद्भुतताओं और अंतरों का आनंद लेना सम्भव है।

तुलनात्मक पद्धति के तत्त्व –समाजशास्त्र में तुलनात्मक पद्धति का प्रयोग स्वाभाविक तौर पर किया गया है।

प्रमुख विशेषताएँ -तुलनात्मक पद्धति की मुख्य कतिपय विशेषताओं का वर्णन निम्न प्रकार है

  1. समाज के प्राकृतिक विज्ञान की संभावना में विश्वास। MSO 2 Free Assignment In Hindi
  2. तटस्थता के लक्ष्य और उद्विकास के सिद्धांत के मध्य असुविधाजनक सम्बन्ध।
  3. जैव सादृश्य का प्रभाव।
  4. व्यवस्थित तुलनाएं करने का निर्णय।

समाजशास्त्रियों ने प्रथम तीन विशेषताओं पर पर्याप्त तर्क-वितर्क किया, तथापि उन्होंने व्यवस्थित तुलनाओं के निर्णय के प्रति विश्वास प्रकट किया है।

प्रमुख तत्त्व -तुलनात्मक पद्धति के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित हैं

  1. तुलना की विधियाँ
  2. तुलना की इकाइयाँ
  3. तुलनात्मक पद्धति का लक्ष्य

इनका वर्णन निम्न प्रकार है

तुलना की विधियाँ – सैक्पार्लेन के अनुसार जुलाना विभिन्न तरीकों या विधियों से की जा सकती | है। इसके साथ ही प्रत्येक तुलना अपने कार्य के अनुरूप की जाती है।

यह बात पूर्व-निर्धारित नहीं होती है कि कौन-सी विधि सर्वश्रेष्ठ होगी। केवल कुछ विकल्प ही प्रस्तुत किये जा सकते हैं। दुर्खाइम (1964) ने तुलना की निम्न तीन विधयों को बताया है

(क) एक समाज-विशेष समय में केवल एक समाज की विवेचना सम्भव है। उस समाज कार्य के विशिष्ट तरीकों या सम्बन्धों | में दृष्टिगोचर होने वाले अंतरों का विश्लेषण किया जा सकता है।

(ख) समानतायुक्त समाज-समान प्रकृति वाले ऐसे अनेक समाजों की विवेचना की जा सकती है, जिनकी कार्य-विधियों या सम्बन्धों में अन्तर है।

दूसरे शब्दों में असमान और संभवत: समकालीन समाजों की तुलना की जा सकती है। यदि विभिन्न कालों में कुछ सीमा तक सांस्कृतिक परिवर्तन हुए हों, तो एक ही समाज का भिन्न-भिन्न कालों में अध्ययन किया जा सकता है।

(ग) समरूपी समाज-इस प्रकार के विभिन्न समाजों की तुलना की जा सकती है, जिनके स्वरूप में व्यापक अंतर होने पर भी कुछ समरूपी विशेषताएं हों। एक ही समाज के जीवन में विभिन्न कालों में आमूल परिवर्तन दृष्टिगत होने पर उनकी तुलना भी की जा सकती है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

  1. तुलना की इकाइयाँ (-मैक्फॉर्लेन के अनुसार तुलना पद्धति उन्हीं चीजों की तुलना करने में सफल हो सकती है, जिनकी तुलना की जा सके। इसके अंतर्गत अनेक विशेषताएँ सम्मिलित हैं; जैसे

(ii) एक ही वर्ग-द्वितीय प्रभावी तुलना के लिए चीजें किसी न किसी रूप में एक ही वर्ग या क्रम की होनी चाहिए। इस प्रकार अमेरिका में विवाह की तुलना का चीन की चाय पीने की पद्धति से करने का कार्य अर्थहीन होगा।

तुलनाओं का चयन – तुलनाओं का चयन महत्त्वपूर्ण है। हमें इस सम्बन्ध में सावधान रहना होगा। कभी-कभी एक समान दृष्टिगोचर होने वाली चीजों के चयन करने पर भी धोखा हो सकता है।

उदाहरणार्थ, ‘नगर’, ‘विवाह’, ‘परिवार’, ‘कानून’ आदि में विभिन्न प्रकार की नृजाति विवरण शास्त्रपरक मान्यताएं ‘घर’, ‘आहार’, ‘शरीर’ आदि स्पष्ट शब्दों में भी प्रत्येक संस्कृति में मान्यताओं का जटिल समुच्चय दृष्टिगोचर होता है।

अतः तुलना हेतु इकाइयों का चयन करते समय सतर्कता बरतनी आवश्यक है।

तुलनात्मक पद्धति का लक्ष्य -सामाजिक वैज्ञानिकों के अनुसार शोध के उपकरणों में तुलनात्मक पद्धति एक उपकरण ही है। प्रत्येक शोधकार को निम्नलिखित बातें विदित होनी चाहिये

(i) उसे किसी भी विशिष्ट उपकरण का प्रयोग किस कारण करना है?

(ii) उसका उदेश्य क्या है?
(ii) किसी उपकरण का अच्छी तरह प्रयोग किस प्रकार किया जाये? इस सम्बन्ध में, मैक्फॉर्लेन के सुझाव निम्न प्रकार हैं MSO 2 Free Assignment In Hindi

i) शोधकार को अपरिचित से दूरी बनाये रखनी चाहिये।
(ii) शोधकार को अपरिचित से परिचित होने का प्रयास किया जाना चाहिए। ..
(iii) शोधकार को अदृश्य प्रकट करना चाहिये

सुपरिचित से दूरी रखना – सुपरिचित सदूत बनार्थ रखती या स्पष्ट को अस्पष्ट में परिवर्तित करने का अर्थ है स्वयं तथा भली प्रकार विदित चीजों के मध्य में दूरी रखना जिससे कि शोधकार उन्हें भिन्न दृष्टिकोण से देख सके। अधिकांश शोधकारों के समक्ष प्राय: सुपरिचित काम’ देखने की समस्या होती है।

इसका प्रमुख कारण यह है कि वे यह सोच लेते हैं कि ‘ऐसा होता ही है। पीने के पानी वाले गिलास के किनारों का स्पर्श न करना भारतीयों के लिये सामान्य बात है, परन्तु विदेशियों के लिये यह विशिष्ट बात हो सकती है।

समाजशास्त्र में सामान्य बोध सम्बन्धी प्रश्न करना सिद्धान्त के क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। यथार्थ के जो स्वरूप हमें स्वाभाविक प्रतीत हों, वही प्रायः समाजशास्त्रीय दृष्टि से सिद्धांत निर्माण में महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

परिचित से परिचित होना -कार्य करते समय अनेक चीजें इस प्रकार की दिखाई देती हैं, जिनके बारे में हम पूर्णतया अनजान होते हैं। उनके तर्क तक हमारी पहुँच नहीं होती अथवा वे हमारी समझ में नहीं आते। यह जटिल समस्या है। इस प्रकार की स्थिति में प्रायः निम्न प्रकार के पग उठा लिये जाते हैं

विषय को पूरी तरह छोड़ दिया जाता है, या MSO 2 Free Assignment In Hindi

अविवेकी और निरर्थक कहकर उसके बारे में सोचना बन्द कर दिया जाता है।

अन्य समाजों पर अन्य विद्वानों के द्वारा किये गए अध्ययनों के माध्यम से ऐसी समस्या का समाधान करना एक प्रकार से अब ज्ञात हो गया है।

उदाहरण के लिए, पश्चिम में इतिहासकारों का रक्त-प्रतिशोध और जादू-टोने जैसे कौतूहलपूर्ण तथ्यों का अध्ययन करते समय इनको समझने में नृशास्त्रीय अध्ययनों से उपयोगी अंतर्दृष्टियाँ प्राप्त हुई।

  1. अदृश्य को प्रकट करना – तुलनात्मक विधि से हमें अदृश्य प्रकट करने में सहायता मिलती है। शोध के दौरान यह पता लगता है कि अनेक रोचक बातें प्राय: वे होती हैं, जो प्रायः दृष्टिगोचर नहीं हो पाती। इनसे अवगत होना आसान भी नहीं है।

मैक्फार्लेन ने रॉबर्ट स्मिथ का उदाहरण दिया है। उसने बताया कि जब एक जापानी विद्वान से पूछा गया कि आधुनिक जापान में पूर्वजों की पूजा का प्रचलन अभी भी क्यों है, तो जापानी विद्वान ने उत्तर दिया कि यह बड़ा नीरस सवाल है।

उसने आगे कहा कि वास्तविक प्रश्न तो यह है कि पश्चिम में पूर्वजों की पूजा क्यों लुप्त हो गई।

उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि दोनों ही प्रश्न रोचक हैं और प्रत्येक शोधकार को अपनी दृष्टि से अदृश्य को प्रकट करने की इच्छा होती है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

प्रश्न 4. सामाजिक शोध संबंधी सहभागी दृष्टिकोण की चर्चा कीजिए।

उत्तर-सहभागी उपागम के आविर्भाव के इतिहास को ज्ञात करने के प्रमुख स्रोत विश्व के दक्षिणी देशों के ईवाना इलिच व पाओलो फ्रेर आदि जैसे प्रौढ़ों के शिक्षकों की रचनायें हैं। उन्होंने वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र का विन्यास प्रस्तुत किया था।

1974-75 में प्रौढ़ सीखने वालों के शिक्षकों के एक समूह ने ‘सहभागी शोध’ शब्द का सृजन किया। मुखर्जी ने शोध की अवधारणा तथा उसके अनुप्रयोग के रूप में इसके विकास में सहयोग देने वाले प्रमुख प्रभावों व प्रेरणाओं की विवेचना की।

क्रियानिष्ठ शोध की पुनर्स्थापना लेटिन अमेरिका में की गयी, जो सहभागी क्रियानिष्ठ शोध का आधार बना। सहभागी शोध-पद्धति की तीन शर्ते समुदाय या समूह, कार्य व अन्तिम उद्देश्य हैं।

‘सहभागिता’ से तात्पर्य ‘क्या और कैसे करना है’ के सम्बन्ध में निर्णय लेने के साथ जुड़े समस्त व्यक्तियों के द्वारा एक साथ निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित होना है।

इसने सीमांती लोगों के सशक्तीकरण को सहभागी शोध का लक्ष्य घोषित किया है। त्वरित ग्राम मूल्यांकन लघु समयावधि में जानकारी एकत्र करने व विश्लेषण करने के लिये लोगों को संगठित करने का एक तरीका है।

प्रस्तुत अध्याय में सहभागी शोध विधि व त्वरित ग्राम मूल्यांकन के उद्देश्य प्रयास व उपलब्धियों का अध्ययन किया गया है।

सहभागी उपागम : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : MSO 2 Free Assignment In Hindi

प्रमुख विचारक -सहभागी उपागम के आविर्भाव के इतिहास को ज्ञात करने के प्रमुख स्रोत विश्व के दक्षिणी देशों के ईवान इलिच और पाओलो फ्रेर आदि जैसे प्रौढ़ों के शिक्षकों की रचनाएँ हैं।

उन्होंने स्कूली शिक्षा के विचार का विरोध किया और वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र का विन्यास प्रस्तुत किया। कालान्तर में यही प्रक्रिया सहभागी शोध की अवधारणा के रूप में मूर्तिमान हुई।

उन्होंने शिक्षक और शिक्षार्थी के मध्य समानान्तरीय वार्तालाप के प्रत्यय को प्रस्तुत किया। इसके पीछे उनका उद्देश्य यह था कि सीखने की प्रक्रिया पर सीखने वाले का नियन्त्रण स्थापित हो सके। यही सहभागी उपागम का मूलभूत ढाँचा था।

सहभागी शोध में प्रौढ़ सीखने वालों के शिक्षकों के एक समूह ने ‘सहभागी शोध’ शब्द का सृजन किया। इसको अपनाकर अन्तर्राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा परिषद ने इसे ठोस आकार दिया।

गैर-सरकारी संगठनों सहित सभी क्षेत्रों में जहाँ शोध सामाजिक परिवर्तन और विकास की समस्याओं से सम्बद्ध था, वहाँ सहभागी शोध को लोकप्रियता मिली।

सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन की शोध-पद्धति और अनुप्रयोगों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए मुखर्जी ने कहा कि इन अधिकांश एजेन्सियों का मुख्य सम्बन्ध ग्रामीण विकास रहा है।

कृषि की प्रणालियों पर शोध (एफ.एस.आर.) और अन्य विधियों से प्रभावित होकर 1970 के दशक में शोध-पद्धति के रूप में त्वरित ग्राम मूल्यांकन या आर.आर.ए. विकसित हुआ।

इस सम्बन्ध में रॉबर्ट चैम्बर्स, पीटर हिल्डर ड्रड, रॉबर्ट रोड्स और माइकेल कॉलीसन का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने कुछ अन्य विद्वानों के साथ अक्टूबर, 1978 और दिसम्बर, 1979 में इंस्टिट्यूट ऑफ डेवेलपमेंट स्टडीज के सम्मेलनों में इस दिशा में प्रयास किए गए। MSO 2 Free Assignment In Hindi

शोध ही त्वरित ग्रामीण मूल्यांकन की शोध पद्धति के विभिन्न भागों में फैल गयी। अस्सी के दशक के मध्य में विभिन्न क्षेत्र में स्थितियों में इसमें सफल अनुप्रयोग हुआ।

सहभागी शोध के विकास में प्रमुख प्रभाव और प्रेरणाएँ -मुखर्जी ने अपनी पुस्तक ‘मैथाडॉलाजी इन सोशल रिसर्च’ की प्रस्तावना में शोध की अवधारणा और उसके अनुप्रयोग के रूप में इसके विकास में सहयोग देने वाले प्रमुख प्रभावों और प्रेरणाओं की विवेचना की है।

(i) ज्ञान का समाजशास्त्र – इसका उद्देश्य सामाजिक समूहों द्वारा प्रतिपादित विचारों और विचारधाराओं | को सामाजिक संरचना में उन स्थानों से जोड़ना है, जिन पर वे आसीन हैं।

यह सुझाव दिया गया कि उन संघर्षों और विचारों का वैकल्पिक इतिहास लिखा जाये, जिनका कोई रिकॉर्ड नहीं है तथा जो इतिहास अर्थात् विचारधाराएं रच सकते हैं।

यह आशा व्यक्त की गयी है कि इन सीमांती समूहों द्वारा उद्जनित ज्ञान को जानने, सीखने और शिक्षा की प्रक्रिया के द्वारा उनके जीवन में परिवर्तन व रूपान्तरण की स्थिति लाना सम्भव है।

(ii) क्रियानिष्ठ शोध -क्रियानिष्ठ शोध की पुनर्स्थापना लैटिन अमेरिका में की गयी। यही सहभागी क्रियानिष्ठ | शोध का आधार बना। इसमें ज्ञान के वैध तरीके के रूप में क्रिया की अवधारणा पर बल दिया गया। इस प्रकार ज्ञान के क्षेत्र को व्यवहार के क्षेत्र में ले जाया गया। MSO 2 Free Assignment In Hindi

(iii) दृश्य प्रपंचशास्त्रीय विचार -प्रत्यक्ष ज्ञान शास्त्रीय विचारणा ने जानने के आधार को वैध अनुभव बनाया। इस प्रकार केवल बौद्धिक संज्ञान के परे ज्ञात करने के आधार को विस्तृत रूप दिया गया

(iv) विकास निदर्शन पर वाद-विवाद -विकास निदर्शन पर वाद-विवाद के द्वारा अधोगामी, विशेषज्ञ निर्मित विकास परियोजनाओं और कार्यक्रमों की आलोचना की गयी। इसके परिणामस्वरूप लोगों की सहभागिता, सामुदायिक सहभागिता, उनकी सहभागिता जिनके विकास का प्रयास हो रहा है, आदि विषयों को प्रकाश में लाया गया।

(v) नगर समाज का उदय – गैर-सरकारी संगठनों की संख्या के द्वारा नगर समाज की नई संरचना का उदय हुआ।

सहगामी शोध-पद्धतियाँ : विशेषताएँ – सहभागी पद्धति ने प्रारम्भिक तुलनात्मक पद्धति द्वारा प्रतिपादित निष्पक्षता और मूल्य-तटस्थता के विचार का विरोध किया। इसने सीमांती समूहों जिनकी सामाजिक विज्ञान के ज्ञान में उपेक्षा कर दी गयी थी, के साथ लगाव और झुकाव प्रकट किया।

शर्ते -पार्थनाथ मुखर्जी के अनुसार सहभागी शोध-पद्धति का आधार तीन महत्त्वपूर्ण शर्ते निम्न प्रकार हैं

(i) समुदाय /समूह -एक लक्ष्य समुदाय/समूह का अस्तित्व जिसे अपनी अभावग्रस्त पीड़ित, सीमांती, शोषित परिस्थिति को अधिक अनुकूल परिस्थिति में परिवर्तित करने की अनुभूत आवश्यकता है।

(ii) कार्य -मान्य और बाह्य हस्तक्षेप की ओर उन्मुख शोधक के सहयोग और संयोजन के साथ यह लक्ष्य समूह निम्नलिखित कार्य करे MSO 2 Free Assignment In Hindi

(a) शोध लक्ष्य गठित करे।
(b) शोध सामग्री एकत्र करने में सहभागी हो और

(c) निष्कर्षों तक पहुँचने तथा उनका विश्लेषण करने में यथासम्भव भागीदारी करे।
(d) निष्कर्ष परिवर्तन/विकास के लिए सामुदायिक कार्यवाही से सम्बद्ध निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रयुक्त हो।

(iii) अन्तिम उद्देश्य -बाह्य शोधकार का अंतिम उद्देश्य (ज्ञान का पूर्ण स्वामित्व लक्ष्य) समुदाय के हाथों में हो, जैसे

(a) स्वास्थ्य प्रणाली
(b) प्रौद्योगिक प्रबन्धन तकनीकें।

इस प्रकार सहभागी शोध की प्रक्रिया में सहभागियों के जीवन तथा जीने की दशाओं में सुधारात्मक परिवर्तन लाने की ओर दिशा-उन्मुख होती है।

सहभागिता की अवधारणा -सामाजिक शोध के सन्दर्भ में सहभागिता के तीन आयाम निम्न प्रकार हैं

प्रथम आयाम -सहभागिता से तात्पर्य “क्या और कैसे करना है” के सम्बन्ध में निर्णय लेने के साथ जुड़े समस्त व्यक्तियों के द्वारा एक साथ निर्णय प्रक्रिया में सम्मिलित होना।

द्वितीय आयाम -सहभागिता में विकास के लिए प्रयासों में सभी का योगदान भी सम्मिलित है। इस प्रकार निर्णयों के कार्यान्वयन से प्रभावित होने वाले लोगों का एक साथ कार्यान्वयन प्रक्रिया में सम्मिलित होना सहभागिता है।

तृतीय आयाम – उपर्युक्त ) i और ii में सम्मिलित समस्त लोग विकास के लिए नियोजित और कार्यान्वित प्रयासों के फलों या लाभों में सहभागिता करते हैं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

सहभागिता सम्बन्धी उपर्युक्त विचार समाज को सम्पूर्ण सामाजिक आर्थिक प्रक्रियाओं का निरूपण करते हैं। यही कारण है कि परिवर्तन एवं विकास की सामाजिक प्रक्रियाओं के शोधकारों का इनसे सम्बन्ध रहता है।

सहभागिता का त्रुटिपूर्ण अर्थ -आजकल सहभागिता का भ्रामक अर्थ लगाया जा रहा है। समाज के व्यापक स्तरीय लक्ष्यों में और सहभागिता के नाम पर सामान्यतः जो कुछ होता है, उसके मध्य बड़ा अन्तराल है।

किसी योजना या कार्यक्रम के कार्यान्वयन में होने वाले वास्तविक कार्य में लोगों की सहभागिता को समुदाय की सहभागिता के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है।

यह उपयुक्त नहीं है। यदि समुदाय की किसी नियोजन प्रक्रिया में तथा योजना या कार्यक्रम की कार्यान्वयन प्रक्रिया के सम्बन्ध में निर्णायक भागीदारी नहीं हो तो उसे सहभागिता नहीं कहा जा सकता है। कभी-कभी बेगारी वाले काम को भी सहभागिता मान लिया जाता है। यह श्रम के शोषण का अधिक विकृत रूप है।

समुदायपरक सहभागिता -कुछ विचारकों ने स्थानीय व्यक्तियों की सहभागिता और समुदाय के संगठित रूप से सम्मिलित होने वाली सहभागिता के मध्य अन्तर किया है।

इस सम्बन्ध में सावधानी बरतनी आवश्यक है, अन्यथा योजना के सभी कार्यकलापों को नियन्त्रित करने में समुदाय की पूर्ण स्वायत्तता की उपेक्षा की जा सकती है। वास्तविक जीवन परिस्थितियों में सहभागिता की ऐसी धारणा किसी भी दृष्टि से सम्भव नहीं है।MSO 2 Free Assignment In Hindi

उपर्युक्त सन्दर्भ में समुदायपरक सहभागिता का विचार वास्तव में प्रौढ़ सीखने वालों के शिक्षकों के द्वारा प्रस्तुत विचारों का तार्किक अनुक्रम है। इस सन्दर्भ में भागीदारों के लिये सहभागिता का आन्तरिक मूल्य होता है तथा शोधकार भी भागीदारों में से एक है।

समुदायपरक सहभागिता से विकास योजनाओं के कार्यान्वयन में देशी जानकारी और विशेषज्ञों का समावेश होना सुनिश्चित हो जाता है। इससे तथाकथित व्यावसायिकों या विशेषज्ञों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

_ सहभागी शोध प्रक्रिया का उद्देश्य शोध में सहभागिता करने वालों की जीने की दशाओं में सुधार लाना है। सहभागी शोध का एक उप-उत्पाद लोगों के हाथों में ज्ञान का स्वामित्व आना है। सहभागी अनुसन्धान की यह विशेषता जीवन की बेहतर दशाओं को स्थायी बनाने में सहायक है। __

पारम्परिक शोध व सहभागी शोध -मुखर्जी ने तथाकथित शैक्षिक/पारम्परिक/रूढ़िगत शोध-पद्धति तथा सहभागी पद्धति की कुछ मूल विशेषताएँ प्रस्तुत की हैं। इनका वर्णन निम्न प्रकार है

अंतःक्षेपी भूमिका-पारम्परिक शोध-पद्धति की मान्यता थी कि आदर्श स्थिति यह है कि बाहरी विषय-वस्तु से अन्तराल रख | जाये, ताकि अध्ययन की जा रही स्थिति विषय अर्थात् सामाजिक वैज्ञानिक की भूमिका से प्रभावित न हो।

इसके विपरीत सहभागी शोध की मुख्य शर्त है शोध से संबद्ध व्यक्तियों की अंतःक्षेपी भूमिका में शोधकार की सामाजिक परिवर्तन पाने के लिये प्रतिबद्धता का होना।

मूल्य तटस्थता को तिलांजलि-सहभागी शोध में मूल्य तटस्थता के लिये कोई स्थान नहीं है। सहभागी शोध को वांछित निर्दिष्ट | परिवर्तन और विकास की ओर प्रयुक्त किया जाता है।

सीमांती समूहों का सशक्तीकरण -पारम्परिक शोध-पद्धति में ऊपर से नीचे की ओर देखने | के दृष्टिकोण को अपनाया गया है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

सहभागी पद्धति में इसका परित्याग करके इस बात पर बल दिया गया है कि शोध को उस प्रक्रिया की तरह देखा जाये, जिसमें उत्पीड़ितों की परिस्थिति के सम्बन्ध में लोगों की जागरूकता निर्मित हो सके।

इसके अतिरिक्त, पारम्परिक शोध-पद्धति के ऊपर से नीचे की ओर देखने वाले दृष्टिकोण में निम्नलिखित के सम्बन्ध में शोधकार और उसकी संस्था निर्णय लेती है

(i) अध्ययन केन्द्रबिन्दु
(ii) उसकी शोध-पद्धति।
(ii) उसके परिणाम/

(iv) जिनका अध्ययन किया जा रहा है, उन्हें शोधकार की सुविधा हेतु वस्तु माना जाता है।
(v) यह तर्क प्रस्तुत किया जाता है कि अधिकांश पारम्परिक शोध-पद्धतियाँ पश्चिम में इस स्पष्ट उद्देश्य के साथ उत्पन्न हुईं कि इसके _ पश्चिमी देशों के अधीन लोगों को नियंत्रित किया जा सके।

शोध प्रक्रिया ने सीमांती लोगों के सशक्तीकरण को सहभागी शोध का लक्ष्य घोषित है।

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लोगों के लिये, लोगों के साथ, लोगों पर नहीं – पारम्परिक शोध-पद्धति का ध्यान निम्नलिखित पर केन्द्रित होता है
(i) व्याख्या में वैज्ञानिक सुदृढ़ता,

(ii) तथ्यों को समझना,
(iii) तत्पश्चात् उस व्याख्या को अधिकृत पत्रिकाओं के माध्यम से वैज्ञानिक समुदाय के मध्य प्रसारित करना,

(iv) यह मानना अपेक्षित किया जाना कि इस प्रकार उद्जनित ज्ञान निम्नलिखित के माध्यम से व्यावहारिक अनुप्रयोग में प्रत्यक्ष या परोक्ष
रूप में योगदान देगा

(a) सामाजिक नीति,
(b) सामाजिक कार्य,
(c) क्रियानिष्ठ शोध। MSO 2 Free Assignment In Hindi

इसके विपरीत, सहभागी शोध केवल लोगों के अध्ययन के रूप में न देखा जाकर ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है, जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं ही अपने उत्पीड़न की परिस्थिति के सम्बन्ध में जागरूकता उत्पन्न करने की ओर है। इसमें शोध आदर्श रूप में लोगों के लिए है और उनके साथ है न कि उन पर है।

परम्परावादी शोध बनाम सहभागी शोध -सहभागी शोध के अनुसार परम्परावादी शोध में तृणमूलक स्तर की समस्याओं के प्रति संवेदनहीनता है। इसके विपरीत परम्परागत शोध सहभागी शोध की आलोचना इस आधार पर करता है कि इसमें वैज्ञानिक सुदृढ़ता का अभाव होता है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

सहभागी शोध स्वयं को परम्परागत शोध के एकमात्र विकल्प के रूप में नहीं रखता। फर्नांडीज का मत है कि परम्परागत शोध का महत्त्व निम्न प्रकार है

(i) लोगों को गतिमान करना,
(ii) नीति वितर्कों के लिए आवश्यक व्यापक वास्तविकताओं को सामने लाना।

मुखर्जी का मत है कि फर्नांडीज और वेमाज द्वारा वर्णित सहभागी शोध एक प्रकार से साधन-उन्मुख विधि है।

समाधान -विचारकों के अनुसार उपर्युक्त दोनों प्रकार की शोध-पद्धतियों के तत्त्वों के समाकलन का समर्थन करना सर्वाधिक उपयुक्त है। यह कार्य सहभागी योजना के व्यावहारिक उद्देश्यों से जुड़ा शोध करने के लिए उपयुक्त है।

मुखर्जी ने भाष्यशास्त्र उत्तर-संरचनावाद समीक्षात्मक यथार्थवाद से व्यापक सिद्धान्तों के सम्बन्ध में कहा है कि ये सिद्धान्त प्रत्यक्षवाद का समर्थन नहीं करते, पर परम्परागत शोध के इस अर्थ में समान रूप से सहमत हैं कि उनका सहभागी क्रियानिष्ठ शोध को गतिमान करने में उपयोग बहुत कम है।

मुखर्जी के अनुसार, ऐसे व्यापक सिद्धान्त समाज में चहुँमुखी और तीव्र सक्रियता उत्पन्न करते हैं, जिसमें प्रायः वे दशाएँ सजित होती हैं जिनसे मलस्तरीय कार्य महत्त्वपूर्ण और आवश्यक हो जाते हैं।”

शोध की रूपरेखा -एक ज्वलन्त प्रश्न यह है कि शोध की रूपरेखा किस प्रकार बनाई जाये, जिससे कि यह उन सामाजिक मूल्यों का संवर्धन करे जो बढ़ती सहभागिता की खोज में अंतर्निहित है। वास्तव में संस्थापित शोध संस्थाएँ प्रचलित वर सम्बन्धों के अनुकूल होती हैं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

अतएव वे केवल उच्च और मध्य स्तर के शोधकारों के लिये लाभप्रद हैं। इसके विपरीत. सहभागी शोध के अनुसार सहभागी विधि द्वारा शोध स्वयं ही सहभागी विकास के लिये एक साधन के रूप में परिवर्तित हो सकता है।

यह स्पष्ट है कि राष्ट्रीय और स्थानीय शक्ति संरचनाएँ सहभागी शोध विधियों के कारण अस्तित्व में आये सद्विवेक की प्रबलता को स्वीकारने में कोई सहायता प्रदान नहीं करती।

सहभागी आन्दोलनों के अनुपालक उस स्थिति में शोध का सहर्ष स्वागत करेंगे, यदि यह शोध निम्नलिखित में सहायता प्रदान करें

(i) उनकी अपनी सामाजिक अस्मिता को समझने में।
(ii) उनको प्रभावित करने वाले सामाजिक सम्बन्धों से अपने सम्बन्धों को जानने में।
(iii) अपने पारिवारिक स्तर की अपेक्षा अधिक बड़े स्तर पर साझे संसाधनों की अधिकाधिक सामान्यता को परखने में।

आवश्यक शर्ते -विचारकों के अनुसार अपने शोध में सहभागिता पर प्रश्नों का समावेश करने के लिये कुछ आवश्यक शर्ते इस प्रकार हैं

(i) शोध में कुछ मुख्य मुद्दों का चयन करना। MSO 2 Free Assignment In Hindi
(ii) मुद्दों का चयन करने के लिये मापदण्डों का सहभागी होना।

(iii) सहभागिता के नाम पर प्रचार से सतर्क रहना, जो वर्तमान लेखन के सभी क्षेत्रों में लगभग सर्वव्यापी हैं।
(iv) समाज विज्ञानों में सहभागी अनुसन्धान के समर्थन हेतु यह तथ्य मानना कि सामाजिक आवश्यकताओं और मूल्य तथा उपलब्ध

दक्षताओं और संसाधनों के सन्दर्भ में सहभागी प्रचलनों और संस्थाओं को बनाना एक गतिकीय और धीरे-धीरे उद्विकसित होने वाली प्रक्रिया है।

सहभागी विधि को केवल कुछ दिनों में वैधानिक बनाना तथा उसे अपनाया जाना संभव नहीं है। सहभागी विधि का विकास दीर्घगामी प्रक्रिया है। इसके लिये निम्नलिखित की आवश्यकता है

(a) काफी समय।
(b) पर्याप्त अनुभव।

(c) पर्याप्त अभ्यास।
(d) यह देखना कि क्या कामगार होता है क्या नहीं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

भाग -ख

निम्नलिखित विषय-वस्तुओं में से किसी एक पर लगभग 3000 शब्दों में शोध रिपोर्ट लिखिए।

प्रश्न 3. भारत में ऑनलाइन शिक्षा का महत्व

उत्तर-ऑनलाइन शिक्षा को साधारण भाषा में समझे, तो जब एक विद्यार्थी अपने घर पर बैठकर किसी भी इलैक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे स्मार्टफोन, टैबलेट, कंप्यूटर और लैपटॉप द्वारा शिक्षा प्राप्त करे उसे ही ऑनलाइन शिक्षा कहते है। कई लोग ऑनलाइन शिक्षा को आधुनिक शिक्षा भी कहते है।

क्योकि इसमें छात्र को शिक्षा प्राप्त करने के लिए घर से निकलने की कोई जरूरत नहीं होती। वह इंटरनेट और स्मार्टफोन द्वारा अपने घर से ही शिक्षा प्राप्त कर सकता है।

ऑनलाइन शिक्षा में एक शिक्षक अपने घर पर बैठकर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे अपने छात्र को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान कर सकता है।

इसमें छात्रो को न तो किसी ब्लैकबोर्ड के सामने बैठने की जरूरत है और न ही किसी क्लास में। इस प्रकार जब शिक्षक और विद्यार्थी दोनों घर पर बैठकर शिक्षा ग्रहण करते है तो इसे ऑनलाइन शिक्षा कहते है।

ऑनलाइन शिक्षा की आवश्यकता-भारत में पिछले कई सालो से छात्रो को ऑनलाइन शिक्षा दी जाती थी। खासकर जब हमारे देश में Jio आया था तब ऑनलाइन शिक्षा को थोड़ी गति मिली थी।

इस समय लोग यूट्यूब और अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से शिक्षा ले रहे थे। लेकिन उस समय ऑनलाइन शिक्षा भारत के कुछ ही राज्यों तक पहुंच पाई थी। क्योंकि उस समय लोगों को ऑनलाइन शिक्षा की ज्यादा जरूरत नहीं थी। MSO 2 Free Assignment In Hindi

लेकिन कोरोना वायरस की महामारी ने ऑनलाइन शिक्षा में अचानक एक बड़ा परिवर्तन ला दिया। इस वायरस की वजह से सभी लोगो को अपने घर में बंद होने की जरूरत पड़ी। इस समय दुनिया के सभी लोगों को शिक्षा प्राप्त करने का एक ही रास्ता दिखा, और वो था ऑनलाइन शिक्षा।

इसी समय भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को ऑनलाइन शिक्षा की आवश्यकता हुई और यहीं से ऑनलाइन शिक्षा बहुत प्रचलित हुई।

हमारी स्कूलों और शिक्षकों ने भी शिक्षा को ऑनलाइन ले जाकर छात्रों तक पहुंचाने का फैसला किया। और वर्तमान में तो ऑनलाइन शिक्षा हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है।

नलाइन शिक्षा के प्रकार – ऑनलाइन शिक्षा को मुख्य दो भागो में विभाजित किया गया है। सिंक्रोनस शिक्षा और असिंक्रोनस शिक्षा। सिंक्रोनस शिक्षा में छात्रों को एक ही समय पर शिक्षक द्वारा शिक्षा दी जाती है। इसलिए इसे लाइव टेलीकास्ट लर्निग भी कहा जाता है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

सिंक्रोनस शिक्षा में लाइव ऑडियो और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग किया जाता है। जब की असिंक्रोनस शिक्षा में छात्र अपनी इच्छा के मुताबिक शिक्षा प्राप्त करता है। क्योकि इसमें सभी क्लास रिकॉर्डेड होते है। हमारे देश में ज्यादातर लोग इसी पद्धति का उपयोग करके पढ़ाई करते है।

ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण करने के तरीके-ऑनलाइन शिक्षा को मुख्य तीन तरीको से ग्रहण किया जा सकता है। जिसमें पहला यूट्यूब के द्वारा। आज हर विषय के वीडियो यूट्यूब पर मौजूद है। देश और दुनिया का कोई भी छात्र यूट्यूब पर वीडियो देखकर फ्री में शिक्षा प्राप्त कर सकता है। _

ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण करने का दूसरा तरीका है, गूगल। गूगल द्वारा ऑनलाइन लिखित चीजें पढ़ कर भी हम बहोत अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सकते है। इसके अलावा अगर हमें किसी चीज के बारे में जानना चाहते है, तो गूगल में सर्च करके निशुल्क ज्ञान प्राप्त कर सकते
_
ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण करने का तीसरा मुख्य तरीका है, लाइव क्लासेस करना। वर्तमान समय में छात्र कोई भी ऑनलाइन कोर्स खरीद कर घर बैठे बहुत अच्छी पढ़ाई कर सकता है।

जिसमें बायजूस, वाईफाई स्टडी, अनएकेडमी, वेदांतु, एक्स्ट्रामार्क्स और टेस्टबुक जैसे कई अलग-अलग प्लेटफार्म के नाम शामिल है। इन प्लेटफार्म के कोर्स खरीदकर छात्र कहीं भी पढ़ाई कर सकता है और शिक्षा ग्रहण कर सकता MSO 2 Free Assignment In Hindi

नलाइन शिक्षा के लाभ और हानि-आज के दौर में ऑनलाइन शिक्षा के कई लाभ और फायदे है। लेकिन दुनिया में बसी हर | चीज के दो पहलू होते है, जिसमें एक होता है लाभ और दूसरा होता है हानि।

इसलिए ऑनलाइन शिक्षा के भी कुछ नुकसान है। हम इसके फायदे और नुकसान दोनों को बारी-बारी जानेगे।

ऑनलाइन शिक्षा के लाभ – शिक्षा पृथ्वी पर रहे हर मनुष्य का मूलभूत अधिकार है। दुनिया का प्रत्येक देश अपने नागरिकों तक एक अच्छी शिक्षा पहुंचाने की कोशिश करता है। क्योकि शिक्षा के माध्यम से मनुष्य अपना मानसिक, बौद्धिक और आर्थिक स्तर को सुधार सकता है।

लेकिन जब कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन हुआ तब से शिक्षा को ऑनलाइन लोगो तक पहुंचाने की जरूरत पड़ी। और पूरा लॉकडाउन लोगो ने घर बैठकर ऑनलाइन शिक्षा ली। परंतु क्या ऑनलाइन शिक्षा से हमें लाभ हुआ?

तो इसका जवाब है, हा। ऑनलाइन शिक्षा का सबसे पहला लाभ यह हुआ कि इससे छात्रों और शिक्षकों के समय और पैसो की काफी बचत हुई। क्योकि यह शिक्षा घर बैठकर ली जाती थी, जिसके कारण छात्रों और शिक्षकों को शिक्षण संस्थानों में जाने की कोई जरूरत नहीं होती थी।

जिससे उनका काफी समय बच जाता था। और शिक्षण संस्थानों में जाने-आने का और बाहर खाने का खर्च भी बच जाता MSO 2 Free Assignment In Hindi

इसके अलावा छात्रों को दिये जाने वाले ऑनलाइन क्लास रिकॉर्ड होते है। जिसके कारण अगर कभी छात्र का क्लास छूट जाए तो उस रिकॉर्ड क्लास को देखकर भी शिक्षा प्राप्त कर सकता है।

उसके साथ-साथ अगर किसी छात्र को ऑनलाइन क्लास के दौरान किसी विषय समझ में नहीं आता, तो वह दुबारा रिकॉर्डिंग क्लास को सुनकर अपनी शंका और दुविधा को दूर कर सकता है।

एक शिक्षक ऑनलाइन शिक्षा से अपने घर बैठकर दुनिया के किसी भी कोने में बैठे अपने छात्र को सर्वश्रेष्ठ शिक्षा दे सकता है। और छात्र भी दुनिया के किसी भी कोने में बैठे अपने मनपसंद शिक्षक से शिक्षा प्राप्त कर सकता है।

हमने आगे भी जाना था कि भारत में कई ऐसे प्लेटफार्म है, जो छात्रो को अच्छी-से-अच्छी शिक्षा पहुंचाने की कोशिश करता है। जिसमें बायजूस, वेदांतु और खान अकादमी जैसे कई बड़े-बड़े नाम शामिल है। इन लोगों ने अपना खुद का ऐप बनाया है,

जिसके जरिए वे छात्रों तक बेहतरीन शिक्षा पहुंचाने की कोशिश करते है। इन ऐपो से जुड़ने वाले हर छात्र से यह लोग व्यक्तिगत संपर्क करते है। जिसके कारण अगर उन्हें कोई समस्या होती है, तो इनके शिक्षक तुरंत ही छात्रों कि समस्या दूर करते है।

ऑनलाइन शिक्षा देश की महिलाओं के लिए भी एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करती है। क्योकि यहां तो घर से निकलने की कोई जरूरत ही नहीं होती। महिलाए घर बैठकर कुछ भी सीख सकती है और दूसरों को सीखा भी सकती है। जैसे कुकिंग, सिलाई, क्राफ्ट, ड्राइंग, पेंटिंग आदि।

साधारण भाषा मे समझे तो अगर आपके पास इंटरनेट और स्मार्टफोन है, तो आप ऑनलाइन कुछ भी सीख सकते है।

ऑनलाइन शिक्षा की हानि – ऑनलाइन शिक्षा की पहली हानि यह है कि, छात्रों को कई घंटो तक मोबाइल या लैपटॉप के सामने बैठना पड़ता है। जिसकी वजह से उनकी आंखों और स्वास्थ्य पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है।

इसके अलावा ऑनलाइन शिक्षा से एक नुकसान यह भी होता है कि, उनको शिक्षा का माहौल नहीं मिलता। क्योकि ऑनलाइन शिक्ष में अक्सर यह देखा गया है कि छात्र आपस में संपर्क नहीं कर पाते। जिससे उनके बीच प्रतिस्पर्धा का माहौल नहीं होता। प्रतिस्पर्धी माहौल ना होने के कारण छात्र धीरे-धीरे शिक्षा से ऊबने लगते है।

इंटरनेट के गलत इस्तेमाल से भी छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। क्योकि एक छात्र को ऑनलाइन शिक्षा के लिए उसके माता-पिता उसे इंटरनेट, स्मार्टफोन या लैपटॉप तो दे देते है।

लेकिन कई बार छात्र ऑनलाइन क्लास के बहाने मोबाइल में गेम खेल रहे होते है। यह भी ऑनलाइन शिक्षा का एक बड़ा नुकसान है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

वर्तमान समय में हमारे देश के अधिकांश नागरिकों की आर्थिक स्थिति बहुत ही कमजोर है। देश में कई लोग तो ऐसे है, जिन्हें दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं होता।

अब ऐसे लोग स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, लैपटॉप और इंटरनेट जैसी सुविधाए कहां से लाएंगे? और यह सभी सुविधाए ऑनलाइन शिक्षा के लिए अति आवश्यक है। इसीलिए लॉकडाउन में भारत के कई गरीब छात्रों तक ऑनलाइन शिक्षा नहीं पहुंच पाई थी।

भारत के कई गावों में आज भी बिजली नहीं है, इसलिए वहां पर इंटरनेट होने की संभावना बहुत कम रहती है। ऐसी जगहों पर भी | ऑनलाइन शिक्षा का कोई महत्व नहीं है।ऑनलाइन शिक्षा में अध्यापक को छात्रों पर नियंत्रण रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

क्योकि ऑनलाइन शिक्षा में छात्रो को शिक्षक का डर कम रहता है। इसकी वजह से कई छात्र अपना होमवर्क समय पर नहीं करते है।

लेकिन अध्यापक स्कूल में छात्र पर नियंत्रण रख सकते है, इसलिए कक्षा में छात्र अनुशासित होकर पढ़ाई करते है। स्कूल में छात्र होमवर्क और क्लास वर्क दोनों समय पर करते है।

स्कूल में अध्यापक छात्रो पर हर वक्त नजर रखते है। किन्तु ऑनलाइन क्लास में अध्यापक छात्रो पर सही से नजर नहीं रख पाते। इसलिए | कई बार छात्र ऑनलाइन क्लास के समय कुछ और कार्य कर रहे होते है। जिससे भी ऑनलाइन शिक्षा का कोई महत्व नहीं रहता। MSO 2 Free Assignment In Hindi

ऑनलाइन शिक्षा में प्रेक्टिकल वर्क कभी नहीं हो सकता, जबके स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ और भी कई प्रतियोगिता कराई जाती है। जैसे की नृत्य, संगीत, योगा, खेल-कूद, भाषण-लेखन प्रतियोगिता, सांस्कृतिक प्रोग्राम आदि में बच्चे भाग लेकर नई चीजे सीखते है।

लेकिन ऑनलाइन क्लास में छात्रों को केवल स्कूल का कोर्स ही खतम कराया जाता है। इसलिए शिक्षक भी छात्रो पर सिर्फ अपना कोर्स खतम कराने पर ध्यान देते है।

भारत के लगभग 54 प्रतिशत छात्र अब ऑनलाइन लर्निग मॉडल के लिए सहज हैं। यह खुलासा ब्रेनली के सर्वेक्षण से हुआ है, जो एक ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म है। महामारी के कारण स्कूल बंद हैं और छात्र ऑनलाइन शिक्षा हासिल कर रहे हैं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

लॉकडाउन एंड लन-फ्रॉम-होम मॉडल नाम का सर्वेक्षण देश भर के 2.371 छात्रों पर किया गया था, ताकि यह समझा जा सके कि पिछले साल ने भारत के छात्रों के शिक्षा और सीखने के पैटर्न को कैसे बदला है हाल ही में कोविड-19 के मामलों में हुए जबरदस्त उछाल के साथ,

अधिकांश छात्र वर्तमान में स्कूल जाने के बारे में आशंकित थे। अभी के हालात को देखते हुए लगभग 56 प्रतिशत छात्रों ने ऑनलाइन सीखने को जारी रखा। सर्वे में शामिल आधे से अधिक छात्रों ने दूसरों पर मिश्रित शिक्षण मॉडल को प्राथमिकता दी।

इसके अलावा छात्रों ने ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफार्मों के साथ अधिक सशक्त महसूस किया। लगभग दो-तिहाई छात्रों ने कहा कि वे अब पहले से अधिक श्लचीलेश और ‘आत्म-निर्भर’ थे।

__ उनमें से भी छात्रों ने अधिक ‘आत्म-विश्वास’ महसूस किया। छात्रों के एक बड़े समूह ने यह भी दावा किया कि ऐसे प्लेटफार्मों ने उन्हें अपनी गति से सीखने में मदद की, ऐसा कुछ जो कभी संभव नहीं है।

ब्रेनली में सीपीओ राजेश बिसानी के मुताबिक, “शिक्षाविदों के इतिहास में कभी भी वैश्विक स्तर पर ऑनलाइन लर्निंग चैनलों का इतने बड़े पैमाने पर उपयोग नहीं किया गया था।

अब, अधिक छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों ने शिक्षा के लिए ऑनलाइन टूल का इस्तेमाल करना सीख लिया है और हमारा मानना है कि मिश्रित शिक्षण दृष्टिकोण तरीका होगा।”

ब्रेनली के पास 3,50,00.000 लाख से अधिक छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों का एक समुदाय है, जो मिलकर शिक्षण को चलाते हैं। इसके भारत में कुल 55,00,000 लाख से अधिक उपयोगकर्ता हैं और अमेरिका, रूस, इंडोनेशिया, ब्राजील, पोलैंड समेत दूसरे देश से भी हैं। _MSO 2 Free Assignment In Hindi

भारत में स्कूल कॉलेज समेत तमाम शैक्षणिक संस्थान अपने-अपने शैक्षिक सत्र पूरे कर पाते, इससे पहले ही कोरोना संकट के चलते उन्हें 24 मार्च से बंद कर दिया गया।

लॉकडाउन की इस अवधि में ऑनलाइन शिक्षण से सत्र पूरा करने की कोशिश की गयी। कई शिक्षण संस्थानों में कक्षाएं जारी थीं और इम्तहान लंबित थे।

मिडिल और सेकेंडरी कक्षाएं ऑनलाइन कराने के लिए जूम जैसे विवादास्पद वेब प्लेटफॉर्मो का सहारा लिया गया। कहीं गूगल तो कहीं स्काइप के जरिए कक्षाएं हुईं।

कहीं यूट्यूब पर ऑनलाइन सामग्री तैयार की गई तो कहीं लेक्चर और कक्षा के वीडियो तैयार कर ऑनलाइन डाले गए और व्हाट्सऐप के माध्यम से विद्यार्थियों का समूहों में भेजे गए। लेकिन अधिकांश संस्थान ऑनलाइन परीक्षा के लिए तैयार नहीं हैं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

जानकार लोगों का मानना है कि आईआईटी जैसे संस्थान अंतिम वर्ष के छात्रों की परीक्षाएं ऑनलाइन करा सकते हैं।

वास्तविक दुनिया में कोविड की दहशत, बचाव और बदइंतजामियों की हलचलों के बीच वर्चुअल संसार में एक खामोश सी गहमागहमी मची हुई थी।

घर देखते ही देखते क्वारंटीन ही नहीं बल्कि ऑनलाइन कामकाज और ऑनलाइन पढ़ाई के ठिकाने बन गए। ये सिलसिला करीब डेढ़ महीने से जोरशोर से चल रहा था।

इधर बहुत से शैक्षणिक संस्थानों में गर्मी की छुट्टियां घोषित हो चुकी है और कई संस्थानों में चंद रोज में अपेक्षित हैं तो अब इस सिलसिले की गति थम गयी है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

लेकिन इस पूरे तजुर्बे ने भविष्य की शिक्षा के तौर-तरीकों में बदलाव के संकेत ही नहीं दिए हैं बल्कि रास्ते भी तैयार कर दिए हैं।

वर्चुअल कोचिंग सेंटर बनाने की होड़-राजस्थान के कोटा जैसी कोचिंग नगरियों के फिलहाल सूना पड़ जाने से समांतर वर्चुअल कोचिंग अड्डे वजूद में आ गए हैं।

विशेषज्ञ एक समय तक बंद कमरों में पढ़ा रहे थे अब स्क्रीनों पर देखते हुए पढ़ा रहे हैं। बड़े पैमाने पर ऑनलाइन कोचिंग संस्थानों, डिजिटल क्लासरूम और ऑनलाइन पाठ्यक्रमों को हासिल करने के लिए रजिस्ट्रेशन की होड़ है।

शिक्षा सामग्रं के उत्पादन और उपभोग का एक नया ई-मार्केट खुल चुका है। कोरसेरा, बाईजूस, वेदांतु और माइंडस्पार्क जैसे बहुत से ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफॉर्म और ट्युटोरियल की मांग पिछले कुछ वर्षों से देखी जा रही है।

इसी लोकप्रियता का नतीजा है कि ऑनलाइन क्लासों के प्लेटफॉर्म बाईजूस के संस्थापक बाईजू रविंद्रन भारत के सबसे युवा अरबपति बताए गए हैं। फोर्ब्स की लिस्ट में उनकी संपत्ति का कुल मूल्य करीब दो अरब डॉलर आंका गया है।

ऑडिट और मार्केटिंग की शीर्ष एजेंसी केपीएमजी और गूगल ने ‘भारत में ऑनलाइन शिक्षा: 2021’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की | है जिसमें 2016 से 2021 की अवधि के दौरान भारत में ऑनलाइन शिक्षा के कारोबार में आठ गुना की अभूतपूर्व वृद्धि आंकी गयी हैं।

2016 में ये कारोबार करीब 25 करोड़ डॉलर का था और 2021 में इसका मूल्य बढ़कर करीब दो अरब डॉलर हो जाएगा। शिक्षा के पेड यूजरों की संख्या 2016 में करीब 16 लाख बताई गयी थी, 2021 में जिनके करीब एक करोड़ हो जाने की संभावना है।MSO 2 Free Assignment In Hindi

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में 993 विश्वविद्यालय, करीब चालीस हजार महाविद्यालय हैं और 385 निजी विश्वविद्यालय हैं। उच्च शिक्षा में करीब चार करोड़ विद्यार्थी हैं

और नामांकित छात्रों की दर यानी ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो बढ़कर 2613 प्रतिशत हो गया है। देश के प्रमुख शिक्षा बोर्ड सीबीएसई की 2019 की परीक्षा के लिए 10वीं और 12वीं कक्षाओं में 31 लाख से ज्यादा विद्यार्थी नामांकित थे।

सीआईसीएसई के अलावा विभिन्न राज्यों के स्कूली बोर्डों की छात्र संख्या भी करोड़ों में है। इन आंकड़ों को देखते हुए ही इंटरनेट शिक्षा से जुड़ी एजेंसियां लाभ की उम्मीदों में सराबोर हैं।

ऑनलाइन लर्निग के तहत वर्चुअल कक्षाएं और वीडियो-ऑडियो सामग्री, प्रस्तुतिया, पाठ्यक्रम और ट्युटोरियल तो हैं ही, वेबिनार, मॉक टेस्ट, वीडियो और काउंसलिंग आदि की विधियां भी ऑनलाइन संचालित की जा रही हैं।

सबको नहीं उपलब्ध इंटरनेट-केपीएमजी के मुताबिक भारत में इंटरनेट की पैठ 31 प्रतिशत है जिसका अर्थ है देश में 40 करोड से कुछ अधिक लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं।

2021 तक ये संख्या 73 करोड़ से अधिक हो जाएगी। इसी तरह देश में इस समय | 29 करोड़ स्मार्टफोन यूजर हैं। 2021 तक 18 करोड़ नये यूजर जुड़ जएंगे।MSO 2 Free Assignment In Hindi

दूरस्थ शिक्षा के लिए भी ऑनलाइन माध्यम सबसे कारगर माना गया है। इस बीच सरकार ने स्वयं, ई-बस्ता और डिजिटल इंडिया जैसे अभियान शुरु किए हैं।

इस उत्साही तस्वीर को देखते हुए आभास हो सकता है कि भारत में शिक्षा पलक झपकते ही ऑफलाइन से ऑनलाइन मोड में चली जाएगी। लेकिन आंकड़े जितने आकर्षक हों और गरीबों के बीच दिखता है।

केपीएमजी के उपरोक्त आंकड़ों को ही पलटकर देखें तो ये पहलू भी स्पष्ट हो जाता है। ऑनलाइन क्लास की तकनीकी जरूरतों और समय निर्धारण के अलावा एक सवाल टीचर और विद्यार्थियों के बीच और सहपाठियों के पारस्परिक सामंजस्य और सामाजिक जुड़ाव का भी है।

क्लासरूम में टीचर संवाद और संचार के अन्य मानवीय और भौतिक टूल भी इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन ऑनलाइन में ऐसा कर पाना संभव नहीं।

सबसे एक साथ राब्ता न बनाए रख पाना वर्चअल क्लासरूम की सबसे बडी का इधर शहरों में जूम नामक ऐप के जरिए होने वाली कक्षाओं के दौरान तकनीकी समस्याओं के अलावा निजता और शालीनता को खतरे जैसे मुद्दे भी उठे हैं।

कई और असहजताएं भी देखने को मिली हैं, सोशल मीडिया नेटवर्किंग में यूं तो अज्ञात रहा जा सकता है लेकिन ऑनलाइन पढ़ाई के लिए प्रामाणिक उपस्थिति, धैर्य और अनुशासन भी चाहिए। जाहिर है ये नया अनुभव विशेष प्रशिक्षण की मांग करता है।MSO 2 Free Assignment In Hindi

उचित माहौल बनाने की जरूरत-ऑनलाइन पढ़ाई की मजबूरी और आकर्षण के बीच ये जानना भी जरूरी है कि क्या संख्या के आधार पर वाकई देश इसके लिए तैयार है।

एक अध्ययन के मुताबिक विश्वविद्यालय में पढ़ रहे छात्रों वाले ऐसे सिर्फ साढ़े 12 प्रतिशत परिवार ही हैं जिनके घरों में इंटरनेट उपलब्ध है।

भारतीय सांख्यिकी आयोग में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अभिरूप मुखोपाध्याय ने राष्ट्रीय सैंपल सर्वे संगठन के आंकड़ों के आधार पर अपने एक लेख में बताया है कि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले 85 प्रतिशत शहरी छात्रों के पास इंटरनेट है, लेकिन इनमें से 41 प्रतिशत ही ऐसे हैं जिनके पास घर पर भी इंटरनेट है।

उधर 55 प्रतिशत उच्च शिक्षारत ग्रामीण छात्रों में से सिर्फ 28 प्रतिशत छात्रों को ही अपने घरों में इंटरनेट की पहुंच है। राज्यवार भी अंतर देखने को मिला है।

केरल में 51 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में इंटरनेट की पहुंच है लेकिन सिर्फ 23 प्रतिशत के पास घरों में है। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में तो सात से आठ प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में ही इंटरनेट उपलब्ध है।

डिजिटल लर्निग को नवोन्मेषी, समय, संसाधन और दूरी की बचत वाला माध्यम माना जाता है वहीं कुछ जानकारों के मुताबिक ये अकेलापन, अलगाव और हताशा पैदा कर सकता है।

जैसे जैसे कोरोना संकट की वजह से लॉकडाउन का दायरा और समय बढ़ेगा या भविष्य के एहतियात, पाबंदियां और चुनौतियां बनेंगी उस समय कक्षाओं के संचालन के सहज तरीके विकसित करने की चुनौती भी होगी।

वैसे क्लासरूम शिक्षा का विलोप भारत जैसे देश में संभव नहीं है,

जरूरत इस बात की है कि शिक्षा का ऐसा एक समन्वयकारी और समावेशी ढांचा बनाया जाए जिसमें डिजिटल शिक्षा पारंपरिक शिक्षा पद्धति का मखौल न उड़ाती लगे और न पारंपरिक शिक्षा, डिजिटल लर्निग के नवाचार को बाधित करने की कोशिश करे।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने पिछले दिनों ऑनलाइन शिक्षा पर एक सर्वेक्षण किया। इसमें यह तथ्य उजागर हुआ कि 27 प्रतिशत बच्चे स्मार्ट फोन और लैपटॉप के अभाव में ऑनलाइन पढ़ाई से बाहर हो गए हैं।

वहीं, 28 प्रतिशत परिजन बताते हैं कि बिजली की बार-बार कटौती के कारण बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। इस सर्वे में केंद्रीय विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय और सीबीएससी से संबंधित विद्यालय के बच्चे, परिजन और शिक्षकों को शामिल किया गया है।

जाहिर है कि यदि राज्य सरकार द्वारा संचालित सुदूर गांवों के स्कूलों को केंद्र में रखते हुए सर्वेक्षण किया जाता तो स्थिति और अधिक चिंताजनक दिखाई देती।

इस सर्वेक्षण में भागीदार लगभग 34 हजार बप्वों परिजन और शिक्षकों का कहना है कि ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ी आधुनिक तकनीक के संचालन को लेकर अनभिज्ञता की स्थिति है।

इनका कहना है अधिकतर शिक्षक ऑनलाइन शिक्षण के तौर-तरीकों के मामले में पारंगत नहीं हैं। वहीं, ज्यादातर बच्चों ने बताया कि उन्हें ई-टैक्स बुक्स के बारे में जानकारी नहीं है।

सर्वेक्षण में शामिल अधिकतर भागीदारों ने यह भी बताया कि ऑनलाइन माध्यम में गणित की पढ़ाई सबसे जटिल है। कारण यह है कि गणित में अनेक सूत्र और अवधारणाएं हैं।

इसके लिए शिक्षक व सहपाठियों के साथ आपसी संवाद, सहयोग और सतत मूल्यांकन की आवश्यकता होती है। यह ऑनलाइन शिक्षा से संभव नहीं है।

प्रश्न यह भी है कि ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ने वाले बच्चे किस वर्ग के हैं और इससे छूट रहे बच्चे किस वर्ग के हैं। लाखों बच्चे केंद्र सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय विद्यालय और जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ रहे हैं।

जो परिजन अपने बच्चों की पढ़ाई पर पैसा खर्च कर सकते हैं, उन्होंने अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिलाया है।

इन्हीं में एक वर्ग है जो अपनी पारिवारिक हैसियत और तकनीकी उपकरण, नेटवर्क तथा डेटा की पहुंच का लाभ लेकर किसी तरह अपने बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा दिलाने की कोशिश कर रहा है।

स्पष्ट है कि ऑनलाइन शिक्षा से छूटे बच्चे उस बहुसंख्यक वंचित तबके से हैं जो इन तीनों में नहीं हैं। वे तो सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं और जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी नहीं है जो उन्हें शिक्षा के इस नवीनतम माध्यम से जोड़ सकें।

दूसरी तरफ, इन दिनों कोरोना लॉकडाउन में ऑनलाइन शिक्षा के पक्ष और विरोध को लेकर लगातार विमर्श जारी है। एक पक्ष है जो कोरोना काल में इसे एक मजबूरी के रुप में देखे जाने तक तो फिर भी ठीक मान रहा है।

ह ऑनलाइन को शिक्षण के स्थायी विकल्प के रुप में देखने के दावों को लेकर न सिर्फ असहज है बल्कि इस बारे में उसकी कुछ आपत्तियां भी हैं।

जबकि, दुनिया भर में शिक्षण पद्धति से जुड़े विरोधज्ञ मानते हैं कि बच्चों के लिए अच्छी तरह सोखन के स्तर पर ऑनलाइन शिक्षा स्कूली कक्षा की जगह नहीं ले सकती है।

इसी तरह, यदि यह विशेषकर ग्रामीण भारत की पहुंच से अत्याधिक दूर और गैर-व्यावहारिक है तो फिर इसे समय की मांग से जोड़ना कैसे जायज है।

ऑनलाइन शिक्षा कोरोना काल के दौरान चर्चा में आई। हालाकि, तीन प्रमुख बिंदुओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि देश भर में लॉकडाउन की घोषणा के बहुत पहले ही इसे शिक्षा को प्राथमिकता में शामिल कर लिया गया था।

एक तो देश की नई शिक्षा नीति के मसौदे में ऑनलाइन शिक्षा पर दिए गए जोर से इसे समझा जा सकता है। दूसरा, प्रधानमंत्री मोदी के लगातार उन बयनों से भी स्पष्ट होता है

जिनमें वे ऑनलाइन को भविष्य की शिक्षण-पद्धति का केंद्र मानते हैं। तीसरा, इंटरनेट पर एक अंतराष्ट्रीय कंपनी की रिपोर्ट है

जो लॉकडाउन के पहले सार्वजनिक कर दी गई थी और जिसमें यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में अगले चार वर्षों में ऑनलाइन शिक्षा का बाजार 1500 करोड़ डॉलर के आसपास होगा।

यहां शुरुआत में ही यह साफ करना जरुरी है कि शिक्षा में तकनीक नई बात नहीं है। स्कूल में संचालित कक्षाओं में शिक्षण के दौरान तकनीक का प्रयोग हो भी रहा है।

शिक्षा और तकनीक परस्पर एक दूसरे के पूरक और सहयोगी भी हैं। आमतौर पर तकनीक के साथ शिक्षा का प्रसार और विकास को सकारात्मक माना गया है और शिक्षा में तकनीक के प्रयोग को लेकर विरोध का कोई सवाल नहीं है और न ही इस पर किसी तरह की आपत्ति ही की जा सकती ही यहां विमर्श का विषय यह है कि यदि कक्षा की तुलना में ऑनलाइन को शिक्षा प्रणाली में प्राथमिकता दी गई तो इससे भारत के बहुसंख्यक बच्चों की पढ़ाई किस तरह प्रभावित होगी।

इसी तरह, इस आशंका पर भी विचार किया जा रहा है कि ऑनलाइन के बहान सपचे शिक्षा क्षेत्र में वाचक पंजी के निवेश और व्यवस्था पर निजी कंपनियों का अधिकार स्थापित होने पर किस तरह का स्वरूप तैयार होगा।

आभासी क्लास में पहले कौन पाएगा स्थान-आभासी क्लास की कल्पना करने पर सबसे पहले यह विचार आता है कि इसमें किस वर्ग के बच्चों की उपस्थिति सबसे अधिक होगी।

दूसरे शब्दों में कहें तो कौन-से बच्चे होंगे जो आभासी क्लास के योग्य समझे जाएंगे। या मान लीजिए कि इसमें सभी बच्चों को आमंत्रित किया भी गया जिनमें सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले वंचित समुदाय के बच्चे भी शामिल हैं

तो हर एक की सामाजिक-आर्थिक स्थितियां उन्हें आभासी शिक्षा में शामिल होने और लगातार बने होने की अनुमतियां देंगी।

क्या हर भारतीय घर में रहने वाले सभी सरकारी स्कूल के बच्चों के पास पर्याप्त आधुनिकतम यंत्र-तंत्र और इंटरनेट की सुविधाएं होंगी।

इस तरह, जब वंचित समुदाय के बच्चों को आभासी शिक्षा के लिए आमंत्रित करने की सारी औपचारिकताओं और आह्वान के बावजूद यदि बड़ी संख्या में ये नई व्यवस्था से गैर-हाजिर रहें तो क्या उनकी सूची बनाई जाएगी और उनके समर्थन में आवाज उठाई जाएगी।

या फिर वे वैश्विक पूंजी आधारित बाजार में सस्ते कुशल मजदूर बनने की भीड़ में शामिल होने के लिए छोड़ दिए जाएंगे।

इस बात को समझने से पहले हमें भारत की प्राथमिक शिक्षा और सामाजिक व आर्थिक स्थितियों से जुड़ी वास्तविकताओं पर जाने की जरूरत है। प्रश्न है कि जो बच्चे कक्षा पहली में दाखिला लेते हैं

उनमें से कितने बारहवीं पास कर पाते हैं। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों की बात करें तो 94 प्रतिशत आदिवासी, 92 प्रतिशत दलित और 91 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं।

भारत में दसवीं तक 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे स्कूली शिक्षा से बेदखल हो जाते हैं। प्रश्न है कि देश की बड़ी आबादी पहले ही जब स्कूली शिक्षा से बेदखल हो रही है

तो हमारी शिक्षा तंत्र को वंचित समुदाय के बच्चों के अनुकूल और अधिक सरल और सुविधा सम्पन्न बनाने की जरूरत है या इसे पहले से अधिक जटिल तथा महंगी करने की जरूरत है।

जबकि, विभिन्न पिछड़ी जाति, जनजाति, दलित, अल्पसंख्यक, विकलांग और लड़कियों की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को देखते हुए शिक्षा आज भी उनकी पहुंच से दूर है तो पूरी व्यवस्था को सर्व सुलभ बनाने की बजाय और कठिन करने की कवायद क्यों की जा रही है।

प्रश्न है कि ऑनलाइन शिक्षण प्रणाली सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले वंचित समुदाय के बच्चों के लिए पहले से अधिक जटिल और महंगी कैसे हैं।

इस बिंदु पर बात करें तो विशेषकर भारतीय गांवों में हर बच्चे तक यदि महंगे तकनीकी उपकरण की उपलब्धता को एक बार अनदेखा कर दें तब भी यह देखना होगा कि यहां के कितने बच्चे ऑनलाइन शिक्षा में शामिल हो सकते हैं।

तथ्यों पर बात की जाए तो वर्ष 2018 में नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत के 55 हजार गांव में मोबाइल नेटवर्क नहीं है।

वहीं, 2018 में जारी हुई राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार देश के ग्रामीण क्षेत्रों के अंतर्गत महज 15 प्रतिशत घरों में इंटरनेट का उपयोग किया जाता है। जबकि, शहरी क्षेत्रों के अंतर्गत महज 42 प्रतिशत घरों में इंटरनेट का उपयोग किया जाता है।

जाहिर है कि ऑनलाइन शिक्षा को बेहतर बताने का तर्क देकर यदि इसे शिक्षा प्रणाली पर थोपा गया तो उसका लाभ उन्हीं को मिल सकेगा जो इसे वहन कर सकेंगे। MSO 2 Free Assignment In Hindi

जबकि, यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले वंचित समुदाय के बच्चों के लिए पर्याप्त साधन और इंटरनेट डाटा अत्याधिक मुश्किल होगा।

ऑनलाइन शिक्षा को लेकर संदेह की एक वजह यह भी है कि इसे एक बिजनेस मॉडल के रुप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

इसके पक्ष में अब यह बात बहुत स्पष्ट रुप से कहीं जा रही है कि शिक्षा के ऑनलाइन स्वरूप से न्यूनतम निवेश पर अधिकतम मुनाफा हासिल नीति बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है।

यही वजह है कि ऑनलाइन शिक्षण से लेकर ऑनलाइन परीक्षा को ध्यान में रखते हुए बनाए जाने वाले की गई तो कंटेंट तैयार करने वाली एजेंसी ज्ञान को एक प्रोडक्ट के रुप से देखेगी।

ऐसे में ज्ञान की विविधता की जगह एकरूपता को बढ़ावा दिए जाने का खतरा है। क्योंकि, कंटेंट बनाने में जितनी विविधता लाएंगे उतना निवेश बढ़ेगा और मुनाफा कम होगा।

फिर विविधत के लिए अनुसंधान भी करना पड़ेगा। इसलिए, एजेंसी चाहेगी कि सभी के लिए एक जैसी सामग्री बनाई जाए जो कम खर्च में अधिक है।

यह बात भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के अनुकूल नहीं मानी जा सकती जिसके हर राज्य की अपनी एक भाषा और ऐतिहासिक संस्कृति है।

वहीं, शिक्षाविदों की दूसरी चिंता इस बात को लेकर है कि इस बिजनेस मॉडल में ज्ञान का चरित्र कैसा होगा। बिजनेस माइंड से यदि कंटेंट बनाया गया तो देखना होगा कि उसमें उपभोक्तावाद को क्या किसी तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है।MSO 2 Free Assignment In Hindi

किस तरह से सत्तारूढ़ दल की वैचारिक सहजता का ध्यान रखा जा रहा है और उस हिसाब से पाठ्यक्रम को हल्का करने के नाम पर स्वतंत्रता संग्राम के किस चौप्टर को अलग रखा जा रहा है।

किस तरह से जातीय भेदभाव से मुक्ति के इतिहास पर आंखें मूंदी जा रही हैं। किस तरह से आदिवासी इलाकों में जल, जंगल और जमीन से जुड़े मुद्दों पर व्यवसायिक हित साधने के लिए पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अध्याय नहीं जोड़े जा रहे हैं।

ऐसे में छात्र ऑनलाइन शिक्षा तो हासिल करेंगे लेकिन उनमें सामाजिक भेदभाव से मुक्ति को लेकर वैचारिकी का अभाव रहेगा।

इसके अलावा, यदि तकनीक के जरिए लागत कम करने पर ही जोर दिया जाता रहा तो कई शिक्षकों की नियुक्तियां ठेकों पर करने की एक संगठित व्यवस्था तैयार की जा सकती है।

इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया, 2019 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में 67 प्रतिशत पुरुष और 33 प्रतिशत महिलाएं ही इंटरनेट का उपयोग करती हैं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

ग्रामीण भारत में यह अनुपात और अधिक असंतुलित है। यहां पुरुषों की तुलना में महज 28 प्रतिशत महिलाएं ही इंटरनेट का उपयोग करती हैं।

ऐसे में यह स्पष्ट है कि छोटी लड़कियों के लिए स्मार्ट फोन और इंटरनेट उपलब्ध कराना कहीं अधिक मुश्किल है। यदि एक घर में एक मोबाइल है और पढ़ाई करने वाले बच्चे दो या उससे अधिक हैं तो स्थिति उलझ सकती है।

तब एक ही अवधि में किसी एक को ही स्मार्ट फोन देने की बात आई तो भारत के पृतसत्तात्मक सामाजिक संरचना में लड़की को मोबाइल मिलने की संभावना कम है।

वहीं, स्कूल की कक्षा आधारित शिक्षण में लड़कियों को हर दिन घर से बाहर निकलने के अवसर मिलते हैं। इससे वे बाहर की दुनिया को देखती, सीखती और समझती हैं। ऑनलाइन शिक्षा यह एक्सपोजर नहीं देता है।

कछ शिक्षाविदों का कहना है कि एक सीमा तक असाधारण परिस्थितियों में विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों के लिए ऑनलाइन शिक्षण फिर भी ठीक माध्यम कहा जा सकता है।

लेकिन, स्कूली स्तर के बच्चों के नजरिए से यदि इसे स्थायी व्यवस्था के तौर पर लागू करने को लेकर विचार किया जा रहा है तो कुछ संबंधित महत्वपूर्ण कारकों पर विचार करना जरूरी है।

प्रश्न सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की दुर्दशा और वहां पढ़ने वाले अभावग्रस्त परिजनों के बच्चों का तो है ही, ऑनलाइन माध्यम में बच्चों की रूचि, सेहत और शिक्षण की समस्या से भी है।

जैसा कि स्पष्ट है कि ऑनलाइन शिक्षण एक तकनीक आधारित शिक्षण पद्धति है और तकनीक संबंधी बाधाओं से हम सब परिचित भी हैं। MSO 2 Free Assignment In Hindi

ऐसे में यदि छोटे बच्चों को पढ़ाने के दौरान इस प्रकार का व्यवधान आए और शिक्षण की प्रक्रिया लगातार रूकती रहे तो छोटे बच्चों को फिर से या बार-बार पढ़ाई के लिए प्रेरित करना शिक्षक के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

वहीं, हम यह भी जानते हैं कि एक कक्षा तक में जहां किसी विषय पर शिक्षक बच्चों से और बच्चे परस्पर सहपाठियों से संवाद करते हैं वहां पूरी कक्षा की व्यस्त रखना मुश्किल होता है।

ऐसी स्थिति में ऑनलाइन शिक्षा के अंतर्गत बच्चों को व्यस्त रखने के तरीके और अधिक सीमित हो जाएंगे। इस तरह, यहां यह समझने की जरूरत है कि ऑनलाइन माध्यम में कक्षा के मुकाबले एक बेहतर तरीके से सीखने या अच्छी तरह से चर्चा कराने की संभावना नहीं है।

कक्षा में पढ़ाई से जुड़ी एक अच्छी बात यह है कि यहां हर बच्चे को एक साथ समान रुप से बैठने के लिए जगह उपलब्ध की जाती है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

यह सामूहिक भागीदारिता से सीखने का अच्छा मंच है। जबकि, ऑनलाइन शिक्षा में घर से पढ़ाई करने पर जोर दिया जा रहा है। इस संबंध में एक महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि देश की एक बड़ी आबादी के पास अपना घर ही नहीं है।

इसी तरह, कई घरों में एक से अधिक कमरे नहीं है। यदि हैं भी तो वहां पढ़ाई के अनुकूल एकांत माहौल नहीं है। फिर जिन परिजनों के लिए आज भी बच्चों की शिक्षा प्राथमिक जिम्मेदारी में नहीं है उनके लिए ऑनलाइन पद्धति में जाना और अधिक मुश्किल है।

इस लिहाज से देखें तो ऑनलाइन शिक्षा थोपने पर वंचित समुदाय के एक बड़े वर्ग का शिक्षा से अपनेआप ही दूर होने का खतरा है।।

इसी तरह, ऑनलाइन शिक्षा से बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल कारकों को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

कई शोध बताते हैं कि मोबाइल, लैपटॉप या कंप्यूटर के जरिए ऑनलाइन शिक्षा लेने वाले बच्चों को कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।MSO 2 Free Assignment In Hindi

नेत्ररोग विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह के तकनीकी उपकरणों का लगातार प्रयोग करने से सूखी आंखें, आंखों में जलन, एलर्जी, सिरदर्द और दृष्टि संबंधी समस्याएं होती हैं।

इसी तरह, यह बात भी पुष्ट है कि ऑनलाइन शिक्षण के दौरान आंखों पर पड़ने वाले तनाव से स्मृतियां प्रभावित होती हैं।

आखिर कौशल ज्ञान, तकनीक विज्ञान और साक्षरता शिक्षा का विकल्प नहीं हो सकता। किंतु, ऑनलाइन शिक्षा के कारण भी यदि शिक्षण की प्रणाली महंगी की जाएगी तो चिंता की बात यह है कि ज्ञान, विज्ञान और उच्च शिक्षा कुलीन वर्ग के बच्चों के लिए ही रह जाएगी।

दूसरी तरफ, जो बहुसंख्यक इसे वहन नहीं कर सकते उनके बच्चों के लिए स्किल इंडिया के तहत कौशल, तकनीक और साक्षरता का विकल्प खुला रखा जाएगा।

ऑनलाइन शिक्षा की सीमाएँ और चुनौतियाँ

• COVID-19 महामारी से पूर्व भारतीय के अधिकांश शिक्षण संस्थानों को ऑनलाइन शिक्षा का कोई विशेष अनुभव नहीं रहा है, MSO 2 Free Assignment In Hindi

ऐसे में शिक्षण संस्थानों के लिये अपनी व्यवस्था को ऑनलाइन शिक्षा के अनुरूप ढालना और छात्रों को अधिक-से-अधिक शिक्षण सामग्री ऑनलाइन उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती होगी।

•वर्तमान समय में भी भारत में डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है, देश में अब भी उन छात्रों की संख्या काफी सीमित है, जिनके पास लैपटॉप या टैबलेट कंप्यूटर जैसी सुविधाएँ उपलब्ध हैं। अतः ऐसे छात्रों के लिये ऑनलाइन कक्षाओं से जुड़ना एक बड़ी समस्या है।

• शिक्षकों के लिये भी तकनीक एक बड़ी समस्या है, देश के अधिकांश शिक्षक तकनीकी रूप से इत्ने प्रशिक्षित नहीं है कि औसतन 30 बच्चों की एक ऑनलाइन कक्षा आयोजित कर सकें और उन्हें अंनलाइन ही अध्ययन सामग्री उपलब्ध करा सकें।

• इंटरनेट पर कई विशेष पाठ्यक्रमों या क्षेत्रीग भाषाभों रो जुट्टी भध्ययन सामग्री की कमी होने से छात्रों को रागरगागों का सामना करना पड़ सकता है।

• कई विषयों में छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा क आवश्यकता होती है, अत: दूरस्थ माध्यम ऐसे विषयों को सिखाना काफी मुरिकल होता है।

आगे की राह

• शिक्षण क्षेत्र पर COVID-19 और लॉकडाउन के प्रभाव ने शिक्षण संस्थाओं को शिक्षण माध्यमों के नए विकल्पों पर विचार करने हेतु विवश कर दिया है। MSO 2 Free Assignment In Hindi

• भारत में ई-शिक्षा अपनी शैशवावस्था में है, आवश्यक है कि इसकी राह में मौजूद विभिन्न चुनौतियों को संबोधित कर ई-शिक्षा के रूप में एक नए शिक्षण विकल्प को बढ़ावा दिया जाए।

• टेलीविजन और रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से देश के दूरस्थ भागों में स्थित ग्रामीण क्षेत्रों में भी लॉकडाउन के दौरान शिक्षा की पहुँच सुनिश्चित की जा सकती है।

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